उत्तर प्रदेश की सियासत में बीते एक-डेढ़ महीने से धार्मिक+राजनीतिक जंग जा रही है. प्रयागराज माघमेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ जुड़े विवाद ने तब से जो राजनीतिक रंग लिया तो वह हल्का नहीं पड़ा है, बल्कि गाढ़ा होता जा रहा है. दिन पर दिन नए आरोप-प्रत्यारोप से इस विवाद में नए चैप्टर जुड़ रहे हैं और इसीके साथ इस विवाद में दोनों तरफ से हो रही बयानबाजियां भी दिलचस्प होती जा रही हैं.
दिलचस्प इसलिए, क्योंकि इन बयानबाजियों में आज के दौर की बात हो ही नहीं रही, बात निकलती है तो आगे की ओर दूर तलक जाने के बजाय रिवर्स मोड पीछे और बहुत पीछे चली जाती है. इतनी कि अचानक से पौराणिका काल के उदाहरण दिए जाने लगते हैं. कभी कहीं से कालनेमि का नाम आ जाता है, कभी राहु-केतु का तो कभी रावण का.
ताजा मामला स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान का है. उन पर बाल बटुकों के यौन शोषण के आरोप लगे हैं. इस पर नाराज हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि सनातन में 'कालनेमि, राहु और रावण' जैसे छद्नवेश वाले आएंगे, इनसे सावधान रहना होगा.'
स्वामीजी के इस बयान को याद कीजिए तो बीते दिनों सीएम योगी का भी ऐसा ही एक बयान ध्यान में आ जाता है. उन्होंने भी बिना नाम लिए एक जनसभा में कहा था कि 'तमाम कालनेमि होंगे जो धर्म की आड़ में सनातन को कमजोर करने की साजिश रच रहे होंगे.' तब सीएम योगी ने कहा था कि 'एक योगी, संत या संन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं होता. जो व्यक्ति धर्म के खिलाफ आचरण करता है, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, उसे सनातन परंपरा का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता.'
उन्होंने नाम नहीं लिया लेकिन मौजूदा सिनेरियो को देखते हुए बयान सीधे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद से जुड़ गया था. ठीक यही हाल इस सोमवार को भी हुआ. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी नाम नहीं लिया, लेकिन अपने बयान में किसे कालनेमि कहा, किसे राहु बताया और किसे रावण कहकर संबोधित किया, इसे लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं और अधिकतर अटकलें उसी ओर इशारा कर रही हैं, जिधर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समझाना चाह रहे हैं.
खैर, इस बहस में ये बताना जरूरी हो जाता है कि कालनेमि, राहु और रावण ने ऐसा क्या किया था कि इस पूरे विवाद में बिना उनकी कोई भूमिका होते हुए भी उनके नाम घसीटे जा रहे हैं.
कौन था कालनेमि?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जिस 'कालनेमि' का नाम लिया वह एक मायावी दैत्य था. इसका जिक्र रामायण और रामचरित मानस में बहुत विस्तार से मिलता है. रामकथा के अनुसार कालनेमि रावण का मित्र था और रावण के कहने पर वह हनुमानजी को छलने की कोशिश करता है और फिर मारा जाता है. कालनेमि ने साधु का वेश धारण कर हनुमानजी को भ्रमित करने की कोशिश की थी. बाहर से वह धर्मात्मा और तपस्वी दिखाई देता था, लेकिन भीतर से उसका लक्ष्य श्रीराम के काम में बाधा डालना था, हालांकि हनुमानजी ने उसके छल को पहचान लिया था.
रामायण में मिलता है जिक्र
लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध में जब लक्ष्मणजी को मेघनाद की शक्ति लग जाती है, तब वह युद्ध भूमि में अचेत हो जाते हैं. लंका के सुषेण वैद्य उपाय बताते हैं कि उत्तर दिशा में द्रोणगिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी होती है, जिसे सूर्यास्त से पहले लाकर उसका रस लक्ष्मण जी को पिलाया जाए तो वह फिर से जी उठेंगे. जब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने के लिए द्रोणगिरि पर्वत की ओर जा रहे थे, तब रावण ने कालनेमि को कहा कि वह किसी भी तरह हनुमान को उनके मार्ग से भटका दे या रोक दे.
