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सिर्फ 1 गोली, फिर भी बड़ी स्ट्रिप! जानिए दवा कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं

क्या आपने कभी सोचा है कि कई दवाओं की स्ट्रिप में सिर्फ एक या दो गोलियां होती हैं, जबकि बाकी हिस्सा खाली रहता है? यह कोई गलती या पैकेजिंग की बर्बादी नहीं, बल्कि दवा की सुरक्षा, पैकिंग तकनीक, इलाज की जरूरत और जरूरी जानकारी छापने जैसे कई वैज्ञानिक कारणों से किया जाता है

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2 गोलियों वाली स्ट्रिप उन दवाओं के लिए होती है जिनका इलाज दो डोज में पूरा हो जाता है. (Photo: ITG)
2 गोलियों वाली स्ट्रिप उन दवाओं के लिए होती है जिनका इलाज दो डोज में पूरा हो जाता है. (Photo: ITG)

अगर आपने कभी दवा की स्ट्रिप को ध्यान से देखा होगा, तो आपने नोटिस किया होगा कि कई बार पूरी स्ट्रिप में सिर्फ एक या दो गोलियां होती हैं, जबकि बाकी हिस्सा पूरी तरह खाली रहता है. इसे देखकर कई लोगों के मन में सवाल आता है कि जब एक ही गोली रखनी थी, तो इतनी बड़ी स्ट्रिप बनाने की क्या जरूरत थी? क्या यह सिर्फ प्लास्टिक और फॉइल की बर्बादी है, या इसके पीछे कोई खास वजह भी है? असल में, दवा की स्ट्रिप में खाली जगह छोड़ना कोई गलती नहीं है. इसके पीछे कई वैज्ञानिक, मेडिकल और पैकेजिंग से जुड़े कारण होते हैं. चलिए जानते हैं.

दवा को सुरक्षित रखने के लिए
कुछ दवाएं नमी, हवा, रोशनी और ज्यादा दबाव से जल्दी खराब हो सकती हैं. इसलिए कंपनियां गोली के आसपास खाली जगह छोड़ती हैं, ताकि उस पर अतिरिक्त दबाव न पड़े और दवा सुरक्षित बनी रहे. आपको बता दें कि दवा बनाने वाली कंपनियां ऑटोमैटिक मशीनों से पैकिंग करती हैं. ये मशीनें एक तय आकार की स्ट्रिप पर काम करती हैं. अगर किसी दवा में सिर्फ 1 या 2 गोलियां पैक करनी हों, तो भी उसी आकार की स्ट्रिप का इस्तेमाल किया जाता है और बाकी हिस्सा खाली छोड़ दिया जाता है.

हर दवा में गोलियों की संख्या अलग क्यों होती है?
आपने देखा होगा कि किसी स्ट्रिप में 1 गोली होती है, किसी में 2, किसी में 3, तो किसी में 5 या 10 गोलियां होती हैं. इसकी वजह इलाज का तरीका और दवा का कोर्स होता है. 1 गोली वाली स्ट्रिप उन दवाओं की होती है जिन्हें सिर्फ एक बार लेना होता है, जैसे कुछ डी-वॉर्मिंग या इमरजेंसी दवाएं. 2 गोलियों वाली स्ट्रिप उन दवाओं के लिए होती है जिनका इलाज दो डोज में पूरा हो जाता है.

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3 गोलियों वाली स्ट्रिप कुछ एंटीबायोटिक दवाओं में मिलती है, जहां 3 दिन का कोर्स होता है. 5 या 10 गोलियों वाली स्ट्रिप सबसे ज्यादा इसलिए मिलती है क्योंकि कई बीमारियों में दवा 5 से 10 दिन तक लेनी होती है. यानी स्ट्रिप में गोलियों की संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि मरीज को दवा कितने दिन या कितनी बार लेनी है.

दवा की जानकारी छापने के लिए भी चाहिए जगह
स्ट्रिप पर दवा का नाम, डोज, बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी डेट, एमआरपी और जरूरी चेतावनियां लिखी जाती हैं. अगर स्ट्रिप बहुत छोटी होगी, तो यह सारी जानकारी साफ-साफ छापना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए अतिरिक्त जगह छोड़ी जाती है.

अगर गोली स्ट्रिप के बिल्कुल किनारे पर हो, तो उसे निकालते समय उसके टूटने या पैकिंग फटने का खतरा बढ़ जाता है. खाली जगह होने से स्ट्रिप मजबूत रहती है और दवा सुरक्षित निकलती है. ऐसा जरूरी नहीं है. पहली नजर में यह पैकेजिंग की बर्बादी लग सकती है, लेकिन कई मामलों में इसका मकसद दवा की सुरक्षा, सही पैकिंग और मरीज तक दवा को सुरक्षित पहुंचाना होता है. हालांकि, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कई दवा कंपनियां अब कम पैकेजिंग वाले विकल्पों पर भी काम कर रही हैं.

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दवा की स्ट्रिप में सिर्फ एक गोली होना या उसके आसपास खाली जगह दिखाई देना कोई संयोग नहीं है. इसके पीछे दवा की सुरक्षा, इलाज की अवधि, पैकेजिंग तकनीक, जरूरी जानकारी छापने की सुविधा और गोली को नुकसान से बचाने जैसे कई महत्वपूर्ण कारण होते हैं. इसलिए अगली बार जब आपको किसी स्ट्रिप में सिर्फ एक गोली और बाकी जगह खाली दिखाई दे, तो समझिए कि इसके पीछे एक सोच-समझकर तैयार किया गया वैज्ञानिक कारण है.

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