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गलत ट्रेन में बैठा 6 साल का बच्चा, 13 साल बाद 2,500 किमी दूर से घर लौटा... मां से मिलते ही छलक पड़े आंसू

झारखंड के चाईबासा का रहने वाला एक बच्चा छह साल की उम्र में अपने पिता से बिछड़कर गलती से केरल जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया था. वहां सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसे बचाकर चाइल्ड होम में रखा, जहां वह बड़ा हुआ और फुटबॉल खेलने लगा. 13 साल बाद एक वीडियो के जरिए उसकी पहचान हुई और आखिरकार वह अपने गांव लौटकर मां और बहनों से मिल पाया.

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13 साल पहले ट्रेन में बिछड़ गया था बेटा. (Photo: Representational)
13 साल पहले ट्रेन में बिछड़ गया था बेटा. (Photo: Representational)

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले का एक छोटा सा गांव है हरिमारा... शांत, हरियाली से घिरा और अपनी परंपराओं में डूबा हुआ. इसी गांव की एक कहानी इन दिनों लोगों को भावुक कर रही है. यह कहानी है उस बच्चे की, जो छह साल की उम्र में घर से बिछड़ गया था और 13 साल बाद अचानक वापस लौट आया. उस बच्चे का नाम है राजा गोप... आज वह 19 साल का हो चुका है, लेकिन उसकी जिंदगी के पिछले 13 साल किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहे.

एजेंसी के अनुसार, करीब 13 साल पहले की बात है. राजा अपने पिता के साथ ईंट-भट्ठे में काम करने के लिए पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल जा रहा था. उस समय वह सिर्फ छह साल का था. भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशन पर अचानक वह अपने पिता से बिछड़ गया.

डरा-सहमा राजा इधर-उधर भटकने लगा. उसे समझ नहीं आया कि क्या करे. उसी दौरान वह गलती से एक ट्रेन में चढ़ गया. लेकिन वह ट्रेन किसी नजदीकी शहर की नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण भारत के राज्य केरल की ओर जा रही थी. ट्रेन चल पड़ी और छोटा राजा अनजाने सफर पर निकल पड़ा.

केरल में नई जिंदगी

कई घंटों की यात्रा के बाद वह ट्रेन केरल के शहर एर्नाकुलम पहुंची. यहां कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर इस डरे हुए बच्चे पर पड़ी. उन्होंने उसे सुरक्षित अपने साथ लिया और एक चाइल्ड होम में रखवा दिया.

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राजा को बस इतना याद था कि उसके माता-पिता का नाम क्या है और वह चाईबासा के पास कहीं का रहने वाला है. लेकिन उसे अपने गांव का नाम याद नहीं था.

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समय बीतता गया. राजा बड़ा होता गया. चाइल्ड होम में पढ़ाई हुई, दोस्त बने और धीरे-धीरे उसने नई भाषा सीख ली- मलयालम.

आज हालत यह है कि वह मलयालम और हिंदी तो धाराप्रवाह बोल लेता है, लेकिन अपनी मातृभाषा हो लगभग भूल चुका है.

फुटबॉल ने बदल दी जिंदगी

केरल में रहते हुए राजा को फुटबॉल से लगाव हो गया. धीरे-धीरे वह इस खेल में अच्छा प्रदर्शन करने लगा और स्थानीय फुटबॉल क्लब से जुड़ गया.

उसकी पहचान एक मेहनती खिलाड़ी के रूप में बनने लगी. जिंदगी जैसे पटरी पर लौट रही थी, लेकिन उसके दिल के किसी कोने में हमेशा एक सवाल था-उसका असली घर कहां है? उसके माता-पिता कैसे होंगे?

एक वीडियो और चमत्कार

इस साल फरवरी में राजा को केरल के कन्नूर में एक स्किल डेवलपमेंट और रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम के तहत भेजा गया.

वहीं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसकी कहानी सुनी और सोचा कि क्यों न उसके परिवार को खोजने की कोशिश की जाए. उन्होंने बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था रेलवे चिल्ड्रन से संपर्क किया.

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इसके बाद राजा का एक वीडियो बनाया गया और उसे सोशल मीडिया व स्थानीय नेटवर्क के जरिए झारखंड के इलाके में शेयर किया गया. और यहीं से कहानी ने एक नया मोड़ लिया.

गांव ने पहचाना अपना बेटा

कुछ ही दिनों में वह वीडियो झारखंड के हरिमारा गांव तक पहुंच गया. गांव के लोगों ने वीडियो देखकर कहा- अरे, यह तो हमारे गांव का राजा है! सूचना तुरंत प्रशासन तक पहुंची. पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने जांच शुरू की और आखिरकार राजा के परिवार का पता चल गया. इस बीच एक दुखद खबर भी सामने आई- राजा के पिता का चार साल पहले निधन हो चुका था.

13 साल बाद घर वापसी

सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद झारखंड की टीम केरल पहुंची और राजा को अपने साथ लेकर वापस आई. जब वह अपने गांव पहुंचा तो वहां का नजारा बेहद भावुक कर देने वाला था.

पूरा गांव अपने खोए हुए बेटे का स्वागत करने के लिए तैयार था. स्कूल के बच्चों ने ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला. महिलाओं ने पारंपरिक आदिवासी नृत्य किया.

और फिर वह पल आया, जिसका इंतजार 13 साल से था. राजा अपनी मां मणि गोपे के सामने खड़ा था.

मां ने जैसे ही अपने बेटे को देखा, वह फूट-फूटकर रो पड़ी. राजा भी खुद को रोक नहीं पाया. दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रोते रहे. वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं. राजा की चार बहनें भी उसे देखकर बेहद खुश थीं.

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मां का दिल और बेटे का सपना

राजा की मां ने कहा कि वह चाहती हैं कि उनका बेटा उनके साथ ही रहे, लेकिन वह उसके सपनों को रोकना नहीं चाहतीं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि कम से कम अब हमें पता है कि हमारा बेटा जिंदा है और अच्छा कर रहा है.

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राजा भी इस मिलन से बेहद खुश है. उसने कहा कि वह पढ़ाई पूरी करेगा, अच्छा काम करेगा और अपनी मां और बहनों की मदद करेगा. उसका सपना है कि एक दिन वह अपने परिवार को केरल ले जाए.

इस पूरे मामले में झारखंड और केरल प्रशासन के साथ कई सामाजिक संगठनों ने भी अहम भूमिका निभाई. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पहचान साबित करने के लिए कई दस्तावेज जुटाने पड़े. आखिरकार सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद राजा अपने घर लौट पाया.

पूरे मामले को लेकर अधिकारियों ने क्या बताया?

सोनुआ पुलिस स्टेशन की ऑफिसर-इन-चार्ज शशि बाला भेंगरा ने कहा कि सारे डॉक्यूमेंट्स पूरे करने में समय लगा और झारखंड से एक टीम उसे वापस लाने के लिए केरल गई थी. उन्होंने कहा कि कन्नूर आफ्टरकेयर सेंटर के सुझाव के अनुसार, हम उसकी पहचान पक्का करने के लिए जरूरी डॉक्यूमेंट्स साथ ले गए थे, जिसमें उसकी मां का एक डिक्लेरेशन भी शामिल था, क्योंकि उसके पिता की चार साल पहले मौत हो गई थी. वेस्ट सिंहभूम के एसपी अमित रेणु ने पहले कहा था कि NGO ने सूचना दी थी, गोप के गांव का पता लगा लिया गया था.

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