ये कहानी 1919 में शुरू होती है, तब के मध्य प्रांत की कांग्रेस के तीन दिग्गज एक समाचार पत्र शुरू करना चाहते थे ताकि मुद्दों को पुरजोर तरीके से जनता के बीच ले जाया जा सके. इसलिए अखबार शुरू करने से पहले जनता की राय जानने और उनसे सदस्यता शुल्क (सब्सक्रिप्शन) लेने की योजना बनाई गई.
इसके लिए उन्हीं तीन में से एक डॉ बीएस मुंजे ने डॉ हेडगेवार को अभियान में लगाया. डॉ हेडगेवार उन दिनों युवा थे, तिलकवादी नेता डॉ बीएस मुंजे के प्रंशसक थे, हाल ही में मेडिकल की डिग्री कोलकाता (तब कलकत्ता) से लेकर आए थे, लेकिन क्लीनिक खोलने, हॉस्पिटल में काम करने की बजाय देश सेवा के अभियान में जुट गए थे. इधर क्रांतिकारियों के संगठन अनुशीलन समिति के साथ जुटे हुए थे, उधर मुंजे के साथ कांग्रेस से भी ज़ुड़ गए थे. इस समाचार पत्र का नाम रखा गया था, ‘संकल्प’.
यह हिंदी भाषी क्षेत्रों में कांग्रेस की पहुंच को मजबूत करने के प्रयासों का एक हिस्सा था, क्योंकि उस समय पार्टी के पास कोई समर्पित हिंदी प्रकाशन नहीं था. यह पहल असहयोग आंदोलन की बढ़ती गति और ग्रामीण एवं गैर-अंग्रेजी भाषी दर्शकों तक पहुंचने के लिए स्थानीय मीडिया की आवश्यकता के बीच आई थी. ‘संकल्प’ का उद्देश्य कांग्रेस की विचारधाराओं को बढ़ावा देना, राजनीतिक घटनाक्रमों पर रिपोर्ट करना और उपनिवेशवाद विरोधी प्रतिरोध को प्रेरित करना था.
इसमें स्वदेशी (आत्मनिर्भरता), हिंदू-मुस्लिम एकता (उस समय गांधीजी के दृष्टिकोण के अनुसार) और ब्रिटिश नीतियों की आलोचना जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया था. इस समाचार पत्र का उद्देश्य अल्पकालिक राष्ट्रवादी प्रकाशनों की लगातार विफलताओं का मुकाबला करने के लिए अग्रिम निधि प्राप्त करना था.
डॉ. हेडगेवार को विशेष रूप से मध्य प्रांत के जिलों में अखबार का प्रचार करने और तीन साल के अग्रिम सदस्यता शुल्क एकत्र करने का काम सौंपा गया था. उन्होंने दूरदराज के गांवों और जिलों (जैसे खंडवा, सागर, दमोह, नरखेड़, पाटन, हरदा और ब्रह्मपुर) का दौरा किया, अक्सर घंटों बैलगाड़ी से यात्रा करते हुए जाना होता था. नए उपक्रमों के प्रति जनता के संदेह और कुछ स्थानीय कांग्रेस नेताओं के समर्थन की कमी जैसी चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने सफलतापूर्वक 1,000 से अधिक ग्राहक जुटाए और धनराशि भेजी (उदाहरण के लिए, 2 अप्रैल, 1919 को 500 रुपये और 25 अप्रैल, 1919 को 600 रुपये). उनके प्रयासों ने उम्मीदों से कहीं अधिक सफलता हासिल की, कई क्षेत्रों में लक्ष्य से अधिक धनराशि एकत्र की (उदाहरण के लिए, खंडवा में 40 और दमोह में 30).
प्रचार अभियान ने ‘संकल्प’ को आरंभ में स्थापित करने और उसे कायम रखने में मदद की, हालांकि इसका दीर्घकालिक भाग्य कई राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के समान ही रहा—सेंसरशिप और वित्तीय समस्याओं से जूझना पड़ा. डॉ. हेडगेवार के इस कार्य ने स्थायी मित्रताएं और जमीनी स्तर की राजनीति की गहरी समझ विकसित की, जिसने उनकी बाद की संगठनात्मक रणनीतियों को प्रभावित किया. उनकी इस क्षेत्र पर गहरी पकड़ बन गई थी. तब तक संघ जैसा कोई विचार शायद उनके मन में भी नहीं था.
