नेपाल की राजनीतिक इतिहास में नया अध्याय शुरू होने जा रहा है. मौका है प्रधानमंत्री पद के लिए चुने गए बालेंद्र शाह के शपथ ग्रहण का, जिसका चर्चा नेपाल की सीमाओं से निकलकर इंटरनेशनल लेवल पर हो रही है. इसकी खास दो वजहें हैं. पहला तो शपथ ग्रहण की टाइमिंग और दूसरा इस आयोजन की तैयारियां और तरीका.
रामनवमी के मौके पर शपथ ग्रहण समारोह
टाइमिंग पर बात करें तो यह समारोह रामनवमी के खास मौके पर हो रहा है. यह वही समय होगा जब राम मंदिर अयोध्या में विशेष पूजा चल रही होगी. अयोध्या के राम मंदिर में रामनवमी के दिन खास वैज्ञानिक तरीके से रामलला के मस्तक पर सूर्यतिलक होता है. सूर्य की किरणें ठीक उनके मस्तक पर पड़ती हैं. शुक्रवार को जब एक तरफ अयोध्या में अध्यात्म का सूर्यतिलक हो रहा है तो ठीक उसी समय पड़ोसी देश नेपाल में सत्ता के नए चेहरे का राजतिलक हो रहा है.
समय और मुहूर्त का पॉलिटिकल संयोग
ये संयोग सिर्फ समय और मुहूर्त आदि का नहीं है. नवनिर्वाचित पीएम का ये 'राजतिलक' हिंदू वैदिक परंपराओं के साथ होगा. इसमें वैदिक सूक्तियों के स्वस्ति वाचन, मंगल पाठ, शंखनाद भी होंगे. ठीक वैसा ही माहौल जैसा कि पौराणिक कहानियों में राजतिलक और राज्याभिषेक के दौरान होने का अंदाजा लगाया जाता है.
परंपरा, प्रतीक और नया परिवर्तन
कुल मिलाकर नेपाल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां परंपरा, प्रतीक और नया परिवर्तन, तीनों एक साथ दिखाई दे रहे हैं. प्रधानमंत्री पद पर काबिज बालेन्द्र शाह का शपथग्रहण समारोह सिर्फ पावर ट्रांसफर का फंक्शन नहीं है, बल्कि ये अपने आप में न सिर्फ पूरे नेपाल को बल्कि अगल-बगल के दोनों पड़ोसियों को भी संदेश देने का जरिया है. शपथ ग्रहण का मंच अब मैसेज का मंच है. इस तरह रामनवमी के दिन, वैदिक मंत्रों, शंखनाद और स्वस्ति वाचन के बीच होने वाला यह शपथग्रहण नेपाल की बदलती राजनीति में 'हिंदुत्व; के नए रूप 'एक तरह के ‘सूर्यतिलक’ की तरह देखा जा सकता है.
शपथग्रहण के लिए राम नवमी का दिन चुनना महज एक धार्मिक संयोग नहीं माना जा रहा. बल्कि इसी एक बात ने तो चर्चाओं को केंद्र में लाया है. इस पैरलल टाइम कोइंसिडेंस ने भारत-नेपाल के कल्चरल रिलेशन को भी अंडरलाइन किया है.
जनकपुर से चुनाव अभियान की शुरुआत
नेपाल और भारत के बीच ‘रामायण सर्किट’ सिर्फ धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भूगोल का भी हिस्सा है. जनकपुर, जिसे माता सीता का जन्मस्थान माना जाता है, बालेंद्र शाह ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत यहीं से की थी. ऐसे में रामनवमी पर शपथ लेना उनकी राजनीति सांस्कृतिक यादों को एक साथ कनेक्ट करती है.
यहां सबसे जरूरी सवाल ये उभरता है कि, क्या ये सिर्फ सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल है या हिंदुत्व की नई तरह की राजनीति की शुरुआत. हालांकि इसे सीधे-सीधे राजनीतिक हिंदुत्व से जोड़ना जल्दबाजी होगी. शाह का यह कदम आक्रामक या वैचारिक हिंदुत्व से अलग दिखता है, जो साउथ एशिया के कुछ हिस्सों में देखा जाता है. ये अभी तकल 'सांस्कृतिक हिंदुत्व' ही है, जहां धार्मिक प्रतीक आस्था के तौर पर सम्मान पाते हैं और उन्हें ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा होता है.
क्या शपथ ग्रहण धार्मिक प्रतीकों की वापसी का जरिया?
दरअसल, नेपाल लंबे समय तक हिंदू राष्ट्र रहा है, लेकिन 2008 में राजशाही के अंत के बाद यह एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना. ऐसे में धार्मिक प्रतीकों की वापसी को राजशाही के फिर से उभरने के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को ही फिर से स्थापित करने के तौर पर देखा जा रहा है.
क्या है तैयारियां?
शपथग्रहण समारोह की तैयारियों का स्ट्रक्चर भी इसकी पुष्टि करते हैं. एक ओर 108 हिंदू बटुक स्वस्ति वाचन और शंखनाद करेंगे तो दूसरी ओर 107 बौद्ध लामा मंगल पाठ भी गाएंगे. धर्मों और पंथों का ये मेल-जोल नेपाल की सोशल इंजीनियरिंग और रियल स्ट्रक्चर को दिखाता है. जहां हिंदू और बौद्ध परंपराएं एक-दूसरे में घुली-मिली हैं. शाह का यह कदम बताता है कि वे किसी एक धार्मिक पहचान को थोपने के बजाय, सभी को एक झंडे और एक छत के नीचे मिलाकर लाने वाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर संकेत कर रहे हैं.
नेपाल फर्स्ट से ग्रेटर नेपाल तक
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के नेता के तौर पर शाह की पूरी राजनीति 'नेपाल फर्स्ट' के कॉन्सेप्ट पर अब तक सामने आई है. ऐसे में धार्मिक प्रतीकों का उपयोग भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है, जहां वे जनता की भावनाओं से जुड़ते हैं, लेकिन किसी बाहरी वैचारिक प्रभाव से दूरी बनाए रखते हैं. इसका एक उदाहरण उनके जरिये 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा दिखाना भी रहा है, जो यह संकेत देता है कि उनका राष्ट्रवाद बाहरी प्रभावों के प्रति सजग है. ऐसे में रामनवमी का चयन भी भारत की राजनीति की नकल नहीं, बल्कि नेपाल की अपनी सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है.
नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक संबंध
नेपाल और भारत के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध बेहद गहरे हैं. राम, सीता और जनकपुर-अयोध्या का रिश्ता दोनों देशों को एक साझा सांस्कृतिक धागे में बांधता है, लेकिन शाह की राजनीति यह भी दिखाती है कि वे इस जुड़ाव को बनाए रखते हुए भी एक स्वतंत्र पहचान कायम रखना चाहते हैं. यही वजह है कि उनके कदमों में एक साथ जुड़ाव और दूरी दोनों दिखाई देते हैं. रामनवमी पर शपथ लेना जहां सांस्कृतिक निकटता का संकेत है, वहीं चीन समर्थित परियोजनाओं से दूरी बनाना और “ग्रेटर नेपाल” जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल एक स्वतंत्र राष्ट्रवादी रुख को दर्शाता है.
युवा वर्ग शाह की बड़ी ताकत
शाह की सबसे बड़ी ताकत युवा वर्ग है. नेपाल की औसत आयु करीब 25 वर्ष है और यही युवा वर्ग पारंपरिक राजनीतिक दलों से निराश होकर नए विकल्प की तलाश में था. दिलचस्प बात यह है कि यही युवा वर्ग पूरी तरह धार्मिक राजनीति का समर्थक नहीं माना जाता, लेकिन सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ाव जरूर रखता है. शाह ने इसी मनोविज्ञान को समझा है, जहां वे धर्म को राजनीति का केंद्र नहीं बनाते, लेकिन उसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं करते.
...तो शपथ ग्रहण के मायने क्या समझें जाएं?
अगर इस पूरे घटनाक्रम को समझें, तो यह 'हिंदुत्व का सूर्यतिलक' है, यानी ऐसा तिलक, जो पहचान का प्रतीक तो है, लेकिन इसे इतनी जल्दी आक्रामक का सिंबल नहीं मान लेना चाहिए. यह हिंदुत्व न तो राजशाही वाला दैवीय दावा करता है, न ही ध्रुवीकरण की तरह बंटवारा ही दिखता है. यह एक कल्चरल कॉन्फिडेंस है, जो अपनी जड़ों को अपनाता है, लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर.
हालांकि असली चुनौती अभी बाकी है. प्रतीकों की राजनीति जनभावनाओं को जोड़ सकती है, लेकिन शासन चलाने के लिए ठोस नीतियां और कूटनीतिक संतुलन जरूरी होगा. अगर शाह इस सांस्कृतिक ‘सूर्यतिलक’ को व्यवहारिक शासन में बदल पाते हैं, तो यह नेपाल के लिए एक नई राजनीतिक दिशा बन सकती है. वरना यह सिर्फ एक भव्य, लेकिन क्षणिक प्रतीक बनकर रह जाएगा.