दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लिकर पॉलिसी मामले की सुनवाई के दौरान पूर्व एलजी अनिल बैजल के बयान और ऑफिशियल फाइल रिकॉर्ड के बीच गंभीर विरोधाभास का जिक्र किया है. अदालत ने कहा कि आधिकारिक फाइल नोटिंग और एलजी सचिवालय के अफसरों के बयान मौखिक दावों से मेल नहीं खाते.
किन-किन के बयान देखे गए?
कोर्ट ने पूर्व एलजी अनिल बैजल के बयान की जांच की. साथ ही एलजी सचिवालय के अफसरों को गवाह के रूप में परखा गया, जिनमें सचिव टू एलजी अंकिता मिश्रा बुंदेला और एडिशनल सेक्रेटरी अजय कुमार शामिल थे. फाइल सामान्य प्रक्रिया के तहत एलजी को भेजी गई अदालत ने नोट किया कि लिकर पॉलिसी से जुड़ी फाइल सामान्य नियमों के तहत एलजी को भेजी गई थी. फाइल की मूवमेंट से यह नहीं दिखता कि एलजी की ओर से किसी तरह की आपत्ति दर्ज की गई हो.
कोविड के दौरान फाइलों की डिजिटल मूवमेंट
कोर्ट ने यह भी कहा कि एलजी का मौखिक बयान ऑफिशियल फाइल नोटिंग और सेक्रेटेरियट के अफसरों के बयानों से मेल नहीं खाता. सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कोविड के दौर में फाइलों का फिजिकल एक्सेंज नहीं हो रहा था.
फाइलें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गईं. इंटरनल नोट्स डिजिटल रूप से तैयार हुए और बाद में उन्हें प्रिंट कर फिजिकल फाइल में लगाया गया.
कई बैठकें हुईं, लेकिन इनफॉर्मल नोट्स फाइल में नहीं जोड़े गए
एलजी सचिवालय के एक गवाह ने अदालत को बताया कि लिकर पॉलिसी पर कई बैठकों में चर्चा हुई थी. हालांकि, इनफॉर्मल नोट्स को फाइल का हिस्सा नहीं बनाया गया. अदालत ने यह भी दर्ज किया कि सभी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की जानकारी एलजी को दी गई थी. फाइल नोटिंग में स्पष्ट रूप से लिखा है— 'LG has been apprised' यानी एलजी को मामले की जानकारी दे दी गई है.
‘7 सुझाव’ जोड़े जाने के बाद भी कई बार एलजी को भेजी गई फाइल
कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, सात सुझाव जोड़े जाने के बाद भी फाइल कई बार एलजी सचिवालय को भेजी गई.
फाइल इन तारीखों पर भेजी गई—
09.11.2021
30.11.2021
01.04.2022
05.04.2022
अदालत ने गौर किया कि इन बाद की तारीखों में भी फाइल पर किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज नहीं की गई.
ऑफिशियल नोटिंग को माना गया महत्वपूर्ण
कोर्ट ने कहा कि उस समय दर्ज ऑफिशियल नोटिंग का इस मामले में खास महत्व है. सरकारी कामकाज के दौरान नियमित प्रक्रिया में दर्ज की गई टिप्पणियां रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. एलजी सचिवालय में फाइल को देखने-परखने वाले अफसरों के बयान भी आधिकारिक जिम्मेदारी निभाते हुए दिए गए हैं. अदालत ने कहा कि इन बयानों और नोटिंग से वह संस्करण साबित नहीं होता, जो अब एलजी की ओर से पेश किया जा रहा है.
सिर्फ मौखिक दावा ही काफी नहीं
कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक ऑफिशियल नोटिंग की सत्यता को चुनौती नहीं दी जाती, तब तक केवल यह मौखिक दावा कि “सिर्फ एक सुझाव दिया गया था”, कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं माना जा सकता. अदालत के मुताबिक, रिकॉर्ड में दर्ज दस्तावेज और अधिकारियों के बयान मौखिक दावों से ज्यादा मजबूत आधार रखते हैं.