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C60 के जांबाज कमांडोज, मौत के साए के बीच माओवादियों को देते हैं कड़ी चुनौती

C60 कमांडोज एक ऐसी फोर्स है जिसे माओवादियों का सफाया करने के लिए बनाया गया है. इन कमांडोज पर खुद को बचाए रखने के लिए भी कड़ा संघर्ष करना होता है.

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C60 के कमांडोज
C60 के कमांडोज

नक्सली समस्या से देश के कई राज्य पीड़ित हैं, और वे अपने-अपने स्तर पर इस पर काबू पाने की कोशिशों में जुटे भी हैं. महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आता है. इन नक्सलियों से लड़ने और उन पर नकेल कसने के लिए महाराष्ट्र में एक खास तरह की फोर्स है जिसके काम करने का अपना अलग ही अंदाज है.

C60 कमांडोज महाराष्ट्र पुलिस की खास फोर्स है जिसे वाम विचारधारा से जुड़े नक्सिलयों से लड़ने के लिए खास तरीके से प्रशिक्षित किया गया है. इंडिया टुडे ने इन कमांडोज के काम करने के तरीके और उनके अभियान पर होने के दौरान आने वाली दिक्कतों की पड़ताल की.

15 किलो का सामान ढोता है एक कमांडो

एक कमांडो अपने अभियान पर निकलने के दौरान पीठ पर करीब 15 किलो वजन का सामान भी ढोता है, जिसमें हथियार, खाना, पानी, रोजाना इस्तेमाल की चीजों के अलावा फर्स्ट एड जैसी जरूरी चीजें शामिल होती हैं.

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हर सुबह फोर्स खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर आगे की रणनीति बनाती है और उसी के आधार पर आसपास के क्षेत्र में अपनी योजना को अंजाम देते हैं. सब डीविजनल पुलिस ऑफिसर (SDPO) बासवराज शिवपुजे रोजाना के ऑपरेशंस के बारे में कमांडोज को बालू पर मॉडल बनाकर अगली रणनीति की जानकारी देते हैं.

इसके बाद 2 ग्रुपों में 30-30 कमांडोज बंट जाते हैं, जिसमें से एक ग्रुप अपने पोस्ट से फ्रंट गेट से आगे बढ़ता है, जबकि दूसरा ग्रुप पीछे से निकलता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि क्षेत्र में कितने कमांडोज हैं, इसका पता न लग सके.

घने जंगलों में जाकर मिलते हैं दोनों ग्रुप

दोनों टीमें अलग-अलग दिशा से जंगल में प्रवेश करती हैं और फिर करीब एक किलोमीटर अंदर जाकर मिल जाती हैं. गढ़चिरौली महाराष्ट्र का वो क्षेत्र है जो नक्सल से सबसे ज्यादा प्रभावित है. यहां के घने जंगलों में हर महीने एक-दो काउंटर होते ही रहते हैं.

माओवादी घात लगाकर हमला करने के अलावा जवानों को अपना शिकार बनाने के लिए लैंडमाइंस और विस्फोटक लगाते हैं.

तकनीक के भरोसे कमांडोज

दूसरी ओर, C60 कमांडोज पूरी तरह से अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं, गढ़चिरौली पुलिस के पास 4 स्पेशलिस्ट ड्रोन है जिसके पास 4 हजार गुना हाई डिफिनेशन (HD) की इमेज रिजोल्यूशन की क्षमता है. इसका इस्तेमाल गश्त लगाने के दौरान जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए किया जाता है. ड्रोन बेहद धीमी आवाज में उड़ान भर सकता है जिससे माओवादियों को पता न लगे और 500 मीटर ऊंचाई तक की तस्वीरें भी निकाल सकता है.

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इंडिया टुडे से बातचीत में SDPO शिवपुजे ने कहा, "ड्रोन किसी संदेहास्पद हरकत के बारे में भी पता लगा सकता है. इसका ज्यादातर प्रयोग खुफिया से मिली जानकारी पर अमल के दौरान किया जाता है." कमांडोज के पास एक अन्य आधुनिक तकनीक GPS की भी सुविधा मौजूद है.

C60 कमांडोज GPS के इस्तेमाल के बारे में बताते हैं कि हम गश्त पर निकलने से पहले GPS सेट करते हैं. घने जंगलों में सही दिशा में जा पाना बेहद मुश्किल होता है, इसलिए ये हमारे लिए कारगर होते हैं. ये कमांडोज जनजातीय गांवों में अपनी पहुंच बनाए रखते हैं क्योंकि माओवादी इन लोगों के सहयोग के बिना कुछ भी नहीं कर सकते. इसलिए कमांडोज की कोशिश रहती है कि माओवादी और जनजातीय लोगों के बीच दूरी बनाई रखी जाए.

खतरनाक जानवरों से पड़ता है पाला

कमांडोज अपने सफर के दौरान घने जंगल, नदियां और पहाड़ी आदि का सामना करते हैं. गश्त के दौरान वे अपने साथ खाने की सूखी चीजें साथ रखते हैं. किसी निर्धारित और सुरक्षित जगह पर मिलकर खाना पकाते हैं. खाना पकने के दौरान कुछ कमांडोज पानी लेने के लिए भी निकलते हैं.

सब इंसपेक्टर सचिन जाधव कहते हैं कि हम कमांडोज 14 किलो का सामान पीठ पर रखते हैं, इसलिए कोशिश होती है कि ज्यादा पानी साथ में न हो. अपने गश्त के दौरान नाला, कुआं और नदी का पानी पीने से कमांडोज को डीहाइड्रैशन और पेट दर्द जैसी कई दिक्कतें हो जाती हैं. गरमी के सीजन में अतिसूक्ष्म जीव काफी परेशान करते हैं. इस दौरान हमें मच्छरों और सांपों जैसे कई खतरनाक जीवों से भी बचना होता है.

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गश्त के दौरान इन जवानों की जिंदगी एक तरफ जंगल में मौजूद जीव-जंतुओं से घिरी रहती है तो दूसरी तरफ माओवादियों के आक्रमण का भी खौफ बना रहता है.

नवनाथ गीदम याद करते हुए बताते हैं कि 2009 में मुम्नेर गांव में माओवादियों ने हम पर घात  लगाकर हमला बोल दिया, 30 में से 3 लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 से 6 लोग घायल हो गए. इस संघर्ष के दौरान बुरी बात यह रही कि हमारी मदद के लिए लोग 3 घंटे बाद यहां पहुंचे, तब जाकर जवानों को बचाया जा सका.

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