देश में वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है. निर्वाचन आयोग नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म 6' के ऑनलाइन वर्जन में एक नया प्रावधान जोड़ने जा रहा है. इसके तहत अब आवेदकों को अपने माता-पिता के बारे में मतदाता सूची के पिछले SIR के दौरान की स्थिति की जानकारी देनी होगी.
हालांकि, इस बदलाव को लेकर एक पेंच ये भी है कि चुनाव आयोग ने अब तक फॉर्म 6 में इस संशोधन के लिए कोई कानूनी उपाय नहीं किया है. बता दें कि पिछले साल से शुरू हुए SIR अभियान के तहत अब तक 10 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण पूरा किया जा चुका है.
इस बड़े अभियान के कारण देश भर की मतदाता सूची से 5.58 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं. इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद अब इस नई प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं. जानकारों का मानना है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके बच्चों के वोटर रजिस्ट्रेशन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.
पश्चिम बंगाल पर दिखा बड़ा असर
इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, इस प्रक्रिया में कुछ खास प्रावधान जोड़े गए थे. इसके बाद न्यायिक निर्णय (एडजुडिकेशन) के दौरान पश्चिम बंगाल में 27 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए.
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इसका नतीजा ये हुआ कि जिन लोगों के नाम हटाए गए थे, वो इसी साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके. इन प्रभावित लोगों की अपीलें अभी भी ट्रिब्यूनल अदालत में लंबित हैं, जिस पर आखिरी फैसला आना बाकी है.
ऑनलाइन और ऑफलाइन फॉर्म में अंतर
चुनाव आयोग के 'ECINET' पोर्टल पर जो नया फॉर्म 6 अपलोड किया गया है, उसमें एक टेक्निकल बदलाव साफ देखा जा सकता है. पोर्टल पर मौजूद फॉर्म का पार्ट "J" और "K" के बीच में एक बिना अक्षर वाला डिक्लेरेशन फॉर्म जोड़ा गया है. ये घोषणा पत्र ही आवेदक से पिछले SIR में उनका या उनके माता-पिता क मांगता है पूरी डिटेल्स मांगता है.
दिलचस्प बात ये है कि इसी पोर्टल पर ऑफलाइन फॉर्म भरकर जमा करने के लिए जो फॉर्म 6 की कॉपी डाउनलोड के लिए मौजूद है, उसमें ये नया डिक्लेरेशन वाला हिस्सा शामिल नहीं किया गया है. यानी जो लोग मैन्युअल या कागजी फॉर्म भरकर जमा करेंगे, उन्हें इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा, जबकि ऑनलाइन आवेदकों को इसे भरना होगा.
इन राज्यों में प्रभावी है ये व्यवस्था
फॉर्म का ये नया हिस्सा उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के ऑनलाइन आवेदकों को दिख रहा है, जहां साल 2025-2026 में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है या फिर कुछ राज्यों में अभी ये जारी है. इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ बिहार शामिल नहीं है. बिहार पूरे देश का पहला ऐसा राज्य है जहां सबसे पहले SIR हुआ था.
बिहार में पिछले साल जून में ही SIR पूरा कर लिया गया था. वहीं दूसरी ओर, असम में निर्वाचन आयोग ने कुछ कानूनी कारणों के चलते SIR न करने का फैसला किया है.
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बिना भरे सबमिट नहीं होगा ऑनलाइन फॉर्म
तकनीकी रूप से नए फॉर्म में इस कॉलम को अनिवार्य श्रेणी में नहीं रखा गया है. लेकिन इसे भरे बिना ऑनलाइन फॉर्म को सबमिट भी नहीं किया जा सकता है. इसका मतलब ये है कि ऑनलाइन आवेदन करने वाले हर नए वोटर को इसे भरना ही होगा. इस नए सेक्शन में आवेदक के सामने तीन विकल्प दिए गए हैं, जिनमें से किसी एक को चुनना जरूरी है:
1. 'मेरा नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद है.'
2. 'मेरे माता-पिता का नाम (पिता, माता, दादा, दादी) पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद है.'
3. 'न तो मेरा नाम और न ही मेरे माता-पिता का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद है.'
अगर कोई आवेदक पहले दो विकल्पों में से किसी एक को चुनता है, तो उसे पिछली SIR के दौरान का अपना या अपने माता-पिता के नाम का विधानसभा क्षेत्र, बूथ नंबर और सीरियल नंबर देना होगा. अब समस्या उन लोगों के सामने है जिन्हें ये पुरानी डिटेल्स नहीं मिल पा रही हैं. ऐसे लोगों के पास सिर्फ तीसरा विकल्प चुनने का रास्ता बचता है. लेकिन पोर्टल पर अभी तक ये नहीं बताया है कि अगर कोई आवेदक इस तीसरे विकल्प को चुनता है, तो उसके आवेदन के साथ आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी.
कानूनी पेंच और नियम
चुनाव आयोग ने पिछले साल 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में हुई SIR के दौरान और वर्तमान में 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही SIR के दौरान मौजूदा मतदाताओं से उनके गणना फॉर्म में यही विवरण मांगे थे. लेकिन नए मतदाताओं के लिए बने मुख्य फॉर्म 6 में तब से कोई संशोधन नहीं किया गया है. कानून मंत्रालय के समय-समय पर जारी की जाने वाली सभी गजट नोटिफिकेशन को देखने से भी यही बात पता चलती है कि इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है.
ये पूरा अधिनियम सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 से शक्ति हासिल करता है. ये आर्टिकल देश के उन सभी वयस्क नागरिकों को मतदाता के तौर पर रजिस्टर होने के अधिकार की गारंटी देता है, जो किसी निर्वाचन क्षेत्र के सामान्य निवासी हैं और जिन्हें कानूनन अयोग्य नहीं ठहराया गया है.
इसके अलावा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act), 1950 की धारा 28 के मुताबिक, 'केंद्रीय सरकार, निर्वाचन आयोग से सलाह करने के बाद, आधिकारिक राजपत्र में नोटिफिकेशन जारी कर इस अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नए नियम बना सकती है.'
क्या है फॉर्म 6 का मूल उद्देश्य?
मौजूदा नियमों के तहत फॉर्म 6 एक वैधानिक फॉर्म है. इसका इस्तेमाल वो लोग करते हैं जो या तो 18 साल की उम्र पूरी करने के बाद पहली बार वोटर बनने के एलिजिबल हुए हैं, या जिन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल की है. इसके अलावा जिन लोगों के नाम किसी कारण से वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे और वो नए सिरे से आवेदन करना चाहते हैं, वो भी इसी फॉर्म को भरते हैं.
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निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में प्रकाशित मूल फॉर्म 6 के मुताबिक, आवेदक को सिर्फ उन परिवार के सदस्यों के नाम और EPIC यानी वोटर आईडी नंबर देने होते हैं, जिनके साथ वो वर्तमान में रह रहे हैं. लेकिन अब इस नए ऑनलाइन सेक्शन के जुड़ने से नए वोटर्स की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.