
तेल... वो 'काला सोना' जिसके बिना कोई भी देश रफ्तार नहीं पकड़ सकता. ये न सिर्फ आर्थिक तरक्की की रफ्तार है बल्कि रोजाना की जरूरतों को पूरा करने का भी आधार है. तेल कहें, कच्चा तेल समझें या फिर पेट्रोलिय प्रोडक्ट ये वो मिनरल है जो पूरी दुनिया की इंडस्ट्री को रेगुलेट करता है.
इस "ब्लैक गोल्ड" को पानी के रास्ते ट्रांसपोर्ट करना दूसरे तरीकों के मुकाबले ज़्यादा फायदेमंद , सहज और सस्ता है. इसलिए तेल को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचाने के लिए तेल टैंकर का इस्तेमाल होता है. कुछ ऑयल कार्गो शिप इतने बड़े होते हैं इससे एफिल टॉवर भी ले जाया जा सकता है.
आजकल एक सामान्य ऑयल टैंकर की लंबाई एफिल टॉवर जितनी होती है. यानी कि 300 से 400 मीटर लंबी. इसकी चौड़ाई 60 से 80 मीटर तक होती है. यानी कि ये जहाज ऐसे होते हैं कि इस पर एफिल टॉवर भी लोड हो जाए.
इस एक टैंकर में कितना कच्चा तेल ले जाया जा सकता है ये आपकी कल्पना से परे हैं. एक बड़े टैंकर में 2 मिलियन यानी कि 20 लाख बैरल कच्चा तेल ले जाया जा सकता है. अगर लीटर में कहें तो एक भीमकाय, दैत्यकार तेल टैंकर में 31 करोड़ 80 लाख लीटर तेल ले जाया जा सकता है.
यही भीमकाय ऑयल टैंकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरते हैं. और इन्हीं टैंकरों के जरिये भारत समेत पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई होती है. ईरान आजकल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ऐसे ही तेल टैंकरों को निशाना बना रहा है. कल्पना कीजिए अगर एक टैंकर में आग लग जाए तो कितना तेल जलता होगा.
कैसे बने ऑयल टैंकर
जब तेल की खोज हुई तो इसका ट्रांसपोर्ट छोटे-छोटे लकड़ी के बैरलों में भरकर जहाजों पर लादकर किया जाता था. बैरल भारी थे, रिसते थे, महंगे थे और हर बैरल को अलग अलग उठाना पड़ता था. यही वजह है कि पश्चिमी देशों में तेल मापने का यूनिट बैरल इस्तेमाल होता है. एक बैरल में लगभग 159 लीटर होते हैं.
फिर रूस के दो भाइयों ने 1878 में पहला टैंकर बनाया. और इसका नाम दिया 'जोरोस्टर'. ये टैंकक सिर्फ 242 टन तेल ले जा सकता था. लेकिन इस खोज ने आंखें खोल दी. धीरे-धीरे स्टील के टैंकर बनने लगे.
1886 में 'ग्लुक्कौफ' आया, जो पहला आधुनिक स्टील टैंकर था. फिर विश्व युद्धों में सैकड़ों टैंकर बने. 1956 में जब स्वेज नहर बंद हो गई, तो जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगाना पड़ा. दूरी बहुत बढ़ गई. तब एक साथ भारी मात्रा में कच्चे तेल को ट्रांसपोर्ट करने के लिए बड़े जहाजों की खोज हुई. और फिर बने वो विशाल टैंकर जिन्हें हम आज ऑयल टैंकर कहते हैं.
इसके दो मुख्य टाइप होते हैं. क्रूड टैंकर, जो ऑयल फील्ड जैसी एक्सट्रैक्शन साइट से रिफाइनरी तक बड़ी मात्रा में बिना रिफाइंड क्रूड ऑयल ले जाते हैं. दूसरा होता है प्रोडक्ट टैंकर. ये टैंकर गैसोलीन, डीजल, जेट फ्यूल, या हीटिंग ऑयल जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स को ले जाते हैं.
कई आकार में आते हैं ऑयल टैंकर
ऑयल टैंकर कई साइज में आते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से उनके डेडवेट टनेज (DWT) के आधार पर बांटा जाता है. डेडवेट टनेज का मतलब जब जहाज पूरी तरह से लदा हो तो उसके कुल वजन में खाली जहाज के वजन के बाद निकलने वाली मात्रा.
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छोटे ऑयल टैंकर की लंबाई 100 से 200 मीटर तक होती है. इसमें 70,000 से 3 लाख बैरल तेल आ सकता है.
इसके बाद नंबर आता है एफ्रामैक्स ऑयल टैंकर का. इसकी लंबाई 250 मीटर तक होती है. इसमें 5 से 8 लाख बैरल तेल आ सकता है. ये मध्यम दूरी के लिए इस्तेमाल होता है. इसके बाद स्वेज नहर से होकर गुजरने वाले टैंकर होते हैं जो 8–12 लाख बैरल तेल ले जा सकते हैं.
