गुरुग्राम में 4 साल की मासूम बच्ची से रेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेट के रवैये को लेकर उन्हें खरी-खरी सुनाई है.
CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉय माल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच को ASG ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि इस मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट की रिपोर्ट अभी नहीं मिल पाई है. हालांकि गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारियों आईओ दोनों कोर्ट में मौजूद हैं.
दरअसल पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को पूरे रिकॉर्ड के साथ पेश होने के लिए तलब किया था. इस दौरान कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई थी कि मजिस्ट्रेट ने जब बच्ची का बयान दर्ज किया था तब आरोपी उसके बेहद नजदीक खड़ा था.
सुप्रीम कोर्ट का सुझाव है कि इस मामले की जांच के लिए महिला आईपीएस अधिकारियों की एसआईटी बनाई जा सकती है. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने पुलिस के साथ-साथ सीडब्ल्यूसी की गंभीर खामियों की ओर भी इशारा किया. उन्होंने दावा किया कि एम्स के डॉक्टर ने फरवरी में इलाज के दौरान पीड़ित बच्चे के बयान के बारे में एक विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट दी थी, लेकिन मार्च में डॉक्टर ने उसका बयान बदल दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'गुरुग्राम पुलिस, बाल कल्याण अधिकारी पॉक्सो कानूनों से 'पूरी तरह अनजान' हैं. सीजेआई ने कहा कि असंवेदनशील, लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना जांच की वजह से बच्ची की तकलीफ कई गुना बढ़ गई थी.'
अदालत ने कहा कि कमिश्नर से लेकर सब इंस्पेक्टर तक ने ये साबित करने की हर मुमकिन कोशिश की कि बच्चे के पास कोई सबूत नहीं है या माता-पिता का कोई मतलब नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है कि धारा 6 पॉक्सो पर अपराध स्पष्ट रूप से किया गया था. हालांकि, पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और अज्ञात कारणों से धारा 10 के तहत अपराध को कम कर दिया.
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जब मीडिया में ये बताया गया कि अदालत संज्ञान ले रही है, तो एक नया रुख तैयार किया गया. पीड़ितों के पिता के प्रतिनिधित्व के बाद 12 मार्च को तथ्यों की फिर से पुष्टि की गई थी. क्योंकि घटना के लिए गहन जांच की जरूरत होती है, इसलिए हमें ऐसा लगता है कि घटना की गहराई से जांच की जानी चाहिए.