असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने उग्रवादी संगठन उल्फा-स्वतंत्र (ULFA-Independent) के कमांडर परेश बरुआ को बतौर मेहमान असम में बुलाया है. हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि उल्फा चीफ को बदले हुए असम को देखना चाहिए. हिमंता बिस्वा सरमा ने उल्फा (आई) के प्रमुख परेश बरुआ को एक 'अतिथि' के तौर पर राज्य की यात्रा करने और दशकों बाद बदली हुई स्थिति का गवाह बनने के लिए आमंत्रित किया.
उल्फा को भारत सरकार उग्रवादी संगठन मानती है और इसे प्रतिबंधित किया गया है. ULFA-I स्वतंत्र असम की मांग करती आई है और इस भूभाग को भारत से अलग करना चाहती है. ULFA-I के कमांडर रहे परेश बरुआ पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों का प्रमुख चेहरा रहे हैं.
परेश बरुआ के नेतृत्व में ULFA-I ने असम में कई हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया है. कुछ साल पहले ULFA-I ने भारत की दिग्गज पेट्रोलियम कंपनी ओएनजीसी के तीन कर्मचारियों को किडनैप कर लिया था. 2020 में ULFA-I और एनएससीएन-के ने मिलकर फिरौती के लिए दिल्ली स्थित तेल और गैस कंपनी क्विप्पो के दो कर्मचारियों का अपहरण कर लिया था. हालांकि बाद में दोनों को बिना किसी नुकसान के रिहा कर दिया है.
हिमंता ने उग्रवादी संगठन के कमांडर को क्यों दिया न्योता?
असम सीएम हिमंता ने कहा है कि परेश बरुआ को असम के बदलाव का गवाह बनने के लिए यहां कम से कम एक सप्ताह गुजारना चाहिए. सीएम हिमंता ने कहा, "परेश बरुआ खुद एक जानकार व्यक्ति हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वह आएंगे क्योंकि मैंने उन्हें आमंत्रित किया है. उसके पास अपनी बुद्धि और तर्क है. हालांकि, मुझे लगता है कि अगर वह सिर्फ सात दिन असम में रहेंगे, तो उन्हें एहसास होगा कि पुराना असम बहुत बदल गया है."
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बदले असम को देखने के लिए आएं बरुआ
सरमा ने कहा कि एक समय बरुआ को लगता था कि बाहरी लोगों ने असम में हर चीज पर कब्जा कर लिया है, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. असमिया युवा आजकल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अधिकतम संख्या में रहते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि 1982-83 के दौरान जो हुआ वह अब वजूद में नहीं है.
असम की बदली छवि को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि वे परेश बरुआ की यात्रा की व्यवस्था करने के लिए भी तैयार हैं. हिमंता ने कहा, "हां, सब कुछ... जैसा कि मैं उन्हें आमंत्रित करने की बात कर रहा हूं, मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ आमंत्रित करूंगा. यदि वह आते हैं और 7-10 दिनों के लिए रहते हैं, तो वह स्वयं स्थिति को समझेंगे." सरमा ने यह भी कहा कि उल्फा में शामिल हुए कई युवा वापस आ गए हैं और कई अन्य भी मुख्यधारा में वापस आना चाहते हैं.
असम के बेस्ट गोलकीपर से विद्रोही कमांडर बनने वाले बरुआ
आखिर कौन हैं परेश बरुआ? असम की राजनीति और असमिया समाज में उनकी कैसी धाक है? सवाल है कि सीएम हिमंता उन्हें क्यों बुला रहे हैं.
इन सवालों के जवाब असम में अलगाववादी आंदोलन की राजनीति में छिपे हुए हैं. 1980 के दशक में जब असम में अलगाववाद की मांग जोर पकड़ने लगी तो कई युवाओं ने हथियार उठा लिया. इन्हीं युवाओं ने उल्फा का गठन किया. इस दौरान असम में 6 सालों तक (1979-85) तक सशस्त्र संघर्ष का दौर चला. 1957 में जन्में परेश बरुआ ने इसी उल्फा की कमान संभाली और वे इसके कमांडर बने. इससे पहले बरुआ ऑयल इंडिया की ओर से फुटबॉल खेला करते थे. वे असम के टॉप गोलकीपरों में भी शामिल रहे हैं.
उल्फा आई के स्वयंभू कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ पूर्वोत्तर फ्रंटियर रेलवे के कर्मचारी भी रहे हैं.
जब वह 21 वर्ष के थे तब उन्होंने 1978 में पूर्वी असम के तिनसुकिया डिवीजन में रेलवे में खेल कोटा के तहत कुली की नौकरी मिली थी. एक नौकरी उन्हें खेल कोटा के तहत मिली थी. कहा जाता है कि फुटबॉल के गेंद उनके पैरों पर नाचती थी. बतौर गोलकीपर भी वे गजब का कमाल दिखाते थे.
परेश बरुआ ने 1990 के दशक में उल्फा के सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया. 2000 के दशक में, उन्होंने उल्फा के राजनीतिक अभियानों का नेतृत्व किया. परेश बरुआ सख्ती से मानते रहे हैं कि असम का भारत से अलग वजूद होना चाहिए ताकि वह अपनी संस्कृति और पहचान को संरक्षित कर सके.
उल्फा के साथ भारत सरकार ने कई बार बात करनी चाही. लेकिन उल्फा में आपस में टकराव से इस कोशिश में बाधा पैदा होती रही. आखिरकार 2010 में उल्फा दो भागों में बंट गया. एक हिस्से का नेतृत्व अरबिंद राजखोवा ने किया, जो सरकार के साथ बातचीत के पक्ष में थे और दूसरे का नेतृत्व बरुआ के नेतृत्व में था, जो बातचीत के विरोध में था.
सितंबर 2011 में, राजखोवा के नेतृत्व वाले गुट ने केंद्र और असम सरकार के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस के लिए एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
इधर विभाजन के बाद, बरुआ के नेतृत्व वाले गुट ने 2013 में अपना नाम बदलकर उल्फा (आई) कर लिया.
अभी कहां हैं परेश बरुआ?
असम में हिंसक गतिविधियों में शामिल परेश बरुआ को जब इंडियन आर्मी ने खदेड़ना शुरू किया तो उसे असम से भागना पड़ा. इस मौके पर उसने असम से सटे म्यामांर में शरण ली. कहा जाता है कि इस वक्त परेश बरुआ चीन और म्यांमार के बॉर्डर पर स्थित रुइली में चीन की सरपरस्ती में दिन काट रहा है.
हाल के सालों में असम में परेश बरुआ के प्रभाव और लोकप्रियता में कमी आई है. माना जा रहा है कि सीएम हिमंता की ओर से परेश बरुआ को असम दौरे का दिया गया प्रस्ताव एक तरह का शांति प्रस्ताव है.