नालंदा (बिहार) के मघड़ा में मौजूद शीतला माई मंदिर से दुखद घटना सामने आई है. यहां चैत्र महीने के आखिरी मंगलवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी और देखते ही देखते हालत बेकाबू हो गए. मंदिर प्रांगण में भीड़ के इस दबाव के कारण 8 लोगों की मौत की बात सामने आई है, साथ ही कई लोग घायल हुए हैं.
नालंदा में प्राचीन विश्वविद्यालय के खंडहर के बहुत पास स्थित एक गांव है मघड़ा. कहते हैं कि यहां एक राजा वृषकेतु को सपना आया था. उन्होंने सपने वाले स्थान पर खुदाई की तो घड़े से मां की प्रतिमा मिली. फिर उसी गड्ढे से जल की धारा फूट पड़ी. कुएं की खुदाई में मां की प्रतिमा यहां से प्रकट हुई, जिसे मिट्ठी कुआं (मीठा कुआं) कहते हैं और इसी कहानी के आधार पर गांव का नाम मघड़ा पड़ गया.
गांव के मुहाने पर है मंदिर
मघड़ा में माता शीतला का मंदिर ठीक मुहाने पर है. देवी शीतला (सितला माई) सीवान की रक्षा करती हैं, साफ-सफाई की देवी हैं और बच्चों को भी संभालती हैं. फाल्गुन-चैत्र महीने में जब हवा बदलती है और गर्म-शीत का असर ज्यादा होता है तब गांवों में सीतला रोग (बड़ी-छोटी चेचक) बहुत फैलता है. शीतला इसी रोग के निवारण और निदान की देवी हैं. इसीलिए चैत्र महीने में लोग यहां देवी को धार चढ़ाने आते हैं. इसे जली शीतलीकरण कहा जाता है, माना जाता है कि इससे ठंडक बनी रहती है और चेचक के फफोले नहीं पड़ते हैं.

मंदिर का इतिहास बहुत अद्भुद और आश्चर्य से भरा है. इस मंदिर परिसर और आसपास बहुत से नीम के पेड़ हैं. कहते हैं कि यहां नीबिरिया छांव (नीम के पेड़ों की छांव) में सोने भर से कई तरह के त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं. इस औषधीय चमत्कार की बातों के प्रमाण इतिहास के पन्नों में भी दर्ज हैं. नालंदा में शिक्षा के दौरान चीनी यात्री ह्वेनसांग भी यहां आए थे. तब वे अक्सर इस मंदिर परिसर के नीम और पीपल की शीतल छांव में आराम किया करते थे. ह्वेनसांग के दस्तावेजों में इस मंदिर का जिक्र मिलता है.
कैसी है मंदिर में प्रतिमा?
मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर की देवी प्रतिमा है. प्रतिमा बहुत छोटी ही है, लगभग 12 से 15 इंच की लेकिन आकर्षक है और समय के साथ चढ़ावे आदि के कारण इसे पूरा देखना मुमकिन नहीं है. माता की प्रतिमा के सिर की ओर नौ धारियां हैं जो नौ देवियों के रूप की याद दिलाती हैं. प्रतिमा की दाईं ओर सूर्य और बाईं ओर चंद्र हैं. चार भुजा वाली शीतला माई के एक हाथ में कलश है, दूसरे में श्री शीतला पुस्तक, निचले एक हाथ में झाड़ू और चौथे हाथ में नीम की डाली और फलों की टोकरी है.
आमतौर पर मंगलवार का दिन देवी का खास दिन है. खास तौर पर चैत्र के महीने के सारे मंगलवार बहुत भीड़ भरे होते हैं, क्योंकि इस महीने दो परंपराएं खास होती हैं. एक तो मंगला धार चढ़ाने की परंपरा है जो मंगलवार को चढ़ती है दूसरा है, नवरात्र की सप्तमी से लेकर पूर्णिमा तक चलने वाला मेला.
क्या है परंपरा?
रामनवमी के दिन पर यहां ध्वजा भी स्थापित की जाती है और महानवमी के दिन भी आस-पास के गांवों की बड़ी भीड़ यहां उमड़ती है. यहां प्राचीन काल से चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी के दिन बसौरा मनाने की परंपरा चली आ रही है. इस कारण मझड़ा, जोरासपुर, जमालचक, कछैली समेत आसपास के कई गांवों में चूल्हे नहीं जलते हैं. इन गांवों में एक दिन पहले ही शाम में ही खाना बना लिया जाता है. अगले दिन रात में लोग बनाए गए खाने को बसौरा (बासी भोजन) के रूप में ग्रहण करते हैं.