महाराष्ट्र के पालघर जिले में भीषण जल संकट ने आदिवासी इलाकों में लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है. मुंबई से सटे इस जिले में एक ओर बुलेट ट्रेन, वाढवण पोर्ट और मुंबई-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे बड़े प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी परिवार पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पालघर को 'चौथी मुंबई' बनाने की बात कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि डहाणू तहसील के विवळवेढे गांव स्थित कातकरी पाड़ों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के पास पीने के लिए साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है. भीषण गर्मी के बीच यहां की महिलाओं और बच्चों को रोजाना करीब एक किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है.
गांव के कुएं और बोरवेल पूरी तरह सूख चुके हैं. ऐसे में ग्रामीण अब जंगलों में बने छोटे-छोटे गड्ढों और कीचड़ भरे डबकों के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन गड्ढों का पानी मवेशी पीते हैं, उसी दूषित पानी को ग्रामीण भी पीने को मजबूर हैं. स्थानीय महिलाओं का कहना है कि जब वे मजदूरी से लौटती हैं, तब तक बैल और अन्य जानवर पानी को और गंदा कर चुके होते हैं. मजबूरी में वही मटमैला पानी पीना पड़ता है.
ग्रामीणों के मुताबिक, जल जीवन मिशन के तहत गांवों में पाइपलाइन और नल तो लगाए गए, लेकिन आज तक उनमें पानी नहीं पहुंचा. करोड़ों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद इलाके में पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है. स्थानीय निवासी विलास भोये ने कहा कि सरकार कई योजनाएं चला रही है, लेकिन लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा.
उन्होंने बताया कि पानी लाने के लिए रोज मजदूरी छोड़नी पड़ती है, जिससे परिवार की आय भी प्रभावित होती है. दूषित पानी की वजह से गांव में बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. विवळवेढे क्षेत्र के करीब आठ पाड़ों में हालात लगभग एक जैसे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि योजनाएं सिर्फ कागजों पर पूरी दिखाई गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ लोगों तक नहीं पहुंचा. स्थानीय निवासी केतन सवरा ने बताया कि गांव में लगे नलों में कभी पानी नहीं आता.
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि कम से कम दो-तीन दिन में एक बार ही सही, लेकिन पानी छोड़ा जाए और इलाके में स्थायी पानी की टंकी बनाई जाए. पालघर जिले में जल जीवन मिशन के तहत 500 से ज्यादा जलापूर्ति योजनाएं चलने का दावा किया जा रहा है, लेकिन कई योजनाएं अब भी अधूरी पड़ी हैं. इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों पर पड़ रहा है. एक ओर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर आदिवासी परिवार आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है.
(रिपोर्ट: मोहम्मद हुसैन खान)