इस अनुभव ने उनके संगठनात्मक कौशल को उजागर किया और उन्हें कांग्रेस की आंतरिक कमियों से अवगत कराया, जैसे कि कार्यकर्ताओं का अपर्याप्त प्रशिक्षण और नेताओं की जमीनी स्तर पर काम करने की अनिच्छा. इसने एक अधिक अनुशासित, युवा-केंद्रित आंदोलन बनाने के उनके संकल्प को भी मजबूत किया, जिसका परिणाम आरएसएस के रूप में सामने आया.
स्वतंत्रता की मांग कांग्रेस ने की खारिज, तो ‘स्वातंत्र्य’ अखबार ही शुरू कर दिया
तथ्यों के हिसाब से देखें तो कांग्रेस ने अपनी आजादी की लड़ाई स्थापना के 45 साल बाद यानी 1929-30 के लाहौर अधिवेशन से लड़नी शुरू की थी. उसी अधिवेशन में अध्यक्ष पंडित नेहरू ने आधिकारिक रूप से कांग्रेस के लक्ष्यों में स्वतंत्रता की मांग को भी जोड़ा था. लेकिन उससे ठीक 9 साल पहले जब नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन (1920) का हुआ था तो डॉ केबी हेडगेवार ने प्रस्ताव प्रारूप समिति के सामने अपना यही प्रस्ताव रखा था, तो उसे समिति ने खारिज कर दिया था. यानी डॉ हेडगेवार ने पंडित ने नेहरू से काफी पहले ही 1920 में ये प्रस्ताव रखा था, लेकिन उस प्रस्ताव को जब समिति ने ही अस्वीकार कर दिया तो वो अधिवेशन में नहीं रखा जा सका.
कहीं ना कहीं डॉ हेडगेवार के मन में सम्भवतया यही टीस रही होगी, कि उन्होंने जब अपना समाचार पत्र शुरू किया तो उसका नाम ‘स्वातंत्र्य’ रखा, जो मराठी भाषा का समाचार पत्र था. सन् 1923 के मध्य में, डॉ. हेडगेवार ने डॉ. एन.बी. खरे और नागपुर नेशनल यूनियन (कांग्रेस के तिलक गुट से संबद्ध एक राष्ट्रवादी समूह) के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर ‘स्वातंत्र्य’ नामक एक दैनिक मराठी समाचार पत्र शुरू करने का निर्णय लिया. यह असहयोग आंदोलन (1920-1922) के बाद चरम राष्ट्रवादी भावना के दौर में हुआ, जिसमें डॉ. हेडगेवार ने सक्रिय रूप से भाग लिया था, और राजद्रोह के आरोप में 1921 में जेल भी गए थे.
इस अखबार का उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करना, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना करना और साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध जनमत जुटाना था. यह मध्य प्रांत (वर्तमान में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों) में कांग्रेस के तिलकवादी (राष्ट्रवादी) विंग के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता था. डॉ. हेडगेवार इसे राजनीतिक चेतना जगाने और मीडिया में ब्रिटिश समर्थक विचारों का मुकाबला करने के एक साधन के रूप में देखते थे.
डॉ. हेडगेवार इसके सह-संस्थापक थे और इसके संचालन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई. उन्होंने धन जुटाने, संपादक (एन.जी. केलकर) का समर्थन करने, छपाई संबंधी समस्याओं को हल करने और इसके वितरण को सुनिश्चित करने में सहायता की. उन्होंने समर्थन और सदस्यता बढ़ाने के लिए महाकौशल क्षेत्र जैसे इलाकों का दौरा किया. यह अखबार थोड़े समय तक ही चला, लेकिन वित्तीय चुनौतियों और बढ़ते घाटे के कारण इसे बंद करना पड़ा। इसके बावजूद, इसने स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ों को बुलंद करने में मदद की और राष्ट्रवादियों के बीच डॉ. हेडगेवार का नेटवर्क बनाने में योगदान दिया.

‘तरुण भारत’ के सम्पादक भी कई दिग्गज रहे
नागपुर में प्रकाशित होने वाला ‘तरुण भारत’, आरएसएस विचारों के मराठी दैनिक के रूप में जाना जाता था. हिंदुत्व विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए एक मंच के रूप में स्थापित किया गया था, हालांकि उपलब्ध स्रोतों में इसकी स्थापना की सटीक तिथि दर्ज नहीं है, लेकिन यह 20वीं शताब्दी के मध्य (संभवतः 1940 के आसपास) तक सक्रिय हो चुका था. इसका प्रकाशन नागपुर के नरकेसरी प्रकाशन द्वारा किया जाता था और यह विदर्भ क्षेत्र में हिंदू राष्ट्रवादी विचारों के लिए एक प्रमुख मीडिया माध्यम के रूप में कार्य करता है. (नोट: यह बेलगावी में 1919 में बाबूराव ठाकुर द्वारा स्थापित किए गए अलग तरुण भारत समाचार पत्र से भिन्न है, जो सामान्य समाचारों पर केंद्रित है और आरएसएस से संबद्ध नहीं है) बाद में बालासाहब देवरस ने भी बंगाल के आने के बाद इस पत्र पर ध्यान देना शुरू किया था.
