पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले BJP ने पूरे राज्य में अपना अभियान तेज कर दिया है. इसके लिए वो काफी हद तक AAP के पूर्व नेताओं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के अनुभव पर भरोसा कर रही है, जिन्होंने राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार में अहम भूमिका निभाई थी. BJP अपनी रणनीति के केंद्र में संगठनात्मक विस्तार और नशे की समस्या को भी रख रही है.
भारतीय जनता पार्टी के लिए पंजाब में विस्तार योजना हमेशा हाशिए पर रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है. पार्टी ने इस बार पूरी तरह फोकस कर लिया है. उसे यहां एक ऐसा अवसर नजर आ रहा है, जहां दूसरों को मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं. BJP का लक्ष्य साफ है, संगठन को मजबूत करना और नशे की समस्या को राजनीतिक मुद्दा बनाना है.
इसके साथ ही आगामी विधानसभा चुनावों में खुद को सत्ता का गंभीर दावेदार साबित करना. इसके संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं. गृह मंत्री अमित शाह के पंजाब दौरे बढ़ गए हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि आने वाले महीनों में जनसंपर्क अभियान और तेज होगा. BJP के भीतर संदेश साफ है कि पंजाब अब केवल एक औपचारिक राजनीतिक पड़ाव नहीं है.
यह पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी रणक्षेत्रों में शामिल हो चुका है. इस बार BJP अकेले चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार नजर आ रही है. पंजाब की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहने का दौर खत्म होता दिख रहा है. हालिया राजनीतिक लाभ और बढ़ते आत्मविश्वास से BJP नेताओं के अंदर बहुत उत्साह नजर आ रहा है.
उनका मानना है कि यदि BJP पूरी ताकत और संसाधनों के साथ मैदान में उतरे, तो पंजाब में सत्ता हासिल करना अब कोई दूर का सपना नहीं है. इस राजनीतिक कहानी को दिलचस्प बनाती है दो नेताओं की भूमिका. पहला संदीप पाठक और दूसरा राघव चड्ढा. दोनों ने दिल्ली के बाहर AAP की सबसे बड़ी सफलता दिलाने में अहम योगदान दिया था. अब BJP में शामिल हो गए हैं.
पिछले विधानसभा चुनाव में AAP की बड़ी जीत से काफी पहले ही संदीप पाठक राज्य में पार्टी की नींव मजबूत करने में जुटे हुए थे. संगठन के भीतर उन्होंने एक ऐसे रणनीतिकार की छवि बनाई, जो दिखावे से ज्यादा नतीजों पर भरोसा करता था. कैम्ब्रिज से पढ़ाई के बाद IIT दिल्ली में अध्यापन करने वाले संदीप पाठक ने राजनीति में भी एक शोधकर्ता की तरह काम किया.
सर्वेक्षण, आंकड़ा संग्रह, बूथ स्तर की मैपिंग, स्वयंसेवकों का नेटवर्क और संगठनात्मक अनुशासन उनकी रणनीति के मुख्य आधार बने. उनका तरीका कभी बहुत आकर्षक नहीं दिखता था, लेकिन प्रभावी जरूर था. उन्होंने वर्षों तक जमीनी हकीकत को समझने, पार्टी कैडर को मजबूत करने और संभावित समर्थन वाले इलाकों की पहचान करने में समय लगाया.
AAP के पंजाब मॉडल के 'साइलेंट मास्टरमाइंड'
संदीप पाठक के साथ राघव चड्ढा भी थे, जो इस अभियान का सार्वजनिक चेहरा बनकर उभरे. पंजाब के सह-प्रभारी के तौर पर उन्होंने दिल्ली नेतृत्व और राज्य इकाई के बीच सेतु का काम किया. उन्होंने राजनीतिक संदेशों को धार दी, विभिन्न हितधारकों से तालमेल बैठाया और चुनावी रणनीति को जीत में बदलने में मदद की थी. एक नेता पर्दे के पीछे काम कर रहा था, दूसरा मंच पर नेतृत्व कर रहा था.
दोनों ने मिलकर पंजाब के हालिया इतिहास की सबसे बड़ी चुनावी जीतों में से एक को संभव बनाया. सूत्रों के मुताबिक, BJP इसी अनुभव का लाभ उठाना चाहती है. पार्टी नेताओं का मानना है कि सबसे बड़ी जरूरत संगठन को जमीनी स्तर से मजबूत करने की है. पंजाब की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले पाठक और चड्ढा इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं.
संगठन पर निर्भर करती राजनीतिक स्थाई सफलता
सूत्रों ने इंडिया टुडे टीवी को बताया कि आने वाले महीनों में दोनों नेताओं को राज्य में BJP की पकड़ मजबूत करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है. राजनीति अक्सर नारों और कहानियों से जीती जाती है, लेकिन स्थायी सफलता संगठन पर निर्भर करती है. कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि AAP में संदीप पाठक की भूमिका कम होने के असर अब दिखाई देने लगे हैं.
