'मुझे घर वापस ले चलो...' यह दर्द सिर्फ तीन बेटियों का नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का आईना बन गया है, जहां शादी के बाद भी कई महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं. भोपाल की ट्विशा शर्मा, नोएडा की दीपिका नागर और ग्वालियर की पलक रंजन की मौत ने एक बार फिर दहेज प्रथा, घरेलू प्रताड़ना और न्याय व्यवस्था की धीमी प्रक्रिया पर गंभीर बहस छेड़ दी है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में आज ट्विशा मामले पर सुनवाई हो रही है.
तीनों युवतियां अलग-अलग शहरों से थीं, लेकिन उनकी जिंदगी का आखिरी दौर लगभग एक जैसा रहा. परिवारों का आरोप है कि ससुराल पक्ष लगातार दहेज, पैसे और महंगे सामान की मांग को लेकर मानसिक और शारीरिक दबाव बना रहा था. समाज में दहेज अब खुले तौर पर नहीं, बल्कि महंगी शादियों, उपहारों और दिखावे के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है, जबकि तलाक को आज भी कई परिवार बदनामी मानते हैं.
दहेज प्रताड़ना से रोज 16 महिलाओं की जाती है जान
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में देश में 5,737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में हुई. यानी औसतन हर दिन 16 महिलाओं ने दहेज प्रताड़ना की वजह से जान गंवाई. अदालतों में भी ऐसे हजारों मामले लंबित हैं और दोषसिद्धि की दर बेहद कम बनी हुई है.
ट्विशा, दीपिका और पलक की कहानी
भोपाल की ट्विशा शर्मा शादी के कुछ महीनों बाद ही संदिग्ध हालात में ससुराल में मृत मिलीं. ग्वालियर की पलक रंजन ने भी शादी के करीब एक साल बाद आत्महत्या कर ली, जबकि ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की मौत इमारत से गिरने के बाद हुई. तीनों मामलों में परिवारों ने दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं.
मायके लौटना चाह रही थी ट्विशा
बताया जा रहा है कि ट्विशा अपनी मौत से पहले लगातार परिवार से संपर्क में थीं और उन्हें मायके ले जाने की बात कह रही थीं. दीपिका ने भी कथित तौर पर रोते हुए अपने पिता को फोन कर प्रताड़ना की जानकारी दी थी. वहीं सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर पलक रंजन ने मौत से कुछ समय पहले अपने भाई से बात की थी और पहले से मानसिक तनाव से जुड़े संकेत सोशल मीडिया पर साझा कर रही थीं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि सामाजिक दबाव और पारिवारिक प्रतिष्ठा का डर महिलाओं को अपमानजनक रिश्तों से बाहर निकलने से रोकता है. फॉरेंसिक मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. दीप्ति पुराणिक के अनुसार, बचपन से लड़कियों को शादी बचाने की सीख दी जाती है, जिसके कारण आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद वे मानसिक रूप से खुद को स्वतंत्र महसूस नहीं कर पातीं.
क्या बोलीं सुप्रीम कोर्ट की वकील?
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सीमा कुशवाहा का कहना है कि भारतीय समाज में आज भी तलाक और दोबारा शादी को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाता. ऐसे में परिवार अक्सर बेटियों को समझौता करने की सलाह देते हैं. वहीं अधिवक्ता आभा सिंह के मुताबिक दहेज अब आधुनिक रूप ले चुका है, जिसमें आलीशान शादी, महंगे उपहार और दिखावटी खर्च शामिल हैं.
जानकारों का यह भी कहना है कि कमजोर फॉरेंसिक जांच, सबूतों की कमी और वर्षों तक चलने वाले मुकदमे आरोपियों को फायदा पहुंचाते हैं. कई बार परिवार सामाजिक दबाव या बच्चों के भविष्य को देखते हुए केस भी वापस ले लेते हैं.
पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने कहा कि दहेज मौत के मामलों में वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी है. पोस्टमार्टम, ब्लड टेस्ट और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच से ही सच्चाई सामने आ सकती है.
इन तीनों घटनाओं ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कानून होने के बावजूद महिलाएं अपने ही घरों में सुरक्षित क्यों नहीं हैं? क्या समाज की सोच और न्याय मिलने में देरी महिलाओं को चुप रहने पर मजबूर कर रही है? और आखिर बेटियों को बिना डर के जीने का अधिकार कब मिलेगा?