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क्या रूसी तेल खरीदना बंद कर सकता है भारत? जानें क्यों यह फैसला नहीं इतना आसान

विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद करना भारत के लिए व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि यह भारतीय रिफाइनरियों के अनुकूल और अपेक्षाकृत सस्ता है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है.

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रक्षा क्षेत्र के अलावा रूस 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना. (File Photo: PTI)
रक्षा क्षेत्र के अलावा रूस 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना. (File Photo: PTI)

भारत लंबे समय तक पश्चिम एशिया के रेगिस्तानी देशों को ही अपने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले तेल का प्रमुख स्रोत मानता रहा. लेकिन वर्ष 2022 के बाद तस्वीर बदली और रूस भारत के सबसे बड़े कच्चा तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया. अब अमेरिका के प्रतिबंधों और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों के बीच भारत-रूस तेल व्यापार पर सवाल खड़े हो रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में रूसी तेल आयात बंद कर सकता है? भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी पांच दशकों से अधिक पुरानी है, जिसकी नींव सोवियत काल में पड़ी थी. 

रक्षा क्षेत्र के अलावा रूस 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत का प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना, जब पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते उसने भारी छूट पर तेल बेचना शुरू किया. वर्ष 2025 के मध्य तक भारत का रूसी तेल आयात 20 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक पहुंच गया था. हालांकि, अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद रूसी तेल आयात में गिरावट दर्ज की गई. एनालिटिक्स फर्म क्लपर (Kpler) के मुताबिक, जनवरी में भारत का रूसी तेल आयात घटकर 12.15 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया. भारत वर्तमान में अपनी कुल कच्चा तेल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है. 

रूसी क्रूड भारतीय रिफाइनरियों के लिए बेहतर

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करना न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से आसान. रूसी Urals क्रूड भारी और सल्फर युक्त होता है, जो भारतीय रिफाइनरियों के लिए अनुकूल है और लागत में फायदा देता है. इसके विपरीत अमेरिकी या वेनेजुएलन तेल को इस्तेमाल करने के लिए अतिरिक्त प्रोसेसिंग और मिश्रण की जरूरत होगी, जिससे खर्च बढ़ेगा. ऊर्जा विशेषज्ञ इगोर युश्कोव के अनुसार, अमेरिकी तेल से रूसी तेल की सीधी भरपाई संभव नहीं है. 

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टैंकर बाजार सलाहकार Wisdom & Boats ने का कहना है कि अगर भारत रूस से पूरी तरह कट जाता है तो उसे औसतन 17 लाख बैरल प्रतिदिन (2025 का औसत) की जगह भरनी होगी. संभवतः भारत वेनेजुएला से 1.5 लाख बैरल से अधिक लेगा, लेकिन इससे अमेरिकी निर्यात पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. अगर भारत रूस से तेल खरीद कम करता है तो चीन उस तेल को खरीद सकता है, जिससे रूस की बिक्री पर खास असर नहीं पड़ेगा. रूस ने भी संकेत दिया है कि वह भारत द्वारा तेल आयात में विविधता लाने को असामान्य नहीं मानता. 

कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो रूसी तेल आयात में धीरे-धीरे कटौती से भारत-रूस संबंधों पर गंभीर असर पड़ने की संभावना कम है. हालांकि, अचानक और पूर्ण कटौती से भारत में तेल कीमतों में तेजी आ सकती है. विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि भारत के लिए रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद करना फिलहाल व्यावसायिक और रणनीतिक रूप से कठिन है. भारत की नीति हमेशा संतुलित रही है और आगे भी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक बदलाव किए जाने की संभावना है. 

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भारत अपने क्रूड आयात में विविधता कैसे लाया?

