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'गंदी बात': गंदी तो नहीं लेकिन कच्ची ज़रूर है

अगर आपको प्यार से लबरेज कहानियां और उपन्यास पढ़ना पसंद हैं तो राधाकृष्ण प्रकाशन से आई किताब 'गंदी बात' आपको आकर्ष‍ित कर सकती है. जानिये क्या है ऐसा इस किताब में, जिसे पढ़े बिना आप रह नहीं पाएंगे...

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Book Review Of 'Gandi Baat'
Book Review Of 'Gandi Baat'

ज़रा सोचिए कि प्यार की भाषा क्या होती है. क्या प्यार एक औपचारिक और शालीन शैली है या फिर यह निहायत उन्मुक्त, जंगली और उन्माद से भरी भाषा है, जिसमें हर वक्त की औपचारिकता वाष्प हो जाती है. रह जाता है एक अंदर का सच और उसकी अभिव्यक्ति. और फिर क्या प्यार की भाषा को इस बिना पर गंदा या अच्छा करार दिया जा सकता है.


प्यार की बात गंदी बात है, ऐसा समाज कहता है. प्यार की बात अच्छी बात है, ऐसा दिल कहता है. प्यार की बात अस्तित्व की बात है, ऐसा प्रकृति कहती है. प्यार की बात सिर्फ प्यार की ही तो बात है, ऐसा जीवन कहता है. ऐसे कितने ही बिंबों के बीच पीढ़ियों की कलम हैं और समय के कागज़. लोग इस पर प्यार की बात गढ़ते जा रहे हैं.

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राधाकृष्ण प्रकाशन से हाल ही में एक पुस्तक आई जिसका शीर्षक है 'गंदी बात'. महज 24 बरस के क्षितिज रॉय की यह किताब राधाकृष्ण प्रकाशन के उपक्रम फंडा की पेशकश है. भाषा में सीमाएं टूट रही हैं. व्याकरण और वाक्य के रचे बसे नियम भी. शैली बातचीत वाली है. और तेवर में वही कच्चापन है, जो इस उम्र में होता है.

पुस्तक का शीर्षक किसी का भी ध्यान आसानी से खींचता है. 'गंदी बात' कोई पसंद करता दिखना नहीं चाहता, लेकिन पसंद सभी करते हैं. इस दोहराव से हाथ अनायास ही किताब तक आ जाते हैं. अंदर की कहानी एक डिस्क्लेमर से शुरू होती है- प्यार में कभी कुछ गंदा नहीं होता. और फिर शुरू हो जाती है प्यार की यह कहानी.


प्यार का कथानक एक लंबी कहानी जैसा लिखा दिखता है, लेकिन पढ़ते हैं तो लगता है कि यह सोशल मीडिया और व्हाट्सएप वाले संवाद हैं. वैसी ही भाषा, वैसा ही विस्तार. अनौपचारिक होने की कोशिश में कहीं-कहीं अतिशय होता भी दिखता है.

लेकिन युवाओं को बांधने और उनके अपने अनुभवों में ले जाने की क्षमता इस किताब में है. जिन स्थानों और आयु के बीच यह किताब कसी गई है, वहां इसके लिए संभावना है और परछाई भी.

मात्र 125 रूपये का यह पेपरबैक पढ़ा जा सकता है.

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