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वहां 'काफिर', यहां 'पाकिस्तानी'... दो मुल्कों के बीच दर्द में फंसी हिंदुओं की जिंदगी!

पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदू भारत आ रहे हैं. लेकिन, भारत आने के बाद भी उन्हें काफी मुश्किलों को सामना करना पड़ता है. तो जानते हैं कि भारत आने के बाद उनकी जिंदगी कैसी रहती है.

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पाकिस्तान से भारत आ रहे हिंदुओं को यहां भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. (Photo: ITG)
पाकिस्तान से भारत आ रहे हिंदुओं को यहां भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. (Photo: ITG)

"पाकिस्तान में हमें 'काफिर' कहा जाता था. भारत आए तो यहां लोग 'पाकिस्तानी' कहने लगे. कभी-कभी लगता है कि आखिर हम जाएं तो जाएं कहां?"

भारत आना पाकिस्तान के हिंदू परिवारों का सपना तो है, लेकिन सरहद पार करने के बाद उनके एक नए संघर्ष की शुरुआत होती है. पाकिस्तान में ‘काफिर’ के टैग सेअपमान झेलने वाले ये परिवार लंबे इंतजार और कई जगह धक्के खाने के बाद भारत आ तो  जाते हैं, लेकिन यहां ‘पाकिस्तानी’ होने का टैग उनके लिए नया संघर्ष  शुरू कर देता है. वे यहां आने के बाद सरकारी प्रक्रियाओं के ऐसे जाल में फंस जाते हैं कि लंबे वक्त तक उन्हें भारत में भी पहचान नहीं मिल पाती. 

आजतक डॉट इन ने पाकिस्तान से आए कई हिंदू परिवारों और उनके लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत की. ‘सरहद पार के हिंदू’ सीरीज के तीसरे पार्ट में बताएंगे कि कैसे पाकिस्तान छोड़ने के बाद भी वहां से आने वाले हिंदुओं का संघर्ष खत्म नहीं होता.

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राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर और गुजरात के कई इलाकों में ऐसे हजारों परिवार सालों से रह रहे हैं. इनमें से कई भारतीय नागरिक बन चुके हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोग आज भी लॉन्ग टर्म वीजा (LTV), नागरिकता, आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज बनवाने के के इंतजार में हैं. अगर आ गए तो वीजा बढ़वाने की मशक्कत, फिर एलटीवी, फिर नागरिकता की लड़ाई. अगर नागरिकता बन जाए तो आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, वोटर कार्ड बनवाने की जंग. 

वहां धर्म वजह था... यहां दस्तावेज वजह बन गए

पाकिस्तान में उनकी पहचान हिंदू होने की वजह से परेशानी थी. भारत आने के बाद पहचान का संकट एक अलग रूप में सामने आता है.पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए कई सालों से काम कर रहे हिंदू सिंह सोढ़ा बताते हैं कि यहां आने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि लंबे समय तक उनके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं होता, जिससे वे सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी सकें.

उनका कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें 'काफिर' कहा जाता था और भारत में अक्सर 'पाकिस्तानी' कहकर देखा जाता है. नागरिकता मिलने तक वे दो पहचानों के बीच फंसे रहते हैं.

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LTV... जिस पर टिकी होती है पूरी जिंदगी

भारत आने वाले अधिकांश पाकिस्तानी हिंदू सबसे पहले एक बार वीजा एक्सटेंड के साथ लॉन्ग टर्म वीजा (LTV) के लिए आवेदन करते हैं. यही दस्तावेज आगे नागरिकता तक पहुंचने का सबसे अहम रास्ता होता है. 

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हिंदू सिंह सोढ़ा बताते हैं कि आवेदन करने के बाद मंजूरी आने में कई बार वर्षों लग जाते हैं. फाइल दिल्ली चली जाती है और लोग इंतजार करते रहते हैं. इस दौरान न वे पूरी तरह सामान्य जीवन जी पाते हैं और न ही भविष्य की कोई योजना बना पाते हैं. इसके अलावा यहां आने के बाद उनके रहने-खाने का कोई ठिकाना नहीं होता और वो बिना आश्रय के सम्मान के साथ जीने की कोशिश करते हैं. 

आधार कार्ड भी संघर्ष बन जाता है

एलटीवी मिलने के बाद कई लोगों का आधार कार्ड बन जाता है, लेकिन उससे भी सभी समस्याएं खत्म नहीं होतीं. बता दें कि एलटीवी पर  बनने वाला आधार कार्ड अलग होता है, जिसमें विदेशी लिखा होता है. इसके आधार पर बैंक अकाउंट आदि नहीं खुलता है. 

हिंदू सिंह सोढ़ा बताते हैं कि कई बार आधार कार्ड होने के बावजूद बैंक खाता खुलवाने, नौकरी करने या सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने में दिक्कत आती है. कई जिलों में तो एलटीवी धारकों के आधार कार्ड बनना भी बंद हो गया, जिससे लोगों को दूसरे शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

‘उन्हें भारत की नागरिकता तो मिल गई, लेकिन अब उनका आधार कार्ड निरस्त हो गया. अब नया आधार कार्ड बनवाने के लिए दिल्ली बुलाया जा रहा है. मजदूरी करने वाले परिवार के लिए इतना खर्च उठाना आसान नहीं है.’- ढालाराम

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बैंक खाता नहीं... तो मेहनत की कमाई भी अटक जाती है

पाकिस्तान से आए हिंदुओं की समस्याओं  को लेकर दिलीप सिंह बताते हैं कि दिहाड़ी मजदूरी करने वाले कई परिवारों के सामने बैंक खाता न होना बड़ी समस्या बन जाता है. कई जगह मजदूरी का भुगतान बैंक के माध्यम से होता है, लेकिन दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण खाता नहीं खुल पाता. ऐसे में रोजगार मिलने के बाद भी कमाई तक पहुंच मुश्किल हो जाती है.

