इतिहास में कई बार देखा गया है कि जब कोई देश या क्षेत्र अस्थिर हो, तो आतंकी संगठन इसका फायदा उठाकर ज्यादा ताकतवर और खतरनाक बन जाते हैं. अब भी वही हालात हैं. कई देशों के बीच जंग चल रही है. महाशक्ति अमेरिका भी शांति-शांति करते हुए अशांति ला रहा है. यह आतंकी संगठनों के लिए आदर्श वक्त है.
इस समय कई युद्ध और कन्फ्लिक्ट चल रहे हैं. रूस और यूक्रेन चार साल से जंग में मुब्तिला है. गाजा पट्टी तबाह हो चुकी. ईरान और अमेरिका रुक-रुक भिड़ते हैं. अफ्रीका में कई देश सिविल वॉर जैसी स्थिति में हैं. मिलेजुले आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल दुनिया भर में 50 से ज्यादा लड़ाइयां जारी हैं. यही वो वक्त है, जो आतंकी संगठनों के लिए मुफीद है. पुराने-अधमरे संगठन दोबारा आतंक मचा सकते हैं.
काबुल है बड़ा उदाहरण
नब्बे के दशक की शुरुआत में जब रूस की सेना अफगानिस्तान से निकली, तो देश में कोई मजबूत सरकार नहीं बची. अलग-अलग मुजाहिदीन गुट आपस में लड़ने लगे. राजधानी काबुल तक सुरक्षित