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माता-पिता ने दिवंगत बेटे और उसकी प्रेमिका की मूर्तियां बनवाईं... 22 साल से दोनों की करा रहे प्रतीकात्मक शादी

22 साल पहले अधूरे प्यार में टूटे एक युवा ने अपनी जान दे दी थी. कुछ ही दिन बाद उसकी प्रेमिका ने भी जिंदगी खत्म कर ली थी. इसके बाद माता-पिता ने घर में बेटे और उसकी प्रेमिका की मूर्तियां स्थापित कीं. अब हर साल श्रीराम नवमी पर दोनों की प्रतीकात्मक शादी की रस्म निभाते हैं, जिसे आसपास के लोग भी देखने पहुंचते हैं.

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प्रेमिका के परिजनों ने किया था रिश्ते का विरोध. (Photo: Screengrab)
प्रेमिका के परिजनों ने किया था रिश्ते का विरोध. (Photo: Screengrab)

तेलंगाना के महबूबाबाद की ये कहानी भावुक कर देने वाली है. यहां करीब 22 साल पहले एक जवान लड़के ने अधूरे प्यार में टूटकर अपनी जान दे दी थी. 20 दिन बाद उसकी प्रेमिका ने भी जिंदगी खत्म कर ली थी. इसके बाद माता-पिता ने अपने घर में दिवंगत बेटे और उसकी प्रेमिका की मूर्तियां लगवाईं. तब से हर साल दोनों की सिंबॉलिक शादी की रस्म निभाने लगे. राम नवमी को ये शादी की रस्म पूरी की जाती है, जिसमें आसपास के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं.

यह मामला महबूबाबाद जिले के बय्याराम मंडल के संतूलाल पोडू थांडा की है. यहां रहने वाले लालू और सुक्कम्मा ने 22 साल पहले अपने बेटे राम कोटि को खो दिया था. राम कोटि एक लड़की से प्यार करता था. वह शादी करना चाहता था, लेकिन लड़की के परिवार वाले इस रिश्ते के विरोध में थे.

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राम कोटि लड़की से बिछड़कर इतना टूट चुका था कि उसने अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली थी. वह प्यार में अपनी प्रेमिका से जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाया था. इसके करीब 20 दिनों के बाद लड़की ने भी जान दे दी थी.

यह भी पढ़ें: प्यार के लिए 1900 KM का सफर, मुंबई से मुजफ्फरपुर पहुंची प्रेमिका, मंदिर में रचाई शादी

इस घटना के बाद राम कोटि के माता-पिता पूरी तरह टूट चुके थे. उन्होंने अपने घर के अंदर राम कोटि और उसकी प्रेमिका दोनों की मूर्तियां बनवाकर स्थापित कराईं. दोनों की याद में एक छोटा सा मंदिर बनवाया.

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तब से हर साल श्रीराम नवमी के मौके पर राम कोटि के माता-पिता एक रस्म निभाते हैं.... राम कोटि और उसकी प्रेमिका की शादी की रस्म... मूर्तियों को सीता और राम मानकर उनकी कल्याणम (शादी) की रस्म पूरी की जाती है. यह रस्म पारंपरिक तरीके से निभाते हैं, जिसमें रिश्तेदारों और गांववालों को बुलाया जाता है.

इस प्रतीकात्मक शादी के बारे में जब लोगों को पता चला तो उनका दिल भर आया. धीरे-धीरे आसपास के गांवों के लोग भी मौके पर पहुंचने लगे. अब हर साल काफी संख्या में लोग इस रस्म को देखने के लिए मौके पर पहुंचते हैं. लालू और सुक्कम्मा के लिए यह सालाना रस्म सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि अपने बेटे और उसके अधूरे प्यार की यादों को जिंदा रखने का एक तरीका है.

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