30 मई, 1913 को एक शांति संधि पर हस्ताक्षर के बाद पहले बाल्कन युद्ध का अंत हो गया. हालांकि, यह अंत एक भीषण महायुद्ध की शुरुआत थी. क्योंकि, बाल्कन की पहली लड़ाई में ही प्रथम विश्वयुद्ध के बीज बोए गए थे. इसमें नवगठित स्लाव राष्ट्रों सर्बिया, मोंटेनेग्रो, बुल्गारिया और ग्रीस ने तुर्की सेना को मैसेडोनिया से बाहर निकाल दिया था, जो दक्षिणपूर्वी यूरोप के अशांत बाल्कन क्षेत्र में स्थित ओटोमन साम्राज्य का एक क्षेत्र था.
1908 में मैसेडोनिया में विद्रोह का नेतृत्व यंग तुर्क नामक राष्ट्रवादियों के एक गुप्त संगठन ने किया था. इस संगठन यूरोप में ओटोमन साम्राज्य पर सुल्तान की पकड़ को हिलाकर रख दिया. इसके बाद, ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बाल्कन क्षेत्र के दो प्रांतों बोस्निया-हर्ज़ेगोविना को अपने अधीन कर लिया और तुर्की शासन के अधीन बुल्गारिया को भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करने के लिए प्रोत्साहित किया.
ऑस्ट्रो-हंगरी की इस कार्रवाई ने बाल्कन क्षेत्र में शक्ति संतुलन को स्पष्ट रूप से बिगाड़ दिया. सर्बिया का छोटा और उग्र राजतंत्र इस विलय से बेहद नाराज था, क्योंकि वह लंबे समय से बोस्निया-हर्ज़ेगोविना को अपने साझा दक्षिण स्लाविक वंश के कारण अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा मानता रहा था.
वहीं, सर्बिया का एक महत्वपूर्ण समर्थक और बाल्कन क्षेत्र में प्रभाव रखने वाली दूसरी बड़ी यूरोपीय शक्ति, जारवादी रूस ने अपने प्रतिद्वंद्वी की इस कार्रवाई से अपने हितों को खतरे में महसूस किया.
1912 की वसंत ऋतु में, रूस के प्रोत्साहन से सर्बिया, बुल्गारिया, मोंटेनेग्रो और ग्रीस ने यूरोप में ओटोमन साम्राज्य के कब्जे वाले कुछ या सभी क्षेत्रों पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से गठबंधन किया. बाल्कन के इन विभिन्न देशों के बीच गहरी घृणा थी, फिर भी उन्हें तुर्की पर हमला करने के लिए एकजुट होना पड़ा और तेजी से कार्रवाई करनी पड़ी.
तुर्की उस समय लीबिया में क्षेत्र को लेकर इटली के साथ युद्ध में उलझा हुआ था. 8 अक्टूबर, 1912 को मोंटेनेग्रो ने तुर्की पर युद्ध की घोषणा कर दी. सर्बिया, बुल्गारिया और ग्रीस ने 17 अक्टूबर को उसका अनुसरण किया. आश्चर्यजनक रूप से, ओटोमन सेना को शीघ्र और निर्णायक रूप से परास्त कर दिया गया, क्योंकि बाल्कन सेनाओं ने एक महीने के भीतर दक्षिण-पूर्वी यूरोप के लगभग सभी क्षेत्रों से तुर्कों को खदेड़ दिया.
तुर्की की वापसी के बाद, यूरोप की महाशक्तियां - ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और रूस - इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए होड़ में जुट गईं और दिसंबर 1912 में लंदन में युद्धरत राष्ट्रों के प्रतिनिधियों के साथ बाल्कन में युद्धोत्तर सीमाएं निर्धारित करने के लिए एक सम्मेलन बुलाया गया.
अगले कई महीनों और 63 बैठकों के दौरान, साथ ही युद्ध के मैदान में नए सिरे से शुरू हुई शत्रुता के बावजूद, एक समझौता हुआ और प्रथम बाल्कन युद्ध के विजेताओं के बीच मैसेडोनिया का विभाजन कर दिया गया. फिर भी, यह शांति अस्थिर ही रही, क्योंकि बुल्गारिया को लगा कि सर्बिया और ग्रीस ने उसे उसके उचित हिस्से से वंचित कर दिया है.
शांति संधि पर हस्ताक्षर होने के ठीक एक महीने बाद, 29-30 जून की रात को, बुल्गारिया ने अपने पूर्व सहयोगियों, सर्बिया और ग्रीस के खिलाफ अचानक हमला कर दिया. यह हमला राजा फर्डिनेंड प्रथम के आदेश पर बिना अपनी सरकार से परामर्श किए किया गया था.
इस हमले के कारण तथाकथित द्वितीय बाल्कन युद्ध शुरू हुआ, जिसमें बुल्गारिया को सर्बिया, ग्रीस, तुर्की और रोमानिया की सेनाओं ने शीघ्र ही हरा दिया. 10 अगस्त को हस्ताक्षरित बुखारेस्ट संधि पर बड़ी शक्तियों के बजाय स्थानीय राज्यों ने बातचीत की थी. इस संधि के अनुसार, बुल्गारिया ने काफी बड़ा भूभाग खो दिया और सर्बिया और ग्रीस को मैसेडोनिया के अधिकांश भाग पर नियंत्रण प्राप्त हुआ.
ऑस्ट्रिया-हंगरी, जो सर्बिया को कुचलते देखना चाहता था, बाल्कन के दोनों युद्धों के परिणामों से स्तब्ध और निराश था. पहले तुर्की और फिर बुल्गारिया की जीत को लेकर आश्वस्त ऑस्ट्रिया-हंगरी ने दोनों ही संघर्षों में हस्तक्षेप नहीं किया था. अब बाल्कन में बढ़ते स्लाव प्रभाव, एक शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी सर्बिया के उदय और इन सबका उसके पतनशील साम्राज्य के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तेजी से भयभीत होने लगी थी—और यह भय उचित भी था.
1913 तक, ऑस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी दोनों में कई लोगों ने, विशेषकर देशों के सैन्य नेतृत्व ने यह निर्णय लिया था कि साम्राज्य की प्रतिष्ठा और शक्ति को बहाल करने के लिए सर्बिया के विरुद्ध एक युद्ध आवश्यक होगा. चूंकि रूस किसी भी ऐसे संघर्ष में सर्बिया का समर्थन करने के लिए लगभग निश्चित था, इसलिए बाल्कन में तीसरा युद्ध संभवतः सीधे एक व्यापक यूरोपीय युद्ध में तब्दील हो जाएगा, जिसमें जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी का सामना सर्बिया, रूस, रूस के प्रमुख सहयोगी फ्रांस और संभवतः ब्रिटेन से होगा.
फिलहाल, जर्मनी के सम्राट कैसर विल्हेम और ऑस्ट्रियाई सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्चड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड दोनों को बाल्कन मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की संभावना दिखाई देती रही, हालांकि वे इसे प्राप्त करने के साधनों पर असहमत थे. फिर , 28 जून, 1914 को साराजेवो में एक सर्बियाई राष्ट्रवादी द्वारा फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या ने इस तरह की किसी भी बातचीत को समाप्त कर दिया और यूरोप को, जो पहले से ही महान शक्तियों के बीच मतभेदों से भरा हुआ था, प्रथम विश्व युद्ध की ओर धकेल दिया.