इसके संस्थापक संपादक भाऊसाहेब मडखोलकर थे, जो हिंदुत्व और आरएसएस के विचारों के प्रबल समर्थक थे. उन्होंने आरएसएस के सिद्धांतों के सक्रिय समर्थक के रूप में अखबार को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह प्रकाशन महाराष्ट्र में आरएसएस के विस्तार के संदर्भ में अस्तित्व में आया, जिसके आरएसएस नेताओं जैसे गुरू गोलवलकर से घनिष्ठ संबंध थे. तरुण भारत (नागपुर) को शुरुआत से ही मराठी भाषा में ‘आरएसएस का मुखपत्र’ कहा जाता रहा है.
इसका इस्तेमाल आरएसएस की विचारधारा का प्रसार करने, हिंदू एकता को बढ़ावा देने और विरोधी राजनीतिक विचारों (जैसे कांग्रेस या वामपंथी विचारधारा) की आलोचना करने के लिए किया जाता रहा है. इसमें एमजी वैद्य जैसे आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं के लेख प्रकाशित होते रहे हैं और प्रमोद महाजन जैसे आरएसएस से जुड़े राजनेताओं के लिए यह एक शुरुआती बिंदु रहा है. इसके संपादक पारंपरिक रूप से आरएसएस के स्वयंसेवक या विचारक रहे हैं, जिससे संगठन के लक्ष्यों के साथ तालमेल बना रहता है.
कहीं ना कहीं संघ को ये भी लग रहा था कि अपने विचारों को जनता तक सही रूप में फैलाने के लिए कोई अपना भी माध्यम होना चाहिए. ताकि वो उनके मूल भाव को बरकरार रख सकें. चूंकि स्वतंत्रता आंदोलन के आंदोलन भारत समेत दुनियां भर जहां भी हुए हैं, नेतृत्व ने अखबारों को प्रमुख माध्यम बनाया है. गांधीजी के भी अपने अखबार थे, नेहरू परिवार के भी थे, आज भी हैं. तिलक ने भी मराठा, केसरी जैसे अखबार चलाए थे. ऐसे में संघ के कई प्रचारकों को मीडिया क्षेत्र में प्रशिक्षित भी किया जाने लगा था.
बाद में दीनदयाल उपाध्याय से लेकर अटल बिहारी बाजपेयी और आडवाणी तक सभी मीडिया के क्षेत्र में किसी ना किसी भूमिका में रहे थे. शुरूआती दिनों में बापूसाहेब भिषिकर (सीपी) भी थे, जो कराची में संघ के प्रचारक रहे थे और फिर ‘तरुण भारत’ के मुख्य सम्पादक भी रहे. संघ के पहले प्रवक्ता के तौर पर प्रसिद्ध एमजी वैद्या भी ‘तरुण भारत’ के सम्पादक रहे थे, सुधीर पाठक भी रहे थे.
12000 लोगों के शेयर्स से बना भारत प्रकाशन ट्रस्ट
आज दुनियां की नजर में संघ के मुखपत्र माने जाने वाले दो पत्र हैं एक अंग्रेजी का ‘ऑर्गनाइजर’ और दूसरा है हिंदी का ‘पांचजन्य’. हालांकि आधिकारिक रूप से संघ किसी को अपना मुखपत्र नहीं मानता. ये दोनों ही भारत प्रकाशन ट्रस्ट से जुड़े हैं. भारत प्रकाशन ट्रस्ट की स्थापना की कहानी बड़ी रोचक है कि कैसे दिल्ली और पजाब के संघ स्वयंसेवकों ने तय किया कि एक ट्रस्ट जनता की पूंजी से बनाया जाए, जिसमें संघ स्वयंसेवकों या संघ के हितचिंतकों के शेयर्स हों.
कुल मिलाकर 12 हजार स्वयंसेवकों के शेयर्स से करीब 4 लाख रुपए आजादी के साल में जोड़े गए थे. 3 जून को जैसे ही माउंटबेटन ने देश की आजादी और विभाजन की घोषणा की. संघ के स्वयंसेवकों में जिम्मेदारियों की भावना और जोर मारने लगी थी कि अब तो वक्त आ गया है, एक तरफ लाखों शऱणार्थियों को सहयोग करना होगा, दूसरी तरफ आजाद भारत होगा तो अपने समाचार पत्रों पर कोई प्रतिबंध या शर्तें लागू नहीं होंगी. इतनी तेजी से निर्णय लिए गए कि ठीक 1 महीने के अंदर यानी 3 जुलाई 1947 को अंग्रेजी के राष्ट्रीय विचारों के प्रवाहक के रूप में ‘ऑर्गनाइजर’ की शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी.
