लोकसभा चुनाव 2024 के बाद ही भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हो गया था. बीजेपी ने देशभर में संगठन का गठन पूरा करने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी. बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए नितिन नबीन ने सोमवार को अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक उनके प्रस्तावक बने. ऐसे में नितिन नबीन पार्टी के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुनना तय है.
बीजेपी अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए सोमवार को दो बजे से चार बजे तक नामांकन पत्र भरे गए. इस पद के लिए नितिन नबीन एकमात्र उम्मीदवार हैं. ऐसे में उनका बीजेपी अध्यक्ष बनना तय है. आधिकारिक ऐलान पीएम मोदी की मौजूदगी में मंगलवार को किया जाएगा.
भारतीय जनता पार्टी के गठन के 45 साल के सियासी इतिहास में पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता पार्टी की कमान संभाल चुके हैं. अभी तक बीजेपी के 11 राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं और नितिन नबीन पार्टी के 12वें अध्यक्ष के तौर पर कमान संभाल रहे हैं. वे पार्टी के सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे.
बीजेपी अध्यक्ष का कैसे होता है चुनाव?
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की लंबी प्रक्रिया होती है. पहले प्रदेश संगठनों का चुनाव होता है और उसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पार्टी की राष्ट्रीय परिषद और राज्य परिषदों के प्रतिनिधियों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता हैय इस प्रक्रिया की देखरेख पार्टी के राष्ट्रीय निर्वाचन अधिकारी की ओर से की जाती है.
बीजेपी के संविधान के मुताबिक, किसी राज्य के निर्वाचक मंडल के कोई भी 20 सदस्य संयुक्त रूप से राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए ऐसे व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकते हैं, जो चार कार्यकाल तक सक्रिय सदस्य रहा हो और जिसकी सदस्यता के पंद्रह वर्ष पूरे हो चुके हों. हालांकि, ऐसा संयुक्त प्रस्ताव कम से कम पांच राज्यों से आना चाहिए जहां राष्ट्रीय परिषद के लिए चुनाव संपन्न हो चुके हैं.
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बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव को लिए राष्ट्रीय निर्वाचन अधिकारी के लक्ष्मण हैं, जिन्होंने शुक्रवार को चुनाव कार्यक्रम का ऐलान किया. साथ ही जरूरत पड़ने पर 20 जनवरी को मतदान होगा और उसी दिन बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम की आधिकारिक घोषणा कर दी जाएगी. नितिन नबीन के सिवा किसी दूसरे नेता ने अगर नामांकन दाखिल नहीं किया तो उनका निर्विरोध चुना जाना तय है.
बीजेपी में कौन-कौन रहा राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ है. 45 साल पहले जनता पार्टी से भारतीय जनता पार्टी बनी तब शायद किसी ने सोचा नहीं होगा कि पार्टी शोहरत और कामयाबी के इस मुकाम तक पहुंचेगी. जनसंघ से बीजेपी तक, अटल युग से मोदी युग तक. बीजेपी के 12 वें अध्यक्ष नितिन नबीन होंगे. 45 सालों के सियासी सफर में बीजेपी ने कई दौर देखें हैं. तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक की यात्रा तय की है.
6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी छोड़कर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी बनाई थी. तब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चलने का फैसला किया. अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए. 1980 से लेकर 1986 तक अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी की कमान संभाली.
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1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी महज 2 सीट पर सिमट गई, जिसके बाद पार्टी की कमान लाल कृष्ण आडवाणी को सौंपी गई. आडवाणी 1986 में बीजेपी के अध्यक्ष चुने गए थे और 1991 तक पार्टी की कमान संभाली. ऐसे में आडवाणी ने आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति शुरू की और राम मंदिर जैसे मुद्दे को अधिकारिक तौर पर पार्टी ने अपने एजेंडे में शामिल किया. बीजेपी 2 सीटों से बढ़कर 1989 में 76 तक पहुंची और किंगमेकर बनकर उभरी. 1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं. इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई।
अटल-आडवाणी-जोशी की सियासी तिकड़ी
अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद बीजेपी अध्यक्ष की कमान मुरली मनोहर जोशी ने संभाली. बीजेपी में इन तीनों नेताओं की सियासी तिकड़ी काफी हिट रही. मुरली मनोहर जोशी ने 1991 में बीजेपी अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने उसी साल दिसंबर में तिरंगा यात्रा निकाली. 26 जनवरी 1992 को जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया. इस तरह राष्ट्रवाद को धार दिया और उनके अध्यक्ष रहते हुए 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी विध्वंस हुआ.
मुरली मनोहर जोशी ने 1991 से 1993 तक बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. इसके बाद बीजेपी की कमान दोबारा से लालकृष्ण आडवाणी को सौंप दी गई. आडवाणी ने अपने सियासी तेवर और आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के रास्ते बीजेपी को देश की नंबर पार्टी बनाने की कवायद में जुट गए. आडवाणी के दूसरे कार्यकाल में बीजेपी केंद्र की सत्ता में पहली बार आई. 13 महीने की सरकार बनी. इस तरह 1993 से 1998 तक आडवाणी अध्यक्ष रहे.