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इलाज भी कागजों पर निर्भर हो जाता है

सोभराज भील का कहना है,  ’कई गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान आधार या अन्य दस्तावेज मांगे जाते हैं. दस्तावेज पूरे नहीं होने पर गरीब परिवारों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है. इससे इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है.’

‘परेशानी ये है कि बिना आधार कार्ड कोई महिलाओं को सोनोग्राफी भी नहीं करता और प्रेग्नेंट महिलाओं के इलाज में ये जरूरी है. सोचिए, वहां से आई हिंदू  महिला यहां सोनोग्राफी भी नहीं करवा सकती है.’- सोभराज भील

नागरिकता मिलने के बाद भी सफर खत्म नहीं होता

भारत की नागरिकता मिल जाने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं होता. जान बहादुर सिंह बताते हैं कि नागरिकता मिलने के बाद जाति प्रमाण पत्र, वोटर आईडी, राशन कार्ड, मूल निवास और अन्य दस्तावेज बनवाने में महीनों, कई बार वर्षों लग जाते हैं.

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उनके मुताबिक बड़ी संख्या में पाकिस्तान से आए परिवार अनुसूचित जाति समुदायों से हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बनने के कारण बच्चों की पढ़ाई, नौकरी और सरकारी योजनाओं में परेशानी आती है.

वीजा लेकर आए... लेकिन हर कदम पर अनुमति

दिलीप सिंह सोढ़ा बताते हैं कि पहले सामान्य प्रक्रिया से वीजा मिल जाता था, लेकिन अब नियम काफी सख्त हो गए हैं. कई अतिरिक्त अनुमतियां लेनी पड़ती हैं और हर चरण में सरकारी प्रक्रिया पूरी करनी होती है.

पहलगाम हमले के बाद हालात और कठिन हो गए. वीजा सेवाएं बंद होने से कई परिवार भारत नहीं आ सके और जिनके वीजा पहले जारी हो चुके थे, उनमें से कई रद्द भी कर दिए गए.

रिफ्यूजी का दर्जा नहीं... इसलिए सुविधाएं भी अधूरी

हिंदू सिंह सोढ़ा बताते हैं कि पाकिस्तान से आए हिंदुओं को औपचारिक रूप से शरणार्थी का दर्जा नहीं मिलता. यही कारण है कि कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित रह जाती है. उनका कहना है कि रहने की जगह, इलाज, पहचान, रोजगार और बच्चों की पढ़ाई जैसी सामान्य जरूरतों के लिए भी लोगों को वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है.

सरकार से क्या चाहते हैं पाकिस्तान से आए हिंदू?

पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए काम करने वाले संगठन सीमांत लोक संगठन ने केंद्र और राजस्थान सरकार को ज्ञापन देकर कई मांगें रखी हैं. संगठन का कहना है कि अगर इन मांगों पर अमल हो जाए तो हजारों परिवारों का संघर्ष काफी कम हो सकता है.

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प्रमुख मांगें हैं—

  • पहलगाम हमले के बाद बंद हुई वीजा सेवा दोबारा शुरू की जाए.
  • जिन लोगों का पहले से स्वीकृत वीजा रद्द हुआ था, उन्हें भारत आने की अनुमति दी जाए.
  • 2021 के बाद लंबित पड़े LTV मामलों का जल्द निपटारा किया जाए.
  • एलटीवी धारकों के आधार कार्ड जल्द जारी किए जाएं और जिनके आधार निरस्त हुए हैं, उन्हें दोबारा बनाया जाए.
  • पाकिस्तान से आए हिंदू परिवारों को शरणार्थी का दर्जा और शरणार्थी पहचान पत्र दिया जाए.
  • नागरिकता मिलने के बाद जाति प्रमाण पत्र, वोटर आईडी, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया आसान की जाए.
  • BPL श्रेणी में शामिल कर राशन, गैस और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाए.
  • बैंक खाता खुलवाने की प्रक्रिया सरल बनाई जाए.
  • बच्चों की पढ़ाई, गर्भवती महिलाओं के इलाज, जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी सेवाओं में दस्तावेजी बाधाएं कम की जाएं.
  • जहां पाकिस्तान से आए हिंदू वर्षों से रह रहे हैं, वहां भूमि के पट्टे जारी किए जाएं और बिजली, पानी, सड़क और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं.
  • 31 दिसंबर 2014 के बाद आए परिवारों के लिए भी LTV और नागरिकता से जुड़े नियमों में व्यावहारिक संशोधन किए जाएं, ताकि वर्षों से भारत में रह रहे लोग कानूनी पहचान प्राप्त कर सकें.
  • फिर भी वापस नहीं जाना चाहते

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद लगभग हर परिवार एक बात जरूर कहता है—"जो भी है, अब यहीं रहना है."

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सोभराज भील बताते हैं कि यहां कागज बनने में समय लगता है, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन कम से कम बच्चों के भविष्य को लेकर वह डर नहीं है जो पाकिस्तान में हर दिन साथ चलता था.

शायद यही वजह है कि पाकिस्तान से आए हजारों हिंदुओं के लिए भारत आज भी संघर्ष की जमीन है, लेकिन उम्मीद की भी. वहां वे अपनी पहचान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे, यहां पहचान बनाने की. 

फर्क सिर्फ इतना है कि अब उन्हें भरोसा है कि एक दिन यह लंबा इंतजार खत्म होगा, उनके बच्चे बिना किसी सवाल के इसी देश के नागरिक कहलाएंगे और उन्हें फिर कभी यह नहीं सुनना पड़ेगा कि "तुम आखिर हो किस देश के?"
 

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