डॉन की प्रेस और मार्क्सवादी सम्पादक से शुरूआत
समूह का नेतृत्व युवा और ऊर्जावान प्रचारक वसंतराव ओक कर रहे थे, जो इस पहल के मुख्य रणनीतिकार थे, वे लम्बे समय तक दिल्ली में संघ के सर्वेसर्वा रहे और दिल्लीश्वर के रूप में चर्चित हो गए थे. उनके साथ हिंदी पत्रिका ‘दैनिक भारतवर्ष’ के संपादक देवेंद्र विजय दढवाल भी थे. अमरनाथ बजाज और चियाथराम (दोनों सरकारी कर्मचारी), ने इस विचार का समर्थन किया. दिल्ली क्लॉथ मिल्स (डीसीएम) के लाला चरत राम भी इस प्रयास के प्रबल समर्थक थे. आज की पीढ़ी के लिए ये रोचक तथ्य हो सकता था कि संघ विचारों से जुड़े ऑर्गनाइजर का पहला अंक विभाजन तक 'डॉन' छापने वाले प्रसिद्ध लतीफी प्रेस से ही छपा. डॉन आज पाकिस्तान का सबसे मशहूर अखबार है.
विडंबना यह है कि ऑर्गनाइज़र के पहले संस्करण के संपादक ए. आर. नायर थे, जो आरएसएस की विचारधारा से नहीं बल्कि मार्क्सवाद की ओर झुकाव के लिए जाने जाते थे. चूंकि इसे राष्ट्र के हित के लिए समर्पित एक स्वतंत्र मीडिया उद्यम के रूप में परिकल्पित किया गया था, इसलिए नायर को उनकी उत्कृष्ट संपादन क्षमता और अंग्रेजी भाषा पर पकड़ के कारण चुना गया था. 14 अगस्त 1947 को पहला अंक और अखंड भारत का आखिरी अंक प्रकाशित हुआ.
फिर आई कमान मलकानी और आडवाणी के पास
सर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी बात हो गई, आजादी के बाद जितने भी संघ समर्थकों की योजनाएं थीं नाथूराम गोडसे औऱ पंडित नेहरू की वजह से ध्वस्त हो गईं. नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की और पंडित नेहरू ने बिना सुबूत गुरु गोलवलकर पर धारा 302 लगवाकर जेल भेज दिया, उनके साथ हजारों स्वयंसेवकों को भी, संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया. इसका असर भारत प्रकाशन ट्रस्ट के कामकाज पर भी पड़ा. इस बार, हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत एक अन्य अनुभवी पत्रकार, केवल रतन मलकानी यानी के. आर मलकानी को साप्ताहिक पत्रिका का संपादन करने के लिए बुलाया गया. के. आर. मलकानी जल्द ही साप्ताहिक पत्रिका का चेहरा बन गए और उन्होंने 1948 से 1982 तक, चौंतीस वर्षों तक इसका संपादन किया. इंग्लैंड में फेलोशिप पर रहने के दौरान, साप्ताहिक पत्रिका का संपादन इसके ‘फिल्म संवाददाता’ लाल कृष्ण आडवाणी ने किया.
संविधान लागू होते ही निशाने पर आ गया ऑर्गनाइजर
भारत के संविधान के लागू होने के एक महीने के भीतर ही ऑर्गनाइजर के प्रकाशन में एक और महत्वपूर्ण बाधा आ गई. पाकिस्तान के साथ युद्ध की आशंकाओं और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के बीच, 27 फरवरी, 1950 को 'ऑर्गनाइज़र' ने अपने पहले पृष्ठ पर ‘Six Questions’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया. एक अन्य लेख, ‘Villains Vs Fools’ में सरकार की उस नीति की आलोचना की गई जिसमें मुस्लिम शरणार्थियों की संपत्ति पर व्यक्तिगत आधार पर दावे निपटाए जा रहे थे, जबकि जरूरतमंद हिंदू शरणार्थियों के दावों पर विचार नहीं किया जा रहा था. एक अन्य लेख में मुस्लिम लीग से संबंध रखने वाले मुसलमानों की वफादारी पर सवाल उठाया गया.
तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इन संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्टिंग को रोकने के लिए कड़ा रुख अपनाया और के. आर. मलकानी को इन तीन लेखों के लिए केंद्रीय प्रेस सलाहकार समिति के समक्ष स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाया गया, जिसका उन्होंने संपादकीय के माध्यम से विरोध करते हुए इसे 'सरकारी उत्पीड़न का कृत्य' बताया.
मार्च में, मलकानि को पूर्वी पंजाब सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1949 के तहत एक ‘पूर्व-सेंसरशिप’ आदेश दिया गया, जिसमें उन्हें प्रकाशन से पहले सभी "सांप्रदायिक मामलों और पाकिस्तान के बारे में समाचार और विचारों" को पूर्व-जांच के लिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था, उन्होंने 13 मार्च के 'ऑर्गनाइज़र' अंक में इस आदेश को प्रकाशित करते हुए लिखा, 'तथ्य पवित्र हैं'.
17 अप्रैल को 'ऑर्गनाइज़र' ने पूर्वी पंजाब सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम की संवैधानिकता को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया. अंततः 5 जून, 1950 को न्यायालय ने पूर्वी पंजाब सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम की संबंधित धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया, ये 'ऑर्गेनाइज़र' जैसे नए अखबार की बड़ी जीत थी. जिसकी चर्चा दशकों तक हुई. बदलते समय के साथ, ऑर्गेनाइज़र ने अपना स्वरूप बदला और 2004 में अपना डिजिटल संस्करण लॉन्च किया. 2014 में इसके टेबलॉयड प्रारूप को पत्रिका प्रारूप में बदल दिया गया. स्थापना से लेकर अब तक के सभी अभिलेखागारों का डिजिटलीकरण जारी है. साथ ही, ऐप के माध्यम से भी इसकी उपलब्धता बढ़ गई है. फिलहाल प्रफुल्ल केतकर इसके सम्पादक हैं.
भाऊराव देवरस, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी बाजपेयी का संगम ‘पाञ्चजन्य’
कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में संघ की नींव रखने वाले और तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस के मन में अरसे से पत्रकारिता की दिशा, दशा को लेकर विचार चल रहा था कि स्वतंत्र भारत में समाचार पत्र पत्रिकाएं कैसे हों, इसका उदाहरण रखा जाए. उन दिनों भाऊराव देवरस के साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय सह प्रांत प्रचारक थे. पाञ्चजन्य के एक लेख से जानकारी मिलती है कि संघ के कार्यक्रमों में अटल बिहारी बाजपेयी कविता-पाठ किया करते थे.
उनकी खूब सराहना भी होती थी. भाऊराव जी और दीनदयाल जी की नजर में यह युवा, प्रखर और ओजस्वी कवि थे. जुलाई के महीने में दीनदयाल जी, भाऊराव जी और अटल जी की बैठक हुई, तय हुआ कि संघ के प्रचार-प्रसार के लिए एक मासिक पत्रिका निकाली जाए. किसी ने नाम सुझाया ‘राष्ट्रधर्म’.
अटल जी को इसके पहला संपादक बनाया गया. 31 अगस्त, 1947 को रक्षाबंधन पर राष्ट्रधर्म का पहला अंक प्रकाशित हुआ. इस अंक के पहले पन्ने पर संपादक अटल बिहारी वाजपेयी की कविता प्रकाशित हुई थी- “हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय” . इसी अंक में दीनदयाल उपाध्याय ने ‘चिति’ नाम से एक लेख भी लिखा था. जिस पर आगे चल कर कई लोगों ने रिसर्च किया.
‘राष्ट्रधर्म’ के पहले अंक की 3,000 प्रतियां प्रकाशित हुई थीं। उस दौर में कोई भी हिंदी पत्रिका 500 से अधिक संख्या में नहीं छपती थी। राष्ट्रधर्म की सभी प्रतियां हाथों-हाथ बिक गईं तो 500 प्रतियां और छापनी पड़ीं. राष्ट्रधर्म के दूसरे अंक की 8,000 और तीसरे अंक की 12,000 प्रतियां छपी थीं. अटल जी कुछ ही महीने इस पत्रिका के संपादक रहे. इसी साल जालंधर से ‘आकाशवाणी’ और वाराणसी से ‘चेतना’ नाम के पत्रों का भी प्रकाशन प्रारम्भ किया गया था.