कुशाभाऊ और बंगारू बने बीजेपी के चीफ
देश की सत्ता में पहली बार बीजेपी के आने के बाद पार्टी की कमान कुशाभाऊ ठाकरे को सौंप दी है, जिन्हें बीजेपी में पितृ पुरुष कहा जाता है. कुशाभाऊ के अध्यक्ष बनने के बाद मध्य प्रदेश में बीजेपी की सियासी जड़े काफी मजबूत हुई, जिसके बदौलत ही आजतक सत्ता में बनी हुई है. 1998 से लेकर 2000 तक कुशाभाऊ बीजेपी के अध्यक्ष पद संभाला.
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कुशाभाऊ ठाकरे के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद साल 2000 में बंगारू लक्ष्मण बीजेपी संगठन की कमान संभाली. आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण पहले दलित नेता थे, जिन्होंने बीजेपी के अध्यक्ष बने थे. हालांकि, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसने के बाद इस्तीफा देना पड़ जाता है. इस तरह बंगारू लक्ष्मण एक साल तक ही पार्टी संगठन की बागडोर संभाली. बंगारू लक्ष्मण के बाद जेना कृष्णमूर्ति 2001 में बीजेपी के राष्ट्रीय बने घए और 2002 तक पद रह.
एलके आडवाणी तीसरी बार अध्यक्ष बने
कृष्णामूर्ती के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडु बने. साल 2002 से 2004 तक अपने पद पर रहे. वेंकया नायडू के अध्यक्ष रहते हुए 2004 में लोकसभा चुनाव हुए थे, लेकिन इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में सौंप दी जाती है. आडवाणी 2004 में तीसरी बार बीजेपी के अध्यक्ष चुने जाते हैं और 2005 तक पार्टी की कमान संभाली. पाकिस्तान की यात्रा पर आडवाणी जाते हैं और वहां पर जिन्ना की मजार पर जाकर तारीफ कर देते हैं. इसके चलते उन्हें बीजेपी अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ता है.
राजनाथ से लेकर गडकरी तक ने संभाली
आडवाणी के अध्यक्ष पद छोड़ने बाद साल 2005 में बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह को सौंप दी जाती है. राजनाथ सिंह 2005 से लेकर 2009 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहते हैं और उन्हीं के अध्यक्ष रहते लोकसभा चुनाव होता है. इस चुनाव में बीजेपी को करारी मात खानी पड़ती है. इसके बाद राजनाथ सिंह की जगह बीजेपी की कमान नितिन गडकरी को सौंपी गई.
नितिन गडकरी 2010 में बीजेपी के राष्ट्रीय चुने गए और तीन साल तक पार्टी संगठन को सियासी धार दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष के बदल दिए जाते हैं. गडकरी की जगह राजथान सिंह को फिर संगठन की कमान सौंपी जाती है. राजनाथ सिंह 2013 में दोबारा से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाते हैं, उनके अगुवाई में 2014 में चुनाव होता है, लेकिन पीएम पद के चेहरे नरेंद्र मोदी होते हैं.
नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का बीजेपी को फायदा होता है और पहली बार पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ देश की सत्ता में विराजमान होती है. यहीं से बीजेपी सबसे बेहतर दौर शुरू होता है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और उनकी कैबिनेट में राजनाथ सिंह के गृहमंत्री बनने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ता है.
अमित शाह से जेपी नड्डा तक बने बीजेपी अध्यक्ष
राजनाथ सिंह के बीजेपी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद पार्टी की कमान अमित शाह ने संभाली और फिर पार्टी का देश भर में विस्तार हुआ. अमित शाह पहली बार 2014 से 2017 तक और उसके बाद 2017 से 2020 तक अध्यक्ष पद संभाला. अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी 2019 में सत्ता में रिपीट किया. इसके बाद अमित शाह केंद्र की मोदी सरकार में गृहमंत्री बन गए, जिसके बाद उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा.
अमित शाह के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर जेपी नड्डा की ताजपोशी हुई. जेपी नड्डा पहले 2019 में बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बने और फिर 2020 में राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए. इस तरह 2020 से लेकर अभी तक जेपी नड्डा बीजेपी की कमान संभाल रहे थे, उनके अगुवाई में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाकर इतिहास रचा.
बीजेपी को 45 साल बाद मिला 45 साल का अध्यक्ष
जेपी नड्डा की जगह पर पहले नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और अब उनकी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो रही है. नितिन नबीन अभी सिर्फ 45 साल के हैं. इस तरह नितिन नबीन को पार्टी यह जिम्मेदारी देकर साबित कर दिया है कि बीजेपी भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए नई लीडरशिप तैयार कर रही है.
नितिन नवीन पहले यह रिकॉर्ड अमित शाह के नाम था, जिन्होंने 49 वर्ष की उम्र में पार्टी की कमान संभाली थी. उनसे पहले नितिन गडकरी 52 वर्ष की उम्र में अध्यक्ष बने थे. ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय जनसंघ के दौर में कम उम्र में अध्यक्ष बने थे. इस फैसले के जरिए बीजेपी ने युवाओं को सीधा संदेश दिया है कि पार्टी में उम्र बाधा नहीं है.
सामाजिक दृष्टि देखें तो नितिन नबीन कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिनकी संख्या चुनावी राजनीति में निर्णायक नहीं मानी जाती. इसके बावजूद उन्हें पार्टी का शीर्ष पद सौंपना यह दर्शाता है कि बीजेपी नेतृत्व चयन में जातिगत गणित से ऊपर उठकर संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक समझ को प्राथमिकता दे रही है. संगठन में काम करने वाला, जमीन से जुड़ा और चुनावी चुनौतियों को समझने वाला कार्यकर्ता शीर्ष तक पहुंच सकता है.