गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दबदबा कोई चौंकाने वाली बात नहीं है. आखिरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में भाजपा पिछले तीन दशकों से सत्ता में बनी हुई है. लेकिन विपक्ष- खासतौर पर आम आदमी पार्टी (AAP) का प्रदर्शन सबसे बड़ा सरप्राइज रहा, जबकि इस मुकाबले को त्रिकोणीय माना जा रहा था. राघव चड्ढा, संदीप पाठक और हरभजन सिंह समेत 7 राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने के झटके से जूझ रही आम आदमी पार्टी को गुजरात से भी कोई गुड न्यूज नहीं मिली.
गुजरात में स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे आम आदमी पार्टी के लिए गहरे संकट की ओर इशारा करते हैं. पार्टी एक भी नगर निगम नहीं जीत पाई, बल्कि 2021 में मिली अपनी बढ़त भी गंवा बैठी. चुनाव आयोग के शाम 7 बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक आम आदमी पार्टी (AAP) को कुल 476 सीटें मिलीं और उसका प्रदर्शन उम्मीदों से काफी कमजोर रहा. आम आदमी पार्टी ने काउंटिंग के दौरान खुद को दूसरे नंबर पर बताया था और कांग्रेस को तीसरे नंबर पर. लेकिन अंत में AAP तीसरे स्थान पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस उससे दोगुनी सीटें जीतने में सफल रही.
आंकड़ों में AAP का प्रदर्शन
ये आंकड़े दिखाते हैं कि AAP का प्रदर्शन सीमित क्षेत्रों तक ही रहा और उसका मुख्य विपक्षी दल बनने का दावा कमजोर पड़ गया. गुजरात देश के उन चुनिंदा राज्यों में था, जहां अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीतकर और 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी. फिलहाल आम आदमी पार्टी सिर्फ पंजाब में सत्ता में है, जबकि दिल्ली में पिछले साल उसे विधानसभा चुनाव में बीजेपी से हार झेलनी पड़ी. गोवा में पार्टी के पास सिर्फ दो विधायक हैं.
AAP के लिए क्या संकेत देते हैं नतीजे?
गुजरात में 2027 के विधानसभा चुनाव से एक साल पहले हुए स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि बीजेपी की पकड़ राज्य में अब भी मजबूत है. एंटी-इंकम्बेंसी के बावजूद भाजपा ने सभी 15 नगर निगमों में जीत दर्ज की और हर जगह 50% से ज्यादा वोट हासिल किए. साथ ही 84 नगरपालिकाओं, 34 जिला पंचायतों और 260 तालुका पंचायतों में भी भाजपा बड़ी बढ़त की ओर है. ये नतीजे बताते हैं कि गुजरात अब भी बीजेपी का अभेद्य किला बना हुआ है, कांग्रेस ने अपनी मौजूदगी बरकरार रखी है, जबकि आम आदमी पार्टी को अपनी रणनीति और संगठन दोनों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है.
आम आदमी पार्टी को सबसे बड़ा झटका सूरत नगर निगम में लगा, जहां वह 120 में से सिर्फ 4 सीटें जीत पाई. कांग्रेस को 3 सीटें मिलीं, जबकि BJP ने 92 सीटों के साथ बड़ी जीत हासिल की. 2021 में आम आदमी पार्टी ने सूरत में 27 सीटें जीतकर खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित किया था और कांग्रेस को 0 पर ला दिया था. यह प्रदर्शन AAP के लिए गुजरात में एक टर्निंग पॉइंट था. हालांकि 2026 के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने इस बढ़त को पूरी तरह खत्म कर दिया.
विधानसभा चुनाव के सेमी में AAP चित
गुजरात में 2021 के ग्रामीण चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 2000 से ज्यादा सीटों में से 32 सीटें जीती थीं और करीब 250 सीटों पर कांग्रेस से आगे रही थी. उसे 14% वोट शेयर भी मिला था. 2022 विधानसभा चुनाव में भी AAP ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए 13% वोट और 5 सीटें हासिल की थीं, जिससे कांग्रेस 17 सीटों तक सिमट गई थी. इसी वजह से 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों में AAP से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी.
अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने इसे 2027 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल बताया था और जोरदार प्रचार किया था. लेकिन कुछ प्रतीकात्मक जीतों को छोड़कर आम आदमी पार्टी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई. हालांकि, आदिवासी इलाकों में आम आदमी पार्टी ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. चैतार वसावा और गोपाल इटालिया जैसे नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पार्टी को कुछ सफलता मिली, जिसमें कुछ जिला और तालुका पंचायतों में जीत शामिल है. इनमें बगासरा तालुका पंचायत की जीत भी शामिल है, जहां पार्टी ने पहली बार किसी पंचायत में सत्ता हासिल की.
इन नतीजों से दो अहम बातें सामने आईं. गुजरात में आम आदमी पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हो रही है और वह अपने नेताओं और संगठन को एकजुट रखने में विफल रही है. पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं. 2024 में अल्पेश कथीरिया और धार्मिक मालवीय ने इस्तीफा दिया. उसी साल विधायक भूपेंद्र भायानी भाजपा में शामिल हो गए. 2025 में बोटाद के विधायक उमेश मकवाणा ने भी पार्टी का साथ छोड़ दिया.
AAP के सामने 2027 में बड़ी चुनौतियां
कैडर की कमजोर होती ताकत के चलते आम आदमी पार्टी के लिए 2027 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 2022 जैसा प्रदर्शन दोहराना मुश्किल दिख रहा है. वहीं 2027 में ही पंजाब में भी विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां पार्टी अभी सत्ता में है. हाल ही में सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में शामिल होना आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका है. इन सांसदों में संदीप पाठक और राघव चड्ढा जैसे अहम रणनीतिकार भी शामिल हैं. कुल मिलाकर, गुजरात स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने आम आदमी पार्टी के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. अब देखना होगा कि पार्टी 2027 के गुजरात और पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए खुद को कैसे तैयार करती है.