अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने मिडिल-ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र के साथ-साथ वर्ल्ड सप्लाई चेन पर भी गहरा असर डाला है. खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदियों की वजह से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है. इसका सीधा असर भारत के साथ-साथ साउथ एशिया के फूड सिस्टम पर पड़ सकता है.
जैसे-जैसे भारत में खरीफ सीजन नजदीक आ रहा है, किसानों के सामने खाद और कीटनाशकों की कमी और बढ़ती कीमतें एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं. इंडिया टुडे और आजतक ने मध्य प्रदेश में किसानों, व्यापारियों और कृषि विशेषज्ञों से बातचीत कर इस संकट का आकलन किया.
शिवपुरी जिले के परिछा गांव के किसान अवतंश कुमार ने बताया कि बाजार में खाद और कीटनाशक की कमी है. उन्होंने कहा, 'यूरिया की एक बोरी, जो आमतौर पर 280 रुपये में मिलती थी, अब काले बाजार में 1200 रुपये तक बिक रही है.'
मध्य प्रदेश में लगभग 73% आबादी कृषि पर निर्भर है. राज्य सोयाबीन, दालें, गेहूं, तिलहन और बागवानी फसलों का बड़ा प्रोड्यूसर है. अवतंश के मुताबिक, एक एकड़ खेत में 4–5 बोरी यूरिया की जरूरत होती है. उनके पास 35 बीघा जमीन है, जिससे लागत काफी बढ़ गई है.
अवतंश ने कहा, 'मैंने गेहूं की कटाई कर ली है और अब प्याज बोने की तैयारी कर रहा हूं. अभी तक सिर्फ 20 बोरी ही खरीद पाया हूं. डीएपी (DAP) की कीमत भी तेजी से बढ़ी है. 1300 रुपये से बढ़कर 2100–2200 रुपये बोरी तक पहुंच गई है.'
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आयात पर निर्भरता और सप्लाई संकट
भारत अपनी खाद की जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. (यूरिया का 20–30% और डीएपी का लगभग 30%0. खाड़ी देशों (सऊदी अरब, कतर, यूएई, ओमान, बहरीन, ईरान) में नेचुरल गैस बेस्ड प्रोडक्शन होता है, जो ग्लोबल सप्लाई का बड़ा स्रोत है. मौजूदा संकट की वजह से शिपिंग और ईंधन लागत बढ़ने से सप्लाई पर असर पड़ा है.
कीटनाशकों की कीमतों में उछाल
झाबुआ के कीटनाशक व्यापारी मयंक मेलिवार के मुताबिक, संघर्ष शुरू होने के बाद कीटनाशकों की कीमतों में 15–25% की बढ़ोतरी हुई है. कुछ प्रोडक्ट्स के दाम, पैराक्वाट (1 लीटर) 225 रुपए से 300 रुपए हो गया. ग्लाइफोसेट (100 ग्राम) 45 रुपए से 55 रुपये हो गया. एसीफेट + इमिडाक्लोप्रिड पर 50 रुपए किलो बढ़ोतरी हुई है. कार्बेन्डाजिम + मैनकोजेब भी 100–125 रुपये से ऊपर पहुंच गया है. इस तरह अब किसानों का प्रति एकड़ खर्च 4000 रुपये से बढ़कर 5500–6000 रुपए तक पहुंच गया है.
छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा असर
झाबुआ के एक छोटे किसान ने कहा, 'मैंने गेहूं की कटाई कर ली है और तरबूज बोने की योजना है, लेकिन बढ़ती लागत की वजह से मुनाफा तय नहीं है. कम जमीन वाले किसानों के लिए ये संकट और भी गंभीर हो गया है.'
खरीफ फसलों पर खतरा
मध्य प्रदेश में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल सोयाबीन है, जो कुल क्षेत्रफल का 50% से ज्यादा कवर करती है. इसके अलावा धान, मक्का, दालें, ज्वार, बाजरा, कपास और तिल भी बोए जाते हैं. ये फसलें पहले से ही मानसून पर निर्भर हैं और अब बढ़ती लागत इनके उत्पादन को और जोखिम में डाल रही है.
व्यापारियों को नहीं मिल रहा पर्याप्त स्टॉक
रतलाम के खाद व्यापारी विमल कुमार कहते हैं, हमें पर्याप्त खाद नहीं मिल रही. जहां पहले 4000–5000 बोरी मिलती थी, इस बार सिर्फ 500 बोरी मिली है. उन्होंने ई-टोकन प्रणाली की खराबी और सप्लाई की कमी को व्यापार ठप होने का कारण बताया.
सरकारी आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत
सरकार के मुताबिक, मध्य प्रदेश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है. यूरिया- 2.81 लाख मीट्रिक टन, डीएपी- 84,004 मीट्रिक टन और एनपीके- 2.31 लाख मीट्रिक टन मौजूद है. लेकिन किसानों और व्यापारियों का कहना है कि ये स्टॉक बाजार तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.
विशेषज्ञों की चेतावनी
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, 'संकट अभी शुरू हुआ है और कीमतें आगे और बढ़ेंगी. कई प्रोडक्शन यूनिट बंद हो चुकी हैं.' भारत को खरीफ सीजन के लिए करीब 39 मिलियन मीट्रिक टन खाद की जरूरत होती है. सरकार अब रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया और मिस्र जैसे देशों से आपूर्ति के विकल्प तलाश रही है.
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प्राकृतिक खेती की ओर सुझाव
देविंदर शर्मा ने कहा, 'देशभर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम हो सके. उन्होंने आंध्र प्रदेश के मिसाल का हवाला देते हुए बताया कि वहां लगभग 8 लाख किसान पिछले 10–12 सालों से प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं.'
मिडिल-ईस्ट संकट का असर अब सीधे भारतीय कृषि और आम लोगों की थाली तक पहुंचने लगा है. अगर जल्द ही सप्लाई चेन सामान्य नहीं हुई और कीमतों पर काबू नहीं किया गया, तो आने वाले महीनों में फूड प्रोडक्शन और महंगाई दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है.