अक्सर नए पेरेंट्स के मन में यह सवाल रहता है कि छोटे बच्चों को किस उम्र में क्या खिलाना शुरू करना चाहिए. खासकर अंडे जैसी चीजों को लेकर लोग काफी डरते हैं कि कहीं बच्चे को कोई एलर्जी न हो जाए. लेकिन हाल ही में आई एक नई ग्लोबल रिसर्च ने इस डर को पूरी तरह दूर कर दिया है. 'JAMA Pediatrics' में पब्लिश एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर शिशुओं को 6 से 8 महीने की उम्र के बीच अंडा दिया जाए तो आगे चलकर उन्हें अंडे से होने वाली एलर्जी का जोखिम कम हो जाता है. पहले माना जाता था कि बच्चों को अंडा और अन्य एलर्जी पैदा करने वाले फूड देर से देने चाहिए, खासकर अगर परिवार में किसी को एलर्जी रहा हो. लेकिन अब नई रिसर्च बताती है कि शुरुआती उम्र में धीरे-धीरे इन चीजों को शामिल करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है.
स्टडी में क्या निकला?
ऑस्ट्रेलिया में हुई इस स्टडी में पाया गया कि जब बच्चों को 6 से 8 महीने की उम्र में अंडा देना शुरू किया गया तो अंडे से होने वाली एलर्जी के मामलों में कमी आई. यह असर खासकर उन बच्चों में ज्यादा दिखा जिन्हें स्किन की समस्या (एक्जिमा) होती है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआती उम्र में एलर्जी पैदा करने वाले फूड देने से इम्यून सिस्टम उन्हें पहचानना और स्वीकार करना सीखता है, जिससे एलर्जी की संभावना कम हो जाती है.
स्टडी के अनुसार, जब अंडा देर से देने की बजाय 6 महीने के आसपास देना शुरू किया गया तो अंडे की एलर्जी के मामलों में 17% से अधिक कमी देखी गई. जबकि नॉर्मल बच्चों में यह कमी हल्की रही.
6 से 8 महीने को सही समय माना गया
स्टडी में कहा गया है कि अंडा देने का सबसे सही समय 6 से 8 महीने की उम्र के बीच है. यह पुरानी सलाह से अलग है, जिसमें बच्चों को 10 महीने, 1 साल या उससे भी बाद अंडा देने की बात कही जाती थी.
डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआत में अंडा पूरी तरह पकाकर ही देना चाहिए, क्योंकि कच्चा या अधपका अंडा इंफेक्शन और एलर्जी का खतरा बढ़ा सकता है. ऐसे में पेरेंट्स को सलाह दी जाती है कि शुरुआत बहुत कम मात्रा से करें, जैसे आधा अंडे की जर्दी (यॉल्क) को मैश करके दूध या पानी के साथ मिलाकर देना. अगर बच्चा ठीक से सहन करता है तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है. वहीं, अगर परिवार में पहले से किसी को एलर्जी रहा हो तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए.
कुल मिलाकर, यह रिसर्च बताती है कि सही समय पर और सही तरीके से अंडा देना बच्चों की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है और आगे चलकर एलर्जी का खतरा कम किया जा सकता है.