‘राष्ट्रधर्म’ की सफलता से उत्साहित संघ ने ‘पाञ्चजन्य’ नाम से एक साप्ताहिक भी निकालने का फैसला किया. भगवान विष्णु के शंख का नाम है पाञ्चजन्य. इसके भी पहले संपादक की जिम्मेदारी अटल जी को ही मिली, वो दोनों पत्रिकाएं एक साथ देख रहे थे. 1948 में मकर संक्रांति के अवसर पर पाञ्चजन्य का पहला अंक प्रकाशित हुआ. अटलजी के सम्पादक रहते एक बात की चिंता किसी को नहीं थी कि कहीं जगह कम पड़ जाएगी, जैसे ही कहीं दो चार लाइनों की जगह छूट रही होती थी, तो अटलजी फौरन अपनी कविताओं की कुछ लाइनें वहां चिपका देते थे. दीनानाथ मिश्र और प्रो. देवेंद्र स्वरूप भी ‘पाञ्चजन्य’ में उनके सहयोगी रहे थे. अटल जी के साथ साथ भाऊराव देवरस और दीनदयाल उपाध्याय ने भी कॉपोजिंग सीख ली थी. कहा जाता है कि पत्रिका के संपादन के साथ साथ अटल जी साइकिल पर उसे पीछे बांध कर बेचा भी करते थे.
प्रथम संपादक अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पूर्व संपादकों में राजीव लोचन अग्निहोत्री, ज्ञानेन्द्र सक्सेना, गिरीश चन्द्र मिश्र, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, तिलक सिंह परमार, यादव राव देशमुख, वचनेश त्रिपाठी, केवल रतन मलकानी, देवेन्द्र स्वरूप, दीनानाथ मिश्र, भानुप्रताप शुक्ल, रामशंकर अग्निहोत्री, प्रबाल मैत्र, तरुण विजय, बल्देव भाई शर्मा और अब हितेश शंकर हैं. पांचजन्य में संघ से जुड़े प्रचारकों के अलावा केएम मुंशी, पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, निर्मल वर्मा, नागार्जुन, रामकुमार भ्रमर, दया प्रकाश सिन्हा जैसे दिग्गजों ने भी लेख लिखे हैं.
पाञ्चजन्य पर सरकारी संकट भी बहुत आए, दिल्ली-लखनऊ में भी झूलता रहा
जन्म को एक महीना भी नहीं हुआ था कि गांधी हत्या से प्रभावित वातावरण का लाभ उठाकर सरकार ने फरवरी, 1948 में पाञ्चजन्य का गला दबाने की कोशिश की. संपादक, प्रकाशक और मुद्रक सभी को जेल भेज दिया गया. कार्यालय पर ताला ठोक दिया गया. साढ़े चार महीने बाद न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही पाञ्चजन्य का फिर से प्रकाशन संभव हो सका. किन्तु छह महीने निकलने के बाद दिसम्बर, 1948 में पाञ्चजन्य की अभिव्यक्ति पर फिर हमला हुआ. इस बार सात माह के लिए कार्यालय बंद रहा. जुलाई, 1949 में ही ताला खुल पाया.
बीस साल का ही हुआ था ये अखबार कि 1968 में इसका प्रकाशन दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया. यह भी संयोग ही है कि लखनऊ और दिल्ली के बीच जैसा घर-सा संबंध पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक अटल जी का रहा, कुछ वैसी ही कहानी इस साप्ताहिक की भी रही. 1972 में राष्ट्रधर्म प्रकाशन ने इसका प्रकाशन एवं मुद्रण फिर लखनऊ से करने का निश्चय किया. 1972 में भारतीय सेना की विजय को शिमला समझौते की मेज पर गंवा देने के विरुद्ध पाञ्चजन्य के आक्रोश से तिलमिलाई इंदिरा सरकार ने इसके सम्पादकों एवं प्रकाशकों को लम्बे समय कानूनी कार्रवाई में फंसाए रखा.
आपातकाल की गाज जिन समाचारपत्रों और प्रकाशनों पर गिरी, पाञ्चजन्य उनमें अग्रणी था। जून, 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा से लोकतंत्र का गला घोटने की कोशिश की और मार्च, 1977 में आपातकाल की समाप्ति पर ही पाञ्चजन्य फिर यात्रा शुरू कर सका। 1977 में इसका प्रकाशन फिर दिल्ली से शुरू करने के लिए राष्ट्रधर्म ने इसके प्रकाशन का पूरा दायित्व समविचारी प्रकाशन संस्था ‘भारत प्रकाशन (दिल्ली) लिमिटेड’ को हस्तांतरित कर दिया.