तब कालनेमि ने तपस्वी का वेश धारण किया. उसने पर्वतीय रास्ते पर एक तालाब के किनारे सुंदर आश्रम बनाया, कुंड तैयार किया और खुद साधु के रूप में बैठ गया और रामभजन गाने लगा. हनुमानजी ने आकाश मार्ग से उसे देखा तो उतर कर नीचे आए और कालनेमि से प्रभावित हो गए. उसका उद्देश्य था हनुमानजी को भ्रमित करना, उन्हें तपस्या, स्नान और विश्राम के नाम पर रोकना ताकि वे समय पर संजीवनी न ला सकें. यही कारण है कि कालनेमि को 'छल, कपट और पाखंड का प्रतीक' माना जाता है.
हनुमानजी को छलने की कोशिश की थी
कालनेमि ने हनुमानजी से कहा कि आगे का रास्ता खतरनाक है, पहले स्नान करो, विश्राम करो और पुण्य अर्जित करो, लेकिन हनुमान को उसके शब्दों और व्यवहार में अंतर दिखाई दिया. हालांकि वह जब तालाब में स्नान करने गए तो एक मगरमच्छ ने उनकी पूंछ खींची. हनुमान जी ने मगरमच्छ को मार दिया तो उसमें से एक अप्सरा निकली जो शाप के कारण मगरमच्छ बन गई थी. उसने ही हनुमानजी को कालनेमि का रहस्य बताया. जब कालनेमि का भेद खुला, तो हनुमानजी ने उसका अंत कर दिया और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गए.
अब आते हैं राहु पर, वह कौन है?
राहु का स्थान सनातन परंपरा में हमारे नवग्रह मंडल में है. इस तरह वह जीवन पर अच्छा-बुरा असर डालने वाला बन चुका है. इसके अलावा पौराणिक कथाएं राहु को ही सूर्य और चंद्र ग्रहण का कारण मानती हैं. लेकिन राहु की कहानी और पहचान इतनी भर नहीं है. इसकी कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी मिलती है. स्कंद पुराण और महाभारत के अनुसार दैत्यों का एक सेनापति था स्वरभानु. समु्द्र मंथन के दौरान स्वरभानु पहले से ही सतर्क था कि कहीं कोई गड़बड़ न हो.
जब भगवान विष्णु मोहिनी अवतार लेकर आए और देवताओं को अमृत पिलाने लगे, तब स्वरभानु ने इसे भांप लिया और देवताओं का रूप बनाकर उनकी कतार में सूर्य और चंद्रमा के बगल में जाकर खड़ा हो गया. मोहिनी से अमृत लेकर स्वरभानु उसे पी ही रहा था कि सू्र्य और चंद्रमा ने शोर मचा दिया कि ये तो दैत्य है. तब तुरंत ही भगवान विष्णु ने चक्र से उसका सिर काट दिया, लेकिन राहु के गले तक अमृत जा चुका था, इसलिए वह मरा नहीं, बल्कि दो हिस्सों में बंटकर सौरमंडल में ही घूमने लगा और उसके शरीर के टुकड़े राहु-केतु कहलाए.
स्वरभानु देवताओं का रूप बनाकर छल करने आया इसलिए राहु भी छल का प्रतीक है.
छल का सबसे बड़ा प्रतीक रावण
इसी तरह रावण की कहानी तो सभी जानते हैं. वह सीता हरण के लिए साधु का वेश बनाकर आया था, जिसे धोखे का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. यह प्रसंग केवल कहानियां भर नहीं हैं, बल्कि एक गहरा संदेश भी देते हैं कि सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को अक्सर धर्म, तप और परंपरा के नाम पर भ्रमित करने वाले मिलते हैं.
भारतीय परंपरा में कालनेमि, राहु और रावण केवल असुर नहीं हैं, बल्कि वह एक प्रतीक हैं. वह उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो धर्म का आवरण ओढ़कर अधर्म करते हैं, जो साधु या संत का रूप धारण करके समाज को भ्रमित करते हैं. ये तीनों पौराणिक कथाओं के प्रभावशाली पात्र हैं, लेकिन मौजूदा विवाद ने इन्हें फिर से प्रासंगिक बना दिया है.