एक टैंकर में 31 करोड़ लीटर कच्चा तेल, भर जाएंगे 16500 टैंकर
तेल ले जाने के लिए सबसे आम है VLCC यानी कि Very Large Crude Carriers. ये टैंकर 20 लाख बैरल तक तेल ले जा सकते हैं. ये 60 मीटर तक चौड़े होते हैं. 20 लाख बैरल तेल को लीटर में बदलने पर आंकड़ा आता है लगभग 31 करोड़ लीटर. यानी कि ये दैत्याकार जहाज एक बार में 31 करोड़ लीटर तेल ले जा सकते हैं.

इस तेल को जमीन पर चलने वाले टैंकरों में भरा जाए तो 16500 टैंकर भर जाएंगे.
भारत के बंदरगाहों में पहले VLCC टैंकरों को हैंडल करने की क्षमता नहीं थी. लेकिन अब मुंद्रा एयरपोर्ट पर ये संभव हो गया है.
इसके बाद नंबर आता है ULCC का यानी कि Ultra Large Crude Carriers. इन टैंकरों में 30 लाख बैरल तक कच्चा तेल आ सकता है. लेकिन इसकी अति विशालता की वजह से इसका इस्तेमाल कम होता है. 'सीवाइज जायंट' नाम का एक ULCC जहाज 458 मीटर लंबा है. यह इतना विशाल कि इसकी तस्वीर देखकर लगता है कोई तैरता हुआ शहर है.
यह विशाल जहाज कैसे चलता है?
ऑयल टैंकर पावरफ़ुल मरीन इंजन से चलते हैं, आम तौर पर बड़े डीजल इंजन जो हेवी फ़्यूल ऑयल या मरीन डीजल जलाते हैं. ये ईंजन हजारों होर्स पॉवर की ताकत पैदा करता है. वह इंजन पीछे लगे विशाल पंखे को घुमाता है. पंखा पानी को पीछे धकेलता है और जहाज आगे बढ़ता है. इसकी रफ्तार 22-28 किलोमीटर प्रति घंटे होती है.
लोडिंग और अनलोडिंग
जब टैंकर तेल लोड करने बंदरगाह पर पहुंचता है, तो बंदरगाह की बड़ी-बड़ी धातु की बाहें जिन्हें लोडिंग आर्म कहते हैं जहाज के डेक पर बने मैनिफोल्ड से जुड़ जाती हैं. इसके बाद जहाज के टैंकों में पंप से कच्चा तेल भरा जाता है.
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पहले पंप धीरे-धीरे चलाया जाता है, सब कुछ ठीक है या नहीं यह चेक किया जाता है. फिर पंप की गति बढ़ाई जाती है. कंप्यूटर हर टैंक का वजन देखता रहता है ताकि जहाज सीधा और संतुलित रहे.
जब यह जहाज रिफाइनरी या दूसरे बंदरगाह पर पहुंचता है, तो अब उसकी बारी होती है तेल बाहर निकालने की. जहाज के अपने बड़े-बड़े पंप शुरू हो जाते हैं. जहाज के अपने कार्गो पंप वैसे ही मैनिफोल्ड और होज के जरिए तेल को किनारे पर ट्रांसफर करते हैं. क्रू मेंबर, इंचार्ज के डायरेक्शन में वाल्व खोलते और बंद करते हैं, और रिसीविंग फैसिलिटी के साथ कम्युनिकेशन बनाए रखते हैं. सेफ्टी चेक के लिए फ्लो धीरे-धीरे शुरू होता है, फिर बढ़ता है. अगर तेल बहुत गाढ़ा हो तो जहाज के अंदर हीटर चालू कर दिया जाता है ताकि तेल पिघले और आसानी से बह सके. पूरा काम कई घंटों या कभी-कभी दो दिन तक चलता है. पूरे समय टैंकों के ऊपर खाली जगह में 'इनर्ट गैस; भरी रहती है. यह गैस आग या विस्फोट नहीं होने देती है. जहाज की दीवारें दोहरी होती हैं ताकि कोई दुर्घटना हो तो भी तेल समुद्र में न फैले.
ईरान वॉर में 15 टैंकर और कार्गो जहाज बने निशाना
जब 28 फरवरी को ईरान की जंग शुरू हुई तो ऑयल टैंकर को सबसे पहले निशाना बनाया गया. मार्शल आइलैंड्स का क्रूड टैंकर MKD VYOM ओमान के पास मिसाइल से टकराया,इसमें एक क्रू सदस्य मारा गया और आग लग गई. इसी दिन हर्क्यूलिस स्टार और एक पलाऊ टैंकर भी हॉर्मुज में हमले का शिकार बने.
2 मार्च को तीन और टैंकरों पर प्रोजेक्टाइल और ड्रोन से हमले हुए, जिनमें आग लग गई और बंदरगाह बंद करना पड़ा. 11 मार्च की रात सबसे भयानक हमला हुआ. इराक के बसरा बंदरगाह के पास दो बड़े तेल टैंकर सेफसी विष्णु और जेफायरोस पर अंडरवाटर ड्रोन ने हमला किया. सेफसी विष्णु में जोरदार विस्फोट हुआ, आग भड़क उठी, एक व्यक्ति मारा गया हालांकि 38 क्रू मेंबर को बचाया गया. दोनों जहाज जलते रहे और इराका का तेल निर्यात ठप हो गया. ईरान अभी स्ट्रेट होर्मुज से गुजर रहे तेल टैंकरों पर हमला कर रहा है.