दिल्ली में दिवाली की रात जमकर आतिशबाजी हुई. पटाखे जलाने के लिए रात 8 बजे से 10 बजे तक का समय तय किया गया था, लेकिन कई इलाकों में आधी रात तक पटाखे फूटते रहे. इसका असर पहले से प्रदूषण की मार झेल रही राजधानी की हवा पर पड़ने की चिंता बढ़ गई है. दिवाली के दिन दिल्ली का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 382 दर्ज किया गया. यह बहुत खराब श्रेणी में आता है. ऐसे में रातभर हुई आतिशबाजी ने हवा को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
रात 12 बजे दिल्ली के कई इलाकों में पटाखों के धुएं की वजह से विजिबिलिटी बेहद कम हो गई. बाहरी दिल्ली ही नहीं, वसंत कुंज इलाके में भी इसका असर देखने को मिला. यहां स्ट्रीट लाइट की रोशनी में हवा में फैला धुआं साफ नजर आया. सड़कों पर फैले इस धुएं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पटाखों के बाद राजधानी की हवा की स्थिति कितनी खराब हो गई थी.
दरअसल, दिल्ली में पटाखे जलाने के लिए रात 8 बजे से 10 बजे तक का समय तय किया गया था. लोगों को आतिशबाजी के लिए सिर्फ दो घंटे की अनुमति थी. इसके बावजूद कई जगह देर रात तक पटाखे फूटते रहे. यह तब हुआ, जब दिल्ली की हवा पहले से ही बहुत खराब स्थिति में थी.
350 टीमें बनाने के बाद भी नहीं रुकी आतिशबाजी
दिल्ली सरकार की ओर से प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए करीब 350 टीमों के गठन की बात कही गई थी. इसके बावजूद दिवाली की रात तय समय के बाद भी पटाखे जलाए जाते रहे. ऐसे में इन टीमों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. क्या रात 10 बजे के बाद पटाखे जलाने वालों को रोकने के लिए कोई कार्रवाई की गई? अगर नियमों का पालन कराने के लिए टीमें बनाई गई थीं, तो आधी रात तक आतिशबाजी कैसे चलती रही?
पटाखों के धुएं का असर किन लोगों पर पड़ेगा?
दिवाली की रात हुई आतिशबाजी का असर उन लोगों को भी झेलना पड़ रहा है, जिन्होंने पटाखे नहीं जलाए. स्थानीय लोगों का कहना है कि दिल्ली में पहले से प्रदूषण काफी ज्यादा है. आतिशबाजी के बाद सांस लेने में भी परेशानी महसूस हो रही है. ऐसी हवा बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए ज्यादा परेशानी पैदा कर सकती है.
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, AQI 301 से 400 के बीच होने पर हवा बहुत खराब श्रेणी में मानी जाती है. वहीं, 401 से 500 के बीच पहुंचने पर यह गंभीर श्रेणी में आ जाती है. दिल्ली का औसत AQI 382 इसी बहुत खराब श्रेणी में है. ऐसी हवा में सांस लेने में परेशानी हो सकती है, खासकर उन लोगों को जिन्हें पहले से सांस संबंधी दिक्कत है.
पटाखों के अलावा ये वजहें भी बिगाड़ती हैं दिल्ली की हवा
राजधानी में प्रदूषण बढ़ने के पीछे सिर्फ पटाखे जिम्मेदार नहीं हैं. गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना भी हवा को खराब करते हैं. मौसम की स्थिति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है. जब हवा की रफ्तार कम होती है, तो प्रदूषण के कण आसानी से फैल नहीं पाते और वातावरण में जमा रहने लगते हैं.
दिवाली के दिन दिल्ली के प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी करीब 19 फीसदी बताई गई थी. वहीं, पराली जलाने का योगदान 3.5 फीसदी रहा. इसके अलावा वेंटिलेशन इंडेक्स 6,000 वर्ग मीटर प्रति सेकंड से नीचे था और हवा की औसत रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति घंटे से कम थी. इन हालात में प्रदूषण का असर लंबे समय तक बना रह सकता है
दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत के साथ प्रदूषण हर साल बड़ी चुनौती बन जाता है. इस बार भी पटाखे जलाने का समय तय किया गया था, करीब 350 टीमों के गठन की बात कही गई थी. इसके बावजूद आधी रात तक आतिशबाजी होती रही. त्योहार की खुशियां मनाना जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत उन लोगों को भी चुकानी पड़ती है जिन्होंने पटाखे नहीं जलाए. अब सवाल है कि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है और जब तय समय के बाद भी आतिशबाजी जारी रही, तो इसे रोकने के लिए क्या किया गया?