इमजरेंसी में चमका ‘मदरलैंड’
आप इमरजेंसी का इतिहास पढ़ेंगे तो एक अखबार का नाम बार बार आएगा, उसका नाम था मदरलैंड. दैनिक समाचारों में राष्ट्रवादी आवाज़ सुनिश्चित करने के लिए एक दैनिक समाचार पत्र की आवश्यकता को समझते हुए, 5 फरवरी, 1971 को भारत प्रकाशन लिमिटेड द्वारा शुरू किया गया 'द मदरलैंड डेली' का पहला अंक प्रकाशित हुआ, जिसका संपादन एक बार फिर के. आर. मलकानी ने किया, देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित और सुरक्षित रखने तथा राष्ट्रीय अखंडता और राजनीतिक एकता को बढ़ावा देने का संकल्प लेते हुए, 'द मदरलैंड' जल्द ही 'ऑर्गनाइज़र' के साथ-साथ लोकतंत्र का एकमात्र रक्षक बन गया और अपने अंतिम अंक (27 जून, 1975 का अंक) तक इसी भूमिका में रहा.
इस दौरान धमकियों और प्रलोभनों के ज़रिए अधिकांश समाचार पत्रों पर अघोषित सेंसरशिप लागू थी, ऐसे में भारत प्रकाशन तत्कालीन कांग्रेस सरकार की छल-कपट में एक कांटा बन गया. अरबिंदा घोष, जो गृह मंत्री उमा शंकर दीक्षित की बैठकों में प्रकाशन का प्रतिनिधित्व करते थे, प्रलोभन के लिए आयोजित इस अनौपचारिक बैठक में सरकार की आलोचना करने वाले एकमात्र मीडियाकर्मी थे. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब 25-26 जून की मध्यरात्रि को आपातकाल घोषित किया गया, तो के.आर. मलकानी गिरफ्तार होने वाले पहले मीडियाकर्मियों में से थे. 26 जून को सुबह 3 बजे, समाचार प्रकाशन को रोकने के लिए पुलिस ने दिल्ली के सभी प्रिंटिंग प्रेस और समाचार पत्रों की बिजली काट दी.
हिंदुस्थान समाचार एजेंसी के बिना इतिहास है अधूरा
किसी भी संघ प्रचारक द्वारा स्थापित मीडिया संगठनों में ये हिंदुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी का नाम अहम है. हिंदुस्थान समाचार भारत की पहली एक मात्र भाषाई राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी है. इसका मुख्यालय राजधानी दिल्ली में है, देश के विभिन्न राज्यों में एजेंसी के 22 ब्यूरो कार्यरत हैं. फिलहाल 750 स्थानों पर हिन्दुस्थान समाचार के संवाद-सूत्र हैं, जो चौबीसो घंटे अपनी सेवा दे रहे हैं. इसकी स्थापना 10 अप्रैल 1948 में संघ के प्रचारक शिवराम शंकर आप्टे ने की थी, जिन्हें आमतौर पर दादा साहेब आप्टे के तौर पर जाना जाता है. यह एक सहकारी संस्था के रूप में सन् 1957 में पंजीकृत (रजिस्टर्ड) हुई. देवनागरी लिपि में ‘टेलीप्रिन्टर’ आविष्कार का श्रेय दादा साहब आप्टे को ही है, जबकि बालेश्वर अग्रवाल के यशस्वी संपादन व प्रबंधन में हिन्दुस्थान समाचार देश की सबसे प्रामाणिक और प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी के रूप में स्थापित हुई. एक समय ऐसा भी आया जब हिन्दुस्तान समाचार अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहा था. तब श्रीकांत जोशी ने सन् 2003 में हिन्दुस्तान समाचार को नया जीवन दिया. वर्तमान में कमान अरविंद मार्डीकर के हाथ में है.
वर्तमान में जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र की जिम्मेदारी संभाल रहे संघ के वरिष्ठ प्रचारक आशुतोष भटनागर 2005 से 2008 तक हिंदुस्थान समाचार के सम्पादक रहे. वो बताते हैं, “स्थापना का मूल उद्देश्य पहली भारतीय न्यूज एजेंसी खोलना का था, क्योंकि आजादी तक जितनी भी न्यूज एजेंसी भारत में काम कर रही थीं विदेशी थीं. ऐसे में हमें एक ऐसी एजेंसी चाहिए थी, जो ना केवल पूरे भारत में काम करे, बल्कि अलग अलग भाषाओं में खबरों को उपलब्ध करवाए”.
विश्व हिंदू परिषद की स्थापना में भी है दादासाहेब आप्टे का योगदान
आप्टे बड़ोदा, गुजरात के एक मराठी परिवार में पैदा हुए थे. पत्रकार बनना चाहते थे, सो पढ़ाई पूरा करके समाचार एजेंसी यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया (यूएनआई) से जुड़ गए. तब यूएनआई को भी नहीं पता था कि एक दिन इसी व्यक्ति द्वारा खड़ी की गई संस्था की भी खबरें छापनी पड़ेंगी और एक दिन ये व्यक्ति यूएनआई से बड़ी समाचार एजेंसी यानी हिंदुस्तान समाचार खड़ी कर देगा.