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो विविध स्रोतों से क्रूड आयात से ऊर्जा सुरक्षा बढ़ती है और भू-राजनीतिक जोखिम कम होता है. बीते दो वर्षों में भारत ने अपने आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 27 से बढ़ाकर 40 से अधिक कर दी है, जिनमें अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और पश्चिम अफ्रीकी देश शामिल हैं. इससे भारत की निर्भरता किसी एक देश पर कम हुई है. 2022 से पहले भारत का अधिकांश क्रूड मध्य पूर्व (सऊदी अरब, इराक, UAE) से आता था. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद छूट वाले रूसी क्रूड का फायदा उठाकर भारत ने आयात बढ़ाया, उसे रिफाइन किया और यूरोप को पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए.

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ट्रेड डील का हिस्सा है रूसी तेल नहीं खरीदना?

व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने एक सवाल के जवाब में कहा कि व्यापार समझौते के तहत भारत अमेरिका से अधिक तेल खरीदने और वेनेजुएला के विकल्प तलाशने पर सहमत हुआ है. इसे उन्होंने अमेरिकी श्रमिकों के लिए जीत और यूक्रेन में रूस के युद्ध को फंडिंग रोकने के रूप में पेश किया. भारत के साथ ट्रेड डील की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर अपने पोस्ट में कहा, 'मोदी ने रूसी तेल खरीदना बंद करने और अमेरिका से बहुत अधिक खरीदने का वादा किया है, और संभवतः वेनेजुएला से भी.'

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हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने अभी तक रूसी तेल पर पूर्ण प्रतिबंध की किसी भी बात की पुष्टि नहीं की है. मीडिया के सवाल पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने गुरुवार को कहा, 'भारत की ऊर्जा सुरक्षा या ऊर्जा स्रोतों के मामले में सरकार ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है, जिसमें मैं भी शामिल हूं, कि 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के अनुरूप ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना हमारी रणनीति का मूल है. भारत के सभी फैसले इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं और आगे भी लिए जाएंगे.'

वेनेजुएला से तेल खरीद पर उन्होंने कहा, 'वेनेजुएला लंबे समय से हमारा ऊर्जा क्षेत्र में साझेदार रहा है, व्यापार और निवेश दोनों में. हम 2019-20 तक वहां से क्रूड तेल आयात करते थे, फिर रुक गए. 2023-24 में फिर शुरू किया, लेकिन प्रतिबंधों के कारण फिर रोकना पड़ा. हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) ने 2008 से ही वेनेजुएला की राष्ट्रीय तेल कंपनी PDVSA के साथ साझेदारी बनाए रखी है. ऊर्जा सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप, भारत किसी भी क्रूड आपूर्ति विकल्प की व्यावसायिक संभावनाओं को देखने के लिए खुला है, जिसमें वेनेजुएला भी शामिल है.'

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भारत तेल नहीं लेगा तो रूस से संबंध खराब होंगे?

क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा कि उन्हें भारत द्वारा रूसी क्रूड आयात कम करने की कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा, 'हम और सभी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञ जानते हैं कि भारत को तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का रूस एकमात्र आपूर्तिकर्ता नहीं है. भारत हमेशा अन्य देशों से भी खरीदता रहा है. इसमें कुछ नया नहीं है.' इस बयान से समझा जा सकता है कि भारत अगर अपने तेल आयात का विविधीकरण करता है और रूस से तेल आयात कम करता है तो इससे संबंधों के स्तर पर गंभीर नुकसान होने की संभावना कम है.

भारत और रूस की साझेदारी सिर्फ तेल आयात पर निर्भर नहीं है बल्कि रक्षा, उर्वरक, ऊर्जा निवेश जैसे कई क्षेत्रों में फैली है. रूसी क्रूड आयात में धीरे-धीरे कमी एक संकेत है कि भारत अमेरिका के साथ संबंध सुधारना चाहता है. लेकिन अचानक कटौती से भारत में तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है. व्यापारिक और तकनीकी कारणों से रूसी तेल से पूरी तरह दूरी बनाना भारत के लिए आसान नहीं है. चाहे अमेरिका हो या रूस, भारत संबंधों को लेकर हमेशा संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाता रहा है. ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए भारत आगे भी यही रास्ता अपनाएगा.

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