सबसे ताकतवर सैनिकों में गिने जाने वाले इजरायली सैनिकों की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है. गाजा में लंबे समय तक चले युद्ध के बाद कई सैनिक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे हैं. किसी को नींद में डरावने सपने आते हैं, कोई अचानक तेज आवाज से घबरा जाता है, तो किसी के लिए युद्ध की पुरानी यादें रोजमर्रा की जिंदगी में लौट आती हैं. सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
नवंबर 2025 में AP की एक रिपोर्ट में इजरायल के रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद करीब 11,000 सैनिकों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चोटों की पहचान हुई है. इसमें PTSD, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं शामिल हैं. AP के मुताबिक यह संख्या इजरायल के इतिहास के सभी संघर्षों में दर्ज ऐसी मानसिक चोटों के कुल मामलों के एक बड़े हिस्से के बराबर है.
PTSD क्या है और सैनिकों को बुरे सपने क्यों आते हैं?
PTSD यानी पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है, जो किसी बेहद डरावनी या जानलेवा घटना के अनुभव के बाद हो सकती है. इसमें व्यक्ति उस घटना को बार-बार याद कर सकता है. फ्लैशबैक, घबराहट, नींद खराब होना और डरावने सपने इसके लक्षणों में शामिल हो सकते हैं.
युद्ध के दौरान सैनिक लगातार खतरे के बीच रहते हैं. गोलीबारी, धमाके, ड्रोन और मिसाइल हमले, साथियों की मौत और हर वक्त जान जाने का डर उनके दिमाग को लंबे समय तक तनाव की स्थिति में रख सकता है. यही वजह है कि मोर्चे से लौटने के बाद भी शरीर घर पहुंच जाता है, लेकिन दिमाग को सामान्य स्थिति में लौटने में ज्यादा समय लग सकता है.
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AP की रिपोर्ट में गाजा में लड़ चुके एक पूर्व इजरायली सैनिक का अनुभव भी सामने आया. सेना छोड़ने के करीब 18 महीने बाद भी उसे फ्लैशबैक और पैनिक अटैक परेशान कर रहे थे. उसने बताया कि विमान या ड्रोन के गुजरने, किसी के चिल्लाने या तेज आवाज जैसी चीजें उसे फिर से उसी मानसिक स्थिति में पहुंचा देती थीं.
एक अन्य सैनिक ने बताया कि 7 अक्टूबर के बाद दक्षिणी इजरायल में शवों को इकट्ठा करने के काम के दौरान उसे जिस चीज ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह दृश्य से ज्यादा शवों की गंध थी. बाद में बच्चे का डायपर बदलते समय भी वही गंध उसे उस घटना की याद दिला देती थी. यह उदाहरण बताता है कि युद्ध का ट्रॉमा सिर्फ तस्वीरों से नहीं, बल्कि गंध, आवाज या किसी मामूली लगने वाली चीज से भी दोबारा सक्रिय हो सकता है.
PTSD के मामलों में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी
जनवरी 2026 में Reuters ने इजरायल के रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से बताया कि 2023 के बाद सैनिकों में PTSD के मामलों में करीब 40 फीसदी की वृद्धि हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध से जुड़ी चोटों के इलाज के लिए सामने आए 22,300 सैन्यकर्मियों में करीब 60 फीसदी पोस्ट-ट्रॉमा की समस्या से जूझ रहे थे. रक्षा मंत्रालय ने आने वाले वर्षों में इन मामलों के और बढ़ने का अनुमान भी जताया है.
इन आंकड़ों की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि PTSD हमेशा शरीर पर दिखाई देने वाली चोट की तरह सामने नहीं आता. किसी सैनिक को कोई बड़ी शारीरिक चोट न लगी हो, फिर भी उसकी नींद, व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी बदल सकती है. वह चिड़चिड़ा हो सकता है, छोटी आवाज से चौंक सकता है, लोगों से दूरी बनाने लग सकता है या हर वक्त किसी खतरे की आशंका में रह सकता है.
बार-बार मोर्चे पर लौटने से बढ़ता दबाव
इजरायल और हमास के बीच युद्ध लंबे समय तक चलता रहा और बड़ी संख्या में रिजर्व सैनिकों को बार-बार ड्यूटी पर बुलाया गया. कई सैनिकों को मानसिक रूप से संभलने और सामान्य जिंदगी में लौटने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया. AP की रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने युद्ध की लंबी अवधि, उसकी तीव्रता और बार-बार तैनाती को मानसिक स्वास्थ्य संकट की बड़ी वजहों में बताया है.
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2024 से जुलाई 2025 के बीच 279 सैनिकों ने आत्महत्या की कोशिश की थी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि युद्ध से जुड़ा मानसिक दबाव सैनिकों के बीच लगातार चिंता का विषय बना हुआ है.
सिर्फ बुरे सपने नहीं, पूरा जीवन प्रभावित
बुरे सपने PTSD का सिर्फ एक लक्षण हैं. इसके साथ फ्लैशबैक, बेचैनी, नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन, किसी घटना को बार-बार याद करना और लोगों से दूरी बनाना भी हो सकता है. कुछ सैनिकों में नैतिक आघात की समस्या भी सामने आई है. इसका मतलब है कि युद्ध के दौरान लिए गए फैसलों या देखी गई घटनाओं को लेकर व्यक्ति के भीतर अपराधबोध या गहरा मानसिक संघर्ष पैदा होना.
Reuters से बातचीत में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट रोनन सिडी ने बताया कि सैनिकों के ट्रॉमा का एक हिस्सा मरने के डर और युद्ध के दौरान महसूस किए गए गहरे भय से जुड़ा है, जबकि दूसरा हिस्सा आघात से जुड़ा हो सकता है.
क्या युद्ध खत्म होने पर सब ठीक हो जाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरी नहीं. इजरायल की स्वास्थ्य सेवा संस्था Clalit के आंकड़ों पर आधारित द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक 7 अक्टूबर के बाद सामान्य आबादी में PTSD के निदान में 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. Clalit के विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी कि मानसिक स्वास्थ्य पर युद्ध का वास्तविक असर PTSD के आंकड़ों से कहीं बड़ा हो सकता है.
Clalit के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रोफेसर आमिर क्रिवॉय के मुताबिक लगातार युद्ध और बार-बार आने वाले तनावपूर्ण घटनाक्रम की वजह से वह सामान्य गिरावट नहीं दिख रही, जो किसी तनावपूर्ण घटना के बाद समय के साथ देखने को मिलती है. उनके अनुसार PTSD के आंकड़े सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य संकट का एक हिस्सा दिखाते हैं. डिप्रेशन, एंग्जायटी और दूसरी मानसिक समस्याओं से जूझने वाले लोगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.
यही वजह है कि सैनिकों को आने वाले बुरे सपनों को सिर्फ नींद की परेशानी मानना सही नहीं होगा. कई मामलों में ये युद्ध के दौरान मिले मानसिक आघात का संकेत हो सकते हैं. रात में दिखाई देने वाला कोई डरावना सपना दरअसल उस घटना की याद हो सकता है, जिसे दिमाग अभी तक पूरी तरह पीछे नहीं छोड़ पाया है.