हालांकि बाद में आप्टे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आए और फिर कुछ समय बाद 1945 में उसके पूर्णकालिक प्रचारक भी बन गए. लेकिन अंदर का पत्रकार जिंदा था, सो लगातार लेख आदि लिखते रहते थे. संघ के मीडिया सम्बंधी कार्यों में भी उनकी विशेषज्ञता की उपयोगिता बनी रहती थी. ऐसे में योजना बनी कि कोई ऐसी न्यूज एजेंसी भी हो जो संघ के प्रति बिना जाने ही विद्वेष भाव ना रखती हो, इस काम में फिर आप्टे की मेहनत और अनुभव काम आए और इस तरह बम्बई (आज की मुंबई) से ‘हिंदुस्तान समाचार’ एजेंसी की शुरूआत हुई. आप्टे इसके बाद कई देशों की यात्रा पर गए, वहां रहने वाले भारतीयों की दशा दिशा देखी और उन्हें लगा कि इनको अपनी जन्मभूमि से जोड़ा जाना चाहिए, कुछ साझा समस्याओं में उनकी सहायता की भी जा सकती है और ली भी जा सकती है. नियोगी आयोग की रिपोर्ट भी उन दिनों चर्चा में रही थी.
आप्टे ने 1961 में ‘केसरी’ में तीन लेख लिखे और विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के बारे में भारत के हिंदुओं का ध्यान आकर्षित किया कि उनका कैसा जीवन है, कैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं वो लोग. इन्हीं लेखों में उन्होंने एक सुझाव दिया कि हिंदुओं का एक ऐसा विश्वव्यापी संगठन होना चाहिए, जो पूरे विश्व के हिंदुओं का मंच हो, जिसके जरिए पूरे विश्व के हिंदू आपस में जुड़ सकें.
गुरु गोलवलकर ने एस एस आप्टे को देश भर के दौरे पर भेज दिया, जहां वो तीन सौ से चार सौ समाज की प्रमुख हस्तियों व 50 के करीब संस्थाओं, विभिन्न मठों, पंथों के प्रमुखों से मिले. विश्व हिंदू परिषद नेता और राम मंदिर ट्रस्ट, अयोध्या के महासचिव चम्पत राय ऑर्गनाइजर के एक लेख में ऐसे सभी नामों की एक सूची देते हैं, जिनमें कांची कामकोटि और शारदा पीठम के शंकराचार्य, केएम मुंशी, संत तुकडोजी महाराज, डॉ सम्पूर्णानंद, लद्दाख के कुशक बाकुला, जस्टिस बीपी सिन्हा, बाबू जगजीवन राम, जैन साधु मुनि सुशील कुमार महाराज, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ आचार्य विश्ववंधु, सदगुरु जगजीत सिंह नामधारी, प्रभुदत्ता ब्रह्मचारी, सर सीताराम राय, श्रीप्रकाश, हनुमान प्रसाद पोद्दार, जुगल किशोर बिरला, स्वामी नारायण पंश के योगीराज महाराज आदि. चम्पतराय लिखते हैं कि आप्टे करीब 600 लोगों से व्यक्तिगत तौर पर मिले और 40 संस्थाओं का दौरा किया. तब विश्व हिंदू परिषद की स्थापना का कार्य शुरू हुआ था.
भाऊराव देवरस, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी बाजपेयी का संगम ‘पाञ्चजन्य’
राष्ट्रधर्म प्रकाशन समूह अभी भी लखनऊ से ही संचालित है, जिसके तीन भाग हैं, राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका प्रकाशित होती है जिसके सम्पादक अशोक बाजपेयी हैं, पुराने पत्रकार हैं. दूसरा भाग लोकहित प्रकाशन है, जिससे सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. तीसरा भाग नूतन ऑफसेट प्रिटिंग प्रेस है. वरिष्ठ प्रचारक और विद्यारथी परिषद की ‘ध्येय यात्रा’ के सम्पादक रहे मनोज कांत राष्ट्रधर्म प्रकाशन समूह के निदेशक हैं. इससे पहले इस पद पर भाऊराव देवरस, दीनदयाल उपाध्याय, रज्जू भैया जैसे दिग्गज रहे चुके हैं. लखनऊ से ही विश्व संवाद केन्द्रों की शुरूआत हुई थी, यहां पहला केन्द्र 1989 में शुरू हुआ था. आजकल उमेश शुक्ला विश्व संवाद केन्द्र के प्रभारी हैं.