15 जून 1944 को अमेरिकी विमानों ने जर्मन-कब्जे वाले बुडापेस्ट पर बमबारी की. साथ ही ऐसे पर्चे भी गिराए गए, जिसमें जर्मनी और हिटलर के लिए लिखित रूप में धमकी दी गई थी. इनमें हंगरी के यहूदियों को ऑशविट्ज के गैस चैंबरों में भेजने के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की धमकी दी गई थी. अमेरिकी सरकार एसएस और हिटलर को यह बताना चाहती थी कि वह उन पर नजर रख रही है, ताकि आगे और ऐसे निर्वासन को रोका जा सके.
हंगरी के शासक और तानाशाह एडमिरल मिकलास होर्थी, जो साम्यवाद के घोर विरोधी थे और रूसी प्रभुत्व से भयभीत थे. उन्होंने हिटलर के साथ अपने देश का गठबंधन कर लिया था. हालांकि वे हिटलर की बहुत प्रशंसा नहीं करते थे. लेकिन उन्होंने भी निर्वासन रोकने की मांग की. खासकर तब जब ऑशविट्ज से भागे चार कैदियों द्वारा वहां हुए अत्याचारों के बारे में दिए गए बयानों के आधार पर दुनिया भर से विशेष अपीलें आने लगी थीं.
हंगरी में विद्रोह के डर से हिटलर ने 8 जुलाई को निर्वासन रोक दिया. होर्थी ने अंततः युद्ध से पूरी तरह से अलग होने की कोशिश की, लेकिन हिटलर के एजेंटों द्वारा उनका अपहरण कर लिया गया और परिणामस्वरूप उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर किया गया.
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निर्वासन रुकने के एक दिन बाद, एक स्वीडिश व्यवसायी, राउल वालेंबर्ग , ने स्वीडिश विदेश मंत्रालय को राजी करके राजनयिक पासपोर्ट पर हंगरी की राजधानी में जाने का प्रबंध किया और हंगेरियन यहूदियों के लिए 630 वीजा लेकर बुडापेस्ट पहुंचे, ताकि उन्हें आगे के निर्वासन से बचाने के लिए स्वीडन ले जाया जा सके.