संदीप पाठक ने जिन व्यवस्थाओं को खड़ा किया था, जैसे सर्वेक्षण, कार्यकर्ता नेटवर्क, बूथ प्रबंधन और सूक्ष्म स्तर की चुनावी योजना, वे पंजाब में AAP के उभार की बुनियाद थीं. अब जब AAP को सत्ता विरोधी लहर और शासन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, तब यह सवाल उठने लगा है कि क्या उसकी संगठनात्मक मशीनरी पहले जैसी प्रभावी बनी हुई है. BJP इसे अवसर मान रही है.
AAP के 7 सांसद और BJP के लिए नया मौका
हालांकि, स्वीकार्यता को BJP नेता एक बड़ी चुनौती मानते हैं. हाल की कुछ सफलताओं के बावजूद पंजाब का एक वर्ग अब भी BJP को संदेह की नजर से देखता है. इस धारणा को बदलना पार्टी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. BJP की उम्मीदें AAP से जुड़े रहे सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी में आने से और बढ़ गई हैं. पार्टी के भीतर इन नेताओं को सिर्फ चेहरे के तौर पर नहीं देखा जा रहा.
वे अपने साथ राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक नेटवर्क और क्षेत्रीय पहचान लेकर आए हैं. इससे BJP को उन इलाकों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में मदद मिल सकती है, जहां वह परंपरागत रूप से कमजोर रही है. जिला इकाइयों से लेकर बूथ स्तर तक, पार्टी इन नेताओं के जरिए संगठन विस्तार की रफ्तार बढ़ाना चाहती है. पंजाब में राजनीतिक नेटवर्क अक्सर संदेशों जितने ही महत्वपूर्ण होते हैं.
BJP की रणनीति के केंद्र में नशा अहम मुद्दा
BJP ने पंजाब में नशे की समस्या को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला किया है. पार्टी राज्यव्यापी जनसंपर्क कार्यक्रमों और यात्राओं की तैयारी कर रही है. उसका प्रयास है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया जाए. अमित शाह के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है. पार्टी इसे दीर्घकालिक चुनौती के रूप में देखती है.
ये मुद्दा जाति, क्षेत्र और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर लोगों को प्रभावित करती है. यह देखना बाकी है कि यह रणनीति मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है, लेकिन इतना तय है कि BJP इसे 2027 चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने जा रही है. सबसे बड़ा बदलाव शायद मनोवैज्ञानिक स्तर पर हुआ है. दशकों तक BJP ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन के जरिए राजनीति करती रही है.
अब यह समीकरण बदल चुका है. पार्टी का मानना है कि बढ़ते वोट शेयर ने उसे एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने का अवसर दिया है. 2019 से 2024 के बीच उसका वोट प्रतिशत लगभग दोगुना हुआ. भले ही सीटों में इसका बड़ा फायदा नहीं मिला, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के प्रदर्शन ने नेतृत्व का आत्मविश्वास बढ़ाया है. BJP आगामी चुनावों में इसे भुनाना चाहती है.
BJP के रणनीतिकारों का मानना है कि पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य पहले की तुलना में ज्यादा अस्थिर है. AAP पर शासन का दबाव है और सत्ता विरोधी माहौल भी बन रहा है. कांग्रेस अभी भी अंदरूनी संघर्षों से जूझ रही है. वहीं अकाली दल अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहा है. पार्टी को लगता है कि इन परिस्थितियों ने मिलकर एक दुर्लभ अवसर पैदा किया है.
पंजाब में BJP के लिए 2027 का सफर
पंजाब BJP के लिए अब भी सबसे चुनौतीपूर्ण राज्यों में से एक है. पार्टी नेतृत्व जानता है कि केवल नारे और प्रचार से बात नहीं बनेगी. इसलिए संगठन निर्माण, कार्यकर्ता विस्तार और लगातार राजनीतिक संवाद उसकी रणनीति के केंद्र में हैं. और यहीं इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना भी है. जिन तरीकों ने कभी AAP को पंजाब में चुनावी सफलता दिलाई, उन्हें तैयार करने में संदीप पाठक की बड़ी भूमिका थी.
राघव चड्ढा ने उन्हें राजनीतिक गति देने का काम किया था. अब BJP उम्मीद कर रही है कि वह उसी राजनीतिक जमीन का फायदा उठा सकेगी, जिसे तैयार करने में कभी इन दोनों नेताओं की भूमिका रही थी. पंजाब का 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसके लिए राजनीतिक मोर्चेबंदी अभी से शुरू हो चुकी है. बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह अपनी कमर कस चुके हैं.