8 अप्रैल 1929 में काउंसिल हाउस में जिस दिन सेफ़्टी बिल पेश होना था. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस के असेंबली हॉल गए और वहां बम फेंककर विरोध जताया. हालांकि, इस विस्फोट से किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा. क्योंकि, उनका मकसद ही था सिर्फ लोगों का ध्यान खींचना, न कि किसी को नुकसान पहुंचाना.
काउंसिल हाउस में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस के असेंबली हॉल गए थे ताकि ये जायजा लिया जा सके कि पब्लिक गैलरी किस तरफ हैं और किस जगह से वहां बम फेंके जाएंगे.
वो ये हर कीमत पर सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके फेंके गए बमों से किसी का नुकासान न हो. हालांकि 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' पास किया जा चुका था, जिसमें मजदूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी लगा दी गई थी, लेकिन 'पब्लिक सेफ्टी बिल' पर फ़ैसला नहीं सुनाया गया था. इस बिल में सरकार को संदिग्धों को बिना मुकदमा चलाए हिरासत में रखने का अधिकार दिया जाना था.
8 अप्रैल को सदन की कार्यवाही शुरू होने से कुछ मिनट पहले भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस में प्रवेश कर गए थे. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भगत सिंह के बम फेंकने की घटना का जीवंत उल्लेख दुर्गा दास ने अपनी मशहूर किताब 'इंडिया फ़्रॉम नेहरू टू कर्ज़न एंड आफ़्टर' में किया है.
दुर्गा दास लिखते हैं कि 8 अप्रैल को जैसे ही अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल सेफ्टी बिल पर अपनी रूलिंग देने खड़े हुए भगत सिंह ने असेंबली के फर्श पर बम फेंक दिया. पुलिस वालों ने तुरंत असेंबली का मुख्य द्वार बंद कर दिया. मेरे सामने ही भगत सिंह और बटुकेशवर दत्त को हिरासत में लिया गया. उठते हुए धुएं के बीच स्पीकर विट्ठलभाई पटेल ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी.
भगत सिंह ने बम फेंकते समय इस बात का ध्यान रखा कि वो उसे कुर्सी पर बैठे हुए सदस्यों से थोड़ी दूर पर फ़र्श पर लुढ़काएं ताकि सदस्य उसकी चपेट में न आ सकें. जैसे ही बम फटा जोर की आवाज हुई और पूरा असेंबली हॉल अंधकार में डूब गया.