बीती 27 फरवरी 2026 को राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल को बरी कर दिया था. कोर्ट ने दिल्ली के चर्चित शराब घोटाला केस में ये फैसला सुनाया था. कोर्ट ने शराब घोटाले के आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि बिना ठोस और पर्याप्त सबूतों के लगाए गए आरोप पर विश्वास नहीं किया जा सकता. इस फैसले के आने के बाद अरविंद केजरीवाल रो पड़े थे और उन्होंने इसे सत्य की जीत बताया था.
27 फरवरी- राउज एवेन्यू कोर्ट ने किया बरी
लेकिन, राउज एवेन्यू कोर्ट से बरी होना पूरे प्रकरण की समाप्ति नहीं थी, बल्कि ये एक नई पटकथा की शुरुआत थी, जिसका पहला एपिसोड कुछ ही दिनों में रिलीज हो गया. राउज एवेन्यू से अरविंद केजरीवाल के बरी होने के मामले को सीबीआई हाईकोर्ट में ले गई. उसके बाद से इस मामले का नया अध्याय शुरू हुआ, अरविंद केजरीवाल vs जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा... इस मामले की शुरुआत कैसे हुई और अब तक क्या-क्या हुआ, इसके सभी बड़े घटनाक्रमों पर डालते हैं एक नजर-
9 मार्च- सीबीआई ने किया दिल्ली हाईकोर्ट का रुख
राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची थी. 9 मार्च को इस मामले में सुनवाई हुई और दिल्ली शराब घोटाला मामले में हाई कोर्ट ने निचली अदालत के डिस्चार्ज ऑर्डर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
कोर्ट ने इस मामले में सभी 23 पक्षों को नोटिस जारी कर हफ्ते भर में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है. हाई कोर्ट ने सीबीआई की अपील को स्वीकार करते हुए सभी आरोपियों से जवाब मांगा और फिर मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को तय की गई थी. फिर इसके बाद यहीं से मामले में नया पेच शुरू हुआ.
15 मार्च- 'मेरा जज बदल दो...', बोले केजरीवाल
हाईकोर्ट की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले सामने आया कि दिल्ली शराब घोटाला मामले में कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है. सीबीआई ने निचले अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी तो वहीं इसी मामले में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में जज बदलने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

अपनी याचिका में केजरीवाल ने कहा है कि इस मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पीठ कर रही है, लेकिन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आग्रह किया है कि इस मामले को किसी अन्य जज की पीठ को ट्रांसफर किया जाए. वहीं, इस मामले में केजरीवाल के साथ सह-आरोपी रहे दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने भी दिल्ली हाई कोर्ट की ओर से जारी समन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है ओर राहत की मांग की थी.
दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जज बदलने' से किया था इनकार
इससे पहले आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल दिल्ली हाई कोर्ट में भी याचिका दाखिल करके केस को किसी अन्य बेंच को ट्रांसफर करने की मांग कर चुके थे, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने इस मांग को खारिज कर दिया था. इसके बाद ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला मौजूदा रोस्टर के अनुसार जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पीठ को आवंटित किया गया है और यदि किसी जज को मामले से अलग होना है तो इसका फैसला संबंधित जज ही लेंगी. अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर इस याचिका को दूसरी बेंच को ट्रांसफर करने का कोई कारण नहीं है.
इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें आशंका है कि इस पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई निष्पक्षता और तटस्थता के साथ नहीं हो पाएगी. अरविंद केजरीवाल के इन तर्कों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी जज बदलने की याचिका खारिज कर दी.
16 मार्च- दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए समय दिया
इसके अगले दिन 16 मार्च को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. इस सुनवाई के लिए 9 मार्च को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की ही पीठ ने तारीख दी थी. दिल्ली हाई कोर्ट में हुई सुनवाई में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को CBI की याचिका पर जवाब देने के लिए समय दिया गया. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर यह निर्देश जारी किया था.
6 अप्रैल- केजरीवाल ने खुद की पैरवी, जज को हटाने की मांग
फिर आई छह अप्रैल की तारीख. इस दिन अरविंद केजरीवाल कोर्ट में पेश हुए और उन्होंने अपने मामले की पैरवी खुद की. उन्होंने अपने मामले की खुद पैरवी करते हुए कहा कि, जो जज उनका केस सुन रही हैं, वह उनका केस न सुनें और इस मामले से हट जाएं. सीबीआई के वकील तुषार मेहता ने इस नाटक और अदालत की तौहीन कहा, वहीं, जस्टिस शर्मा ने ये अपील ले ली और 13 अप्रैल को सुनवाई के लिए तारीख दी.
13 अप्रैल- केजरीवाल ने दिए तर्क, जज ने सुनीं दलीलें
13 अप्रैल इस सुनवाई का सबसे बड़ा दिन था. केजरीवाल इस दिन फिर से पेश हुए और अपनी पैरवी खुद की. उन्होंने अपनी मांग के पक्ष में 10 तर्क दिए. केजरीवाल ने अदालत से कहा था कि इस मामले की सुनवाई कर रहीं जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ख़ुद को इस केस से अलग कर लें. उन्होंने कहा कि उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका है.
केजरीवाल ने अपनी आशंकाएं गिनाईं
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने इसके पीछे की दस वजहें भी गिनाईं थीं. अपने डेढ़ घंटे की दलील में केजरीवाल ने यह आरोप लगाया था कि जस्टिस शर्मा के आदेशों में एक पैटर्न दिखता है, जिसमें ईडी और सीबीआई के हर तर्क को स्वीकार किया जाता है.
तुषार मेहता ने किया विरोध
उधर केजरीवाल के खिलाफ सीबीआई का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी इन दलीलों पर कहा, 'अगर केवल अटकलों, अंदाजों और बेबुनियाद आशंकाओं के आधार पर, जज पर सवाल उठाकर कोई भी पक्ष अपनी पसंद का बेंच चुनने लगे, तो यह ठीक नहीं होगा.' मेहता ने सवाल उठाया, 'अगर जज इस तरह खुद को मामले से अलग करने लगेंगे, तो क्या इस देश में कोई भी जज निष्पक्ष तरीके से फैसला कर पाएगा?'
जज की विचारधारा से आशंका- केजरीवाल
केजरीवाल ने कहा था कि अधिवक्ता परिषद, बीजेपी और आरएसएस वाले विचारों वाली संस्था है. उस संस्था के कार्यक्रम में माननीय न्यायधीश चार बार जा चुकी हैं. 26 दिसंबर 2022, 17 मार्च 2023, 30 अगस्त 2024 और 8 अगस्त 2025. उनकी विचारधारा के हम सख्त खिलाफ हैं. यह राजनीतिक मामला है, मैम.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धारणा भी मायने रखती है. जांच एजेंसी हर संदेह से ऊपर होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की आलोचना करते हुए उसे 'पिंजरे का तोता' कहा था. अगर सीबीआई राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार है, और अगर माननीय न्यायालय किसी विशेष विचारधारा के कार्यक्रमों में जाती हैं, तो मेरे मन में पक्षपात की आशंका पैदा होती है.' इस तरह केजरीवाल ने विचारधारा, सोच, पक्षपात आदि के कई तर्क रखे.
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सभी दलीलों को सुना और आखिरी में कहा- आप बहुत अच्छी पैरवी करते हैं, आपको तो वकील होना चाहिए था. इस पर केजरीवाल ने कहा था- फिलहाज जो मैं कर रहा हूं, उसमें अच्छा कर रहा हूं. उसमें बहुत खुश हूं.
जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चों को लेकर केजरीवाल के आरोप
13 अप्रैल की सुनवाई के बाद सामने आया कि, अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में अतिरिक्त एफिडेविट (हलफनामा) दाखिल किया है. इस हलफनामे में केजरीवाल ने दावा किया था कि जस्टिस स्वर्णकांता के दोनों बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम करते हैं और उन्हें केंद्र सरकार की ओर से उन्हें केस आवंटित किए जाते हैं.
उनका तर्क है कि तुषार मेहता इस मामले में सीबीआई (CBI) की ओर से वकील हैं, इसलिए केजरीवाल ने सवाल उठाया है कि जस्टिस शर्मा उनके खिलाफ आदेश कैसे दे सकेंगी. केजरीवाल का कहना है कि ये हलफनामा 9 अप्रैल 2026 को सामने आई एक कानूनी रिपोर्ट के बाद दायर किया गया है.
उनका आरोप है कि जस्टिस शर्मा के पुत्र और पुत्री केंद्र सरकार के पैनल वकील के रूप में कार्यरत हैं और उन्हें वित्तीय लाभ मिल रहा है. केजरीवाल ने इसे हितों के टकराव का प्रत्यक्ष मामला बताते हुए जज से मामले की सुनवाई से अलग होने की मांग फिर से उठाई थी.
20 अप्रैल- जस्टिस शर्मा ने दिए हर आरोप के जवाब
इस मामले में जब 20 अप्रैल को सुनवाई हुई तब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केजरीवाल के आरोपों पर जवाब दिए. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा था, 'ये कार्यक्रम नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस के आयोजनों से संबंधित थे, या फिर युवा वकीलों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए आयोजित किए गए थे. पूर्व में भी कई न्यायाधीश इन आयोजनों में शामिल होते रहे हैं.
ऐसे कार्यक्रम में मेरे शामिल होने को वैचारिक पक्षपात का संकेत बताने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. देशभर में न्यायाधीशों को न्यायालय के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया जाता है, वहां किसी भी राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं होता. उनकी भूमिका केवल बेंच और बार के बीच संबंध तक सीमित होती है.'
जज के बच्चों को वकालत करने से रोकना मौलिक अधिकारों का हनन- जस्टिश शर्मा
अपने बेटे-बेटी की लीगल प्रैक्टिस के मामले में लगाए गए आरोप पर जस्टिस शर्मा ने जवाब दिया कि, 'इस न्यायालय की राय में, भले ही इस न्यायालय के परिजन सरकारी पैनल में हों, वादी को यह दिखाना होगा कि उसका वर्तमान मामले या इस न्यायालय की निर्णय-प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा है. ऐसा कोई संबंध (नैक्सस) प्रदर्शित नहीं किया गया है. उनके किसी भी बच्चे का बतौर लीगल एक्सपर्ट शराब नीति मामले से कोई संबंध नहीं है.
जस्टिस शर्मा ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायाधीशों के बच्चों को वकालत करने से रोकना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. उन्होंने कहा, 'यदि किसी नेता की पत्नी नेता बन सकती है, यदि किसी नेता के बच्चे नेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी न्यायाधीश के बच्चे कानून के पेशे में नहीं जा सकते? ऐसा कहना न्यायाधीशों के परिवार के मौलिक अधिकारों का हनन होगा.'
नेता क्या कहते हैं, कोर्ट का इस पर कोई कंट्रोल नहीं- जस्टिस शर्मा
गृहमंत्री अमित शाह के एक टीवी इंटरव्यू में दिए गए बयान पर आधारित केजरीवाल की आशंका वाले जवाब में जस्टिस शर्मा ने कहा कि, 'प्रतिकूल परिणाम की आशंका न्यायाधीश को मामले से अलग होने का औचित्य साबित नहीं कर सकती है. किसी राजनेता द्वारा सार्वजनिक रूप से कही जाने वाली बातों पर इस न्यायालय का कोई नियंत्रण नहीं है.' उन्होंने कहा, 'केवल यह कहना कि अदालत से राहत नहीं मिलेगी, न्यायाधीश को मामले से अलग होने का अनुरोध करने का आधार नहीं हो सकता.'

अगर मैं हटी तो इसे दबाव माना जाएगा- जस्टिस शर्मा
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केजरीवाल की याचिका को एक जटिल और दुविधापूर्ण स्थिति बताया. उन्होंने कहा, 'इस मामले में मेरे लिए कैच-22 की स्थिति बन गई है. इस मामले में मुझे ऐसी स्थिति में ला दिया गया है कि मैं खुद को अलग करूं या न करूं (रिक्यूज), दोनों ही स्थितियों में सवाल उठेंगे. यदि मैं हटती हूं तो कहा जाएगा कि दबाव में हट गई, और यदि नहीं हटती तो पक्षपात का आरोप लगाया जाएगा. आवेदक (केजरीवाल) ने अपने लिए विन-विन की स्थिति बना ली है.'
जस्टिस शर्मा ने खुद को मामले से अलग हटने को लेकर किया इन्कार
जस्टिस शर्मा ने कहा, 'यह न्यायालय ऐसा नहीं होने दे सकता. मैंने खुद से पूछा कि अगर मैं अलग नहीं होती तो क्या होगा और अगर अलग हो जाऊं तो क्या होगा. याचिका में पेश की गई बातें केवल कयासों पर आधारित थीं. यदि मैं इन्हें स्वीकार करती, तो यह एक चिंताजनक उदाहरण बन जाता. यह न्यायालय आरोपों और इशारों के बोझ तले दब नहीं सकता. यदि ऐसा करने से संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, तो न्यायालय न तो झुकेगा और न पीछे हटेगा. मेरा इस मामले से हटना जस्टिस नहीं होगा, बल्कि जस्टिस का मैनेज होना कहलाएगा.'
जस्टिस शर्मा ने कहा, 'ऐसे हालात में खुद को इस मामले से अलग करना समझदारी नहीं, बल्कि कर्तव्य से मुंह मोड़ना और समर्पण करने जैसा होगा.' इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने खुद को इस मामले से अलग करने से इनकार कर दिया और अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी थी.'