पेशे से पत्रकार पवन तिवारी का उपन्यास ऑफिस स्पाउस (New World Publication, अक्टूबर 2025) समकालीन हिंदी साहित्य में कार्यालयी जीवन, भावनात्मक संबंधों और स्त्री मनोविज्ञान की जटिलताओं पर एक सशक्त टिप्पणी है. मात्र 85 पन्नों वाला यह उपन्यास अपनी सरल भाषा, सहज कथानक और वास्तविक जीवन के अनुभवों से इस तरह पगा है कि आप कई दिनों तक इस कहानी को अपने हिसाब से समझने की कोशिश करते रहेंगे. अगर आप किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करते हैं शायद इस उपन्यास का हैंगओवर एक हफ्ते तक चले. दरअसल दफ्तरों में हम सभी का सामना इस तरह की कहांनियों से कभी न कभी जरूर पड़ता है. कार्यालयों विशेषकर कॉर्पोरेट कल्चर ने हमें एक अलग तरह का ऑफिस का माहौल दिया है. मतलब सप्ताह के 5 दिन तो हम ऑफिस में ही रहते हैं. घर तो केवल बिस्तर पर सोने के लिए जाना होता है. पर स्मार्ट फोन के चलते घर पर रहते हुए भी हम सभी ऑफिस में ही होते हैं. इसलिए हमारे जीवन का अधिक समय आज की तारीख में अपने सहकर्मियों के साथ बितता है.इस बीच कभी-कभी उन सहकर्मियों से ऐसे रिश्ते बन जाते हैं जो हमारे खून के रिश्तों पर भारी पड़ते हैं. दिक्कत तब शुरू होती है जब वह सहकर्मी कोई स्त्री हो. महिलाओं को लेकर भारत से लेकर अमेरिका तक में माहौल में कोई ज्यादा फर्क नहीं है.
ऑफिस स्पाउस की कहानी ऐसी है जो पाठक को पहले पृष्ठ से ही बांध लेती है. मुख्य नायिका एक शिक्षित, स्वतंत्र और करियर-उन्मुख महिला है, जो लंबे ऑफिस ऑवर में भी माहौल को खुशनुमा बनाए रखती है. खुद भले ही दबाव और एकाकीपन के बीच जी रही है पर ऑफिस में उसे देखकर ऐसा लगता नहीं उसके जीवन में कुछ गलत हो रहा है. नायिका के जीवन में उसका इम्मिडिएट बॉस ऑफिस स्पाउस की तरह आता है.दोनों सिंपल दोस्त ही होते हैं. हां दोस्त से थोड़ा ज्यादा कह सकते हैं. इस उपन्यास को एक प्रेम कहानी का रूप देकर हम एक मधुर संबंध को कलंकित करने का गुनाह कर सकते हैं. क्यों कि नायिका के घर वाले और नायक की घरवाली भी इस दुविधा में पड़कर ही खुद के साथ और नायिका के साथ गुनाह करते हैं. लेखक ने भी इसे प्रेम कहानी का पारंपरिक रूप नहीं दिया, बल्कि एक स्त्री के अंतर्मन की छटपटाहट, व्यक्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति, सामाजिक दबाव और नैतिक द्वंद्व को केंद्र में रखा है. पत्रकार पृष्ठभूमि के कारण पवन तिवारी अखबार की संपादकीय बैठक, डेडलाइन का तनाव, रात-दिन की शिफ्ट और सहकर्मियों के बीच बनने वाले अनौपचारिक रिश्तों को बहुत जीवंत तरीके से समझते हैं. शायद यही कारण है कि उपन्यास के केंद्र में कोई मीडिया हाउस न होने के बावजूद उन्होंने कॉर्पोरेट ऑफिस का बहुत सजीव चित्रण किया है. कहानी में दफ्तरों में काम करने वाले महिला और पुरुषों के बीच उभर रहे संबंधों को “ऑफिस स्पाउज” शब्द देना कोई नया टर्म नहीं है. वह सहकर्मी जो पति/पत्नी से ज्यादा समझदार, सहायक और भावनात्मक रूप से उपलब्ध लगता है, लेकिन जो जटिलताओं से भरा होता है.
पवन तिवारी के संवाद बहुत चुटीले हैं. नायक नायिका के बीच वट्सऐप पर होने वाली चैट लिखने में उन्होंने गजब की प्रतिभा दिखाई है. संवाद कई जगह इतने गहरे हैं कि लगेगा ही नहीं कोई नया नया लिखाड़ अभी पैदा हुआ है. उत्तराखंड की नदी पर लिखी हुई कविता उन्हें एक एक परिपक्व कवि के रूप में स्थापित करती है.संवाद इतने स्वाभाविक हैं कि जैसे लगता है कि मानव मनोविज्ञान का सजीव चित्रण किया गया है. नायिका की आंतरिक संघर्ष, अपराधबोध, आकर्षण और अंततः निर्णय लेने की प्रक्रिया को बिना अतिरंजना के उकेरा गया है. आम तौर पर ऐसे उपन्यासों का अंत करने में युवा लेखक भटक जाते हैं. पर ऑफिस स्पाउज का अंत शानदार है. लेखन में कुछ कमियां भी हैं जिन्हें ठीक से एडिट करके ठीक किया जा सकता था. कई बार एक घटना के बाद दूसरी घटना एब्रप्टली शुरू हो जाता है,जो बहुत खटकता है.