राजधानी दिल्ली में एक दिल छू लेने वाला और मेडिकल साइंस की बड़ी सफलता से जुड़ा मामला सामने आया है. यहां 18 साल के एक बेटे ने अपने पिता को जीवनदान देते हुए अपनी किडनी दान कर दी. डॉक्टरों ने जटिल ABO-incompatible ट्रांसप्लांट कर मरीज की जान बचाई. यह सर्जरी पटपड़गंज के एक सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में की गई.
जानकारी के मुताबिक, 49 वर्षीय मरीज तेजी से बढ़ती किडनी फेल्योर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. उनकी हालत एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी के कारण लगातार बिगड़ती जा रही थी. मरीज डायलिसिस पर निर्भर हो गए थे और परिवार में कोई भी मैचिंग डोनर उपलब्ध नहीं था.
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डॉक्टरों के अनुसार मरीज की स्थिति इतनी गंभीर थी कि किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था. लेकिन ब्लड ग्रुप मैच न होने के कारण सामान्य ट्रांसप्लांट संभव नहीं था. ऐसे में चुनौती और भी बड़ी हो गई थी.
पिता की जिंदगी और बेटे का फैसला
इसी बीच 18 वर्षीय बेटे ने अपने पिता को बचाने का फैसला लिया. वह हाल ही में 12वीं कक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल कर चुका था और आगे बीएससी की पढ़ाई की तैयारी कर रहा था. लेकिन उसने अपनी पढ़ाई और भविष्य से पहले पिता की जान को प्राथमिकता दी.
मेडिकल जांच में सामने आया कि बेटे का ब्लड ग्रुप B पॉजिटिव और पिता का O पॉजिटिव था. दोनों के ब्लड ग्रुप असंगत होने के कारण सामान्य किडनी ट्रांसप्लांट संभव नहीं था. इसके बावजूद परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी.
डॉक्टरों ने ABO-incompatible किडनी ट्रांसप्लांट का निर्णय लिया और इसके लिए विशेष डीसेंसिटाइजेशन प्रोटोकॉल अपनाए गए. इसमें प्लाज्माफेरेसिस और इंटेंसिव इम्यूनोलॉजिकल तैयारी शामिल रही.
जटिल सर्जरी और मेडिकल सफलता
डॉक्टरों ने बताया कि यह ट्रांसप्लांट अत्याधुनिक तकनीक और मल्टीडिसिप्लिनरी टीमवर्क के जरिए संभव हुआ. सर्जरी के दौरान और बाद में मरीज की विशेष निगरानी की गई ताकि किसी भी तरह की जटिलता से बचा जा सके.
सीनियर डॉक्टरों ने कहा कि यह केस मेडिकल साइंस की बड़ी उपलब्धि है. उनके अनुसार ABO-incompatible ट्रांसप्लांट उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके लिए डोनर मिलना मुश्किल होता है.
सफल ऑपरेशन के बाद नई जिंदगी
सर्जरी के तुरंत बाद ही ट्रांसप्लांट की गई किडनी ने काम करना शुरू कर दिया. मरीज की किडनी फंक्शन में तेजी से सुधार देखा गया और रिकवरी बेहतर रही. मरीज को एक सप्ताह के भीतर डिस्चार्ज कर दिया गया.
वहीं, 18 वर्षीय डोनर भी पूरी तरह स्वस्थ रहा और उसे चार दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. डॉक्टरों के अनुसार यह सफलता आधुनिक ट्रांसप्लांट तकनीक और मानवीय साहस का बेहतरीन उदाहरण है.