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मौत की सजा, 20 साल जेल और 34 करोड़ ब्लड मनी... सऊदी से लौटे अब्दुल रहीम की कहानी

केरल के अब्दुल रहीम 24 साल की उम्र में बेहतर भविष्य का सपना लेकर सऊदी अरब गए थे. लेकिन एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी. मौत की सजा, दो दशक की जेल और हर दिन फांसी के डर के बीच उन्होंने जिंदगी बिताई. आखिरकार दुनिया भर के मलयालियों ने 34 करोड़ रुपए की ब्लड मनी जुटाई और उनको नया जीवन मिल गया.

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केरल के कोझिकोड के रहने वाले अब्दुल रहीम साल 2006 में सऊदी अरब गए थे. (File Photo: ITG)
केरल के कोझिकोड के रहने वाले अब्दुल रहीम साल 2006 में सऊदी अरब गए थे. (File Photo: ITG)

अब्दुल रहीम केरल के रहने वाले हैं. उन्होंने सऊदी अरब की मौत की सजा वाली जेल में करीब दो दशक बिताए. आखिरकार एक बड़े जन अभियान के जरिए 34 करोड़ रुपए की 'ब्लड मनी' जुटाए जाने के बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी और वह अपने घर लौट पाए. इंडिया टुडे के अजमल अब्बास से बातचीत में रहीम ने जेल के भीतर की जिंदगी, मौत के साए में गुजरे वर्षों और अपने सपनों को फिर से संवारने की कोशिशों के बारे में खुलकर बात की है.

कल्पना कीजिए कि 24 साल का एक नौजवान, जो केरल में अपना घर छोड़कर सऊदी अरब के लिए उड़ान भरता है. उसके पास कपड़ों से भरा एक सूटकेस है और मन में बेहतर भविष्य के अनगिनत सपने. उसकी तरह हजारों मलयाली युवा भी यही चाहते हैं कि एक घर बनाना, परिवार का सहारा बनना और जिंदगी को नई दिशा देना. लेकिन सोचिए, यदि कुछ ही हफ्तों बाद एक हादसा उसकी पूरी दुनिया बदल दे. उसके सपने चकनाचूर कर दे.

अब्दुल रहीम की जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी ही है. उन्होंने लगभग 20 साल इसी भयावह सच्चाई के साथ बिताए. पिछले सप्ताह एक बड़े जन अभियान के बाद उन्हें रिहा किया गया. इस अभियान के तहत उनकी जान बचाने के लिए 34 करोड़ रुपए की 'ब्लड मनी' जुटाई गई. जेल के भीतर उनकी दुनिया ऐसी थी, जहां दरवाजे पर होने वाली हर दस्तक उन्हें अपनी जिंदगी की आखिरी दस्तक लगती थी. रहमी केरल के कोझिकोड के रहने वाले हैं.

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रहीम को अपने सऊदी स्पॉन्सर के बेटे के साथ हुई एक जानलेवा घटना के मामले में जेल भेजा गया था. वहां रहते हुए उन्होंने अपने कई साथी कैदियों को एक-एक कर गायब होते देखा. उन्होंने खौफ के साथ उन कैदियों की आखिरी प्रक्रिया देखी, जब उनकी तस्वीरें खींची जाती थीं, उंगलियों के निशान लिए जाते थे और फिर उन्हें मौत की सजा के लिए ले जाया जाता था. जब यही प्रक्रिया उनके साथ शुरू हुई, तो उन्हें लगा कि अब जिंदगी का अंत करीब है.

अब्दुल रहीम ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, "मेरी तस्वीरें खींची गईं, उंगलियों के निशान लिए गए. जिन लोगों के फिंगरप्रिंट मेरे साथ लिए गए थे, उनमें से कई को बाद में मौत की सजा दे दी गई." आज 44 साल की उम्र में दो दशक जेल में बिताने के बाद अपने घर लौटे रहीम किसी पूर्व कैदी की तरह कम और ऐसे व्यक्ति की तरह अधिक नजर आते हैं, जो जिंदगी से मिले दूसरे मौके को समझने और उसे स्वीकार करने की कोशिश कर रहा है.

रहीम बताते हैं, "जब मुझे पता चला कि मेरी जान बचाने के लिए 'ब्लड मनी' इकट्ठा करने की कोशिशें चल रही हैं, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे जिंदगी दोबारा मिल गई हो. और जब यह निश्चित हो गया कि जरूरी रकम जुटा ली गई है, तब मेरे लिए वह एक नए जन्म जैसा पल था." उनकी रिहाई तब संभव हो सकी, जब दुनिया भर में फैले मलयाली समुदाय ने 34 करोड़ रुपए जुटाए. इस राशि ने सऊदी कानून के तहत उनकी आजादी का रास्ता खोल दिया.

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abdul rahim story

जिस दिन सब कुछ टूट गया

साल 2006 में अब्दुल रहीम केरल से सऊदी अरब गए थे. भारत में वो एक स्कूल बस ड्राइवर के तौर पर काम करते थे. उन्हें उम्मीद थी कि विदेश जाकर वो अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार पाएंगे. रियाद में उन्हें ड्राइवर की नौकरी मिली और नई जिंदगी की शुरुआत भी हो गई थी. लेकिन फिर वो दिन आया जिसने उनके सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया. वो अपने सऊदी स्पॉन्सर के बेटे अनस को लेकर जा रहे थे. अनस एक छोटा लड़का था.

वो पहले ही एक कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो चुका था और उसकी गर्दन पर नाजुक सर्जरी हुई थी. रास्ते में लड़के ने जिद पकड़ ली कि रहीम ट्रैफिक सिग्नल पर रेड लाइट पार कर जाएं. उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया. इस बात से नाराज होकर लड़के ने उन पर थूक दिया. उसी क्षण सहज प्रतिक्रिया में उन्होंने अपना हाथ उठाया ताकि उसे रोक सकें. लेकिन उनका हाथ लड़के की गर्दन पर जा लगा. दुर्भाग्य से सर्जरी वाली जगह चोट लग गई.

रहीम के मुताबिक, कुछ ही समय बाद अनस की मौत हो गई. एक पल में सब कुछ बदल चुका था. बेहतर भविष्य की तलाश में गया एक नौजवान अचानक खुद को हत्या के आरोप में घिरा हुआ पाया.

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कानून समझ नहीं आता था

अनस की मौत के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, जबकि रहीम को सीधे जेल भेज दिया गया. सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उन्हें अरबी भाषा नहीं आती थी. अदालत की पूरी कार्यवाही अनुवादकों के जरिए चलती रही. रहीम बताते हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता था कि उनके खिलाफ क्या दलीलें दी जा रही हैं और क्या फैसले लिए जा रहे हैं. अनस के परिवार ने मौत के बदले मौत की मांग की और सऊदी कानून के तहत उनको कानूनी समर्थन मिला.

आखिरकार 2006 में अदालत ने रहीम को मौत की सजा सुना दी.

जेल में ऐसे बिताए दो दशक

सजा सुनाए जाने के बाद शुरू हुआ इंतजार का वह दौर, जो धीरे-धीरे 20 साल लंबा हो गया. जेल की जिंदगी एक जैसे दिनों का अंतहीन सिलसिला बन गई. खाना, बैठना, सोना और सोचना. यही दिनचर्या थी. समय बीतता गया. दिन महीनों में और महीने वर्षों में बदलते गए. बाहरी दुनिया से संपर्क बेहद सीमित था. कभी-कभार 15 मिनट के लिए फोन करने की अनुमति मिल जाती थी. न मोबाइल फोन था, न इंटरनेट और न ही बाहरी दुनिया के बारे में कोई जानकारी.

रहीम कहते हैं कि उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि बाहर लोग उनकी रिहाई के लिए इतनी बड़ी मुहिम चला रहे हैं.

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हर दस्तक, दिल धड़का देती

जेल में रहते हुए सबसे भयावह अनुभव था मौत की सजा पाए कैदियों को आखिरी समय के लिए तैयार होते देखना. रहीम बताते हैं कि जेल अधिकारियों की प्रक्रिया लगभग तय होती थी. पहले कैदी की तस्वीरें ली जाती थीं. फिर उंगलियों के निशान लिए जाते थे. इसके बाद किसी भी दिन, किसी भी समय उसे मौत की सजा के लिए ले जाया जा सकता था. उन्होंने कई कैदियों को इस प्रक्रिया से गुजरते देखा और फिर हमेशा के लिए गायब होते देखा.

यही दृश्य उनके मन पर गहरी छाप छोड़ते गए. फिर एक दिन यही प्रक्रिया उनके साथ भी शुरू हो गई. रहीम कहते हैं, "मेरी तस्वीरें खींची गईं, उंगलियों के निशान लिए गए. जिन लोगों के साथ मेरे फिंगरप्रिंट लिए गए थे, उनमें से कई लोगों को बाद में मौत की सजा दे दी गई". उन्हें लगने लगा था कि अब उनका अंत निश्चित है.

उम्मीद भी खत्म हो गई थी

समय बीतने के साथ रहीम पूरी तरह निराशा में डूबने लगे थे. उन्होंने परिवार से बात करना भी लगभग बंद कर दिया. वो बताते हैं कि एक समय ऐसा आया जब उन्होंने खुद को समझा लिया कि अब कोई चमत्कार नहीं होगा. यही उनकी जिंदगी की सच्चाई है. अंत का इंतजार करना ही नियति है. मौत का डर, अकेलापन और भविष्य की अनिश्चितता लगातार उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही थी. लेकिन उनकी जिंदगी बचाने की कोशिशें तेज थीं.

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मां से मुलाकात का वो पल

जेल के वर्षों में एक पल ऐसा भी आया जिसे रहीम आज तक नहीं भूल पाए हैं. उनकी मां उनसे मिलने आईं. लेकिन रहीम नहीं चाहते थे कि उनकी मां उन्हें हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखें. उन्होंने अधिकारियों से गुजारिश की. बाद में भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद मुलाकात के दौरान उनके हाथों की हथकड़ियां हटा दी गईं, हालांकि पैरों में जंजीरें बनी रहीं. रहीम कहते हैं कि उस हालत में अपनी मां से मिलना उनके लिए पीड़ादायक अनुभव था.

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पैसे जुटाने का अभियान

इस बीच जेल की दीवारों के बाहर कई लोग लगातार उनकी जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे थे. भारतीय दूतावास के अधिकारी, कानूनी सहायता कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और दुनिया भर में फैला मलयाली समुदाय इस अभियान का हिस्सा बन गया. वर्षों तक पैरवी की गई. लोगों से मदद मांगी गई. केरल के कारोबारी बॉबी चेम्मनूर का हस्तक्षेप भी इस पूरी प्रक्रिया में बेहद अहम माना गया. धीरे-धीरे ब्लड मनी के लिए पैसे जुटाने का अभियान बड़ा होता गया. 

आखिरकार दुनिया भर के मलयालियों ने करीब 34 करोड़ रुपए जुटा लिए. यही वह राशि थी जिसने सऊदी कानून के तहत रहीम की रिहाई का रास्ता साफ किया.

'ये मेरे लिए दूसरा जन्म था'

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रहीम बताते हैं कि जब पहली बार उन्हें पता चला कि उनकी जान बचाने के लिए ब्लड मनी इकट्ठा करने की कोशिशें चल रही हैं, तब उन्हें उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी. लेकिन जब यह पुष्टि हुई कि पूरी राशि जुटा ली गई है, तब उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्हें जिंदगी दोबारा मिल गई हो. उनके शब्दों में, "ये मेरे लिए एक नया जन्म था." जिस इंसान ने मानसिक रूप से खुद को मौत के लिए तैयार कर लिया था, उसके लिए आजादी किसी चमत्कार से कम नहीं थी.

हजारों लोग कर रहे थे इंतजार 

दो दशक बाद जब रहीम केरल लौटे तो एयरपोर्ट पर हजारों लोग उनका स्वागत करने पहुंचे. इतनी बड़ी भीड़ देखकर वह खुद हैरान रह गए. रहीम कहते हैं कि यह सिर्फ उनकी कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों लोगों की कहानी है जिन्होंने जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर एक इंसान की जिंदगी बचाने के लिए योगदान दिया. उनके मुताबिक, लोगों की यही एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी.

जिंदगी को बनाने की चुनौती

अब रहीम उस दुनिया में लौटे हैं जो पिछले 20 वर्षों में पूरी तरह बदल चुकी है. तकनीकी बदल गई है. समाज बदल गया है. संचार के तरीके बदल गए हैं. डिजिलट का जमाना है. सोशल मीडिया, इंटरनेट, स्मार्टफोन, ह्यूमन राइट, जैसे शब्द अब आम हो चुके हैं. जब वो जेल गए थे, तब जिन बच्चों को जानते थे, वे अब बड़े हो चुके हैं. कई रिश्तेदार बूढ़े हो गए हैं. दुनिया आगे बढ़ गई, लेकिन उनकी जिंदगी वहीं ठहर गई थी. अब वह फिर से सपने देखना सीख रहे हैं.

रहीम कहते हैं, "मेरे सारे सपने टूट गए थे. अब मुझे फिर से सपने देखने होंगे."

इंसानी एकजुटता की कहानी

अब्दुल रहीम की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई की कहानी नहीं है. यह उम्मीद, धैर्य, इंसानी संवेदनाओं और सामूहिक प्रयास की कहानी भी है. एक ऐसा व्यक्ति जो बड़े सपनों के साथ सऊदी अरब गया था, वो दो दशक बाद इंसानी भलाई और सामाजिक एकजुटता के प्रतीक के रूप में वापस लौटा है. उसकी जवानी भले ही जेल की सलाखों के पीछे गुजर गई हो, लेकिन उसकी जिंदगी अब फिर से उसकी अपनी है. और शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत है.

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