राजनीति में जब इतिहास खुद को दोहराता है, तो तुलना होना लाजमी है. आज सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक गलियारों में साल 1984 की एक ऐतिहासिक घटना अचानक सुर्खियों में आ गई है. यह चर्चा ऐसे समय में शुरू हुई है, जब लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन का आज शुक्रवार को 20वां दिन था.
दिलचस्प पहलू यह है कि ठीक 42 साल पहले (1984 में) लद्दाख की मांगों के लिए ऐसा ही एक अनशन सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेह पहुंचकर सोनम वांग्याल के अनशन को खत्म कराया था. आज जब वांगचुक जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर अनशन कर रहे हैं, तब उनकी तुलना उनके पिता के आंदोलन से की जा रही है.
1984 में क्या हुआ था?
दरअसल, 1984 में लद्दाख के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्री रहे सोनम वांग्याल ने लद्दाख के विभिन्न समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंचीं. उन्होंने वांग्याल से मुलाकात की, उनकी मांगों पर विचार करने का भरोसा दिया और उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की. इसके कुछ वर्षों बाद 1989 में लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिल गया.
अब क्यों हो रही है इस घटना की चर्चा?
सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में शामिल हैं और 20 दिनों से अनशन पर हैं. आंदोलन में शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार से मांगें की जा रही हैं. 20 जुलाई को संसद मार्च की भी घोषणा की गई है. इसी दौरान सोशल मीडिया पर इंदिरा गांधी और सोनम वांग्याल की मुलाकात की पुरानी तस्वीरें वायरल होने लगीं. कई लोगों ने इसे लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति सरकारों के रवैये के उदाहरण के रूप में पेश किया.
कांग्रेस ने भी दिलाई 1984 की याद
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी एक वरिष्ठ नेता से कहा कि उन्हें वांगचुक से मिलना चाहिए और 1984 की घटना का हवाला देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने स्वयं लेह जाकर अनशनकारी से संवाद किया था. इसके बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा शुक्रवार को जंतर-मंतर पहुंचे और वांगचुक से मुलाकात की. खेड़ा ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और सरकार का दायित्व है कि वह संवाद करे. उन्होंने कहा कि 1984 में इंदिरा गांधी और 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने ऐसा ही किया था, जबकि मौजूदा सरकार पर उन्होंने संवाद से दूरी बनाने का आरोप लगाया.
वांगचुक की सेहत पर बढ़ी चिंता
डॉक्टरों की ओर से जारी मेडिकल बुलेटिन के अनुसार, 20 दिनों के अनशन के दौरान सोनम वांगचुक का 9 किलोग्राम से अधिक वजन कम हो चुका है. चिकित्सकों ने लगातार मांसपेशियां कमजोर होने और लंबे समय तक अनशन जारी रहने पर अंगों को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई है. फिलहाल उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है.
वांगचुक के आंदोलन को कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), समाजवादी पार्टी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS), माकपा और तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का समर्थन मिल चुका है. अब 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च पर भी सभी की नजरें टिकी हैं.