ओडिशा के पुरी में मौजूद भगवान जगन्नाथ का मंदिर चर्चा में है. यहां के रत्न भंडार में क्या-क्या है, इसकी इन्वेंट्री (लिस्टिंग) की जा रही है. रत्न भंडार में सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात हैं को लेकर हमेशा से दिलचस्पी बनी रही है. बुधवार को दोपहर 12 बजे के बाद से शुभ मुहूर्त में रत्न भंडार में क्या-क्या और कितना है इसकी जांच शुरू की गई है.
लेकिन इस बीच क्या आप जानते हैं जगन्नाथ मंदिर का रत्न भंडार किसके हवाले है, इसकी देखरेख कौन करता है? 12वीं सदी का जगन्नाथ मंदिर को पुराणों में धरती पर मौजूद वैकुंठ कहा गया है. इस मंदिर की भव्यता न सिर्फ आध्यात्मिक है, बल्कि ये अकूत धन-संपदा वाली भी है. इसे श्रीरत्न धाम, श्रीरत्नक्षेत्र भी कहते हैं.
देवी लक्ष्मी हैं रत्नभंडार की मालकिन
श्री का एक अर्थ लक्ष्मी होता है और श्रीक्षेत्र यानी लक्ष्मी का क्षेत्र. ऐसे में मंदिर में अकूत संपदा वाले रत्न भंडार के मौजूद होने और उसमें तमाम सोने-चांदी के आभूषण,सोने की मुहरें, बर्तन, हीरे-जवाहरात के होने की मान्यता को आधार मिलता है.
क्या रत्न भंडार में हैं सांप?
देवी लक्ष्मी धन की देवी हैं. इसलिए श्रीरत्न क्षेत्र और रत्न भंडार की जिम्मेदारी उन्हीं के पास है. देवी लक्ष्मी एक तरह से इसकी मालकिन हैं. देवी लक्ष्मी खुद धन स्वरूप हैं और उनकी मायावी शक्तियां इस धन की रक्षा करती हैं. पौराणिक मान्यताओं में धन को भी माया कहा जाता है और इस माया की सुरक्षा नाग (दैवीय सांप) करते आए हैं. जैसे भगवान विष्णु के नाग शेष और अनंत हैं, ठीक उसी तरह देवी लक्ष्मी के भी दो सेवक नाग हैं. इनका नाम पद्म और महापद्म हैं.

क्या हैं पौराणिक मान्यताएं
पद्म और महापद्म रुपये (धन) की गिनती में बहुत बड़ी राशियां भी हैं. इतिहास में जिक्र आता है कि मगध में नंद वंश के अंतिम सम्राट घनानंद को महापद्मनंद भी कहा जाता था, क्योंकि उसके खजाने की कीमत कई महापद्म मूल्य की थी. आज एक महापद्म को भारत की जनसंख्या में बांटा जाए तो हर किसी को 714 रुपये मिलेंगे. पद्म और महापद्म यही दोनों नाग श्रीरत्न क्षेत्र के खजाने की रखवाली करते हैं.
शिव के स्वरूप भगवान लोकनाथ हैं रक्षक
ये दोनों नाग शिवगण भी हैं. जगन्नाथ मंदिर पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही देवाधिदेव लोकनाथ महादेव का भी मंदिर है. लोकनाथ मंदिर पुरी में जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. कहते हैं कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी. महाशिवरात्रि के मौके पर यहां महादेव की डोल उत्सव यात्रा निकलती है.
इस यात्रा को उतने ही धूम-धाम से आयोजित किया जाता है, जितने उत्साह से पुरी की रथयात्रा. इस डोल उत्सव यात्रा के जरिए महादेव लोकनाथ के उत्सव विग्रह को जगन्नाथ धाम ले जाया जाता है. यही लोकनाथ देव शिवशंकर ही रत्न क्षेत्र की सुरक्षा करते हैं और उनके नाग रत्नभंडार के पहरेदार हैं. मंदिर के रत्न भंडार में सांपों के देखे जाने का भी दावा किया जाता रहा है.
बुधवार को जब SOP के तहत रत्न भंडार की गिनती प्रक्रिया शुरू हुई तो उससे पहले विशेष अनुष्ठान के जरिये जगन्नाथ जी के साथ-साथ लोकनाथ देव से भी अनुमति ली गई थी. वहीं जब यह प्रक्रिया शुरू हुई तो मौके पर स्नेक हेल्पलाइन से स्नेक हैंडलर भी तैनात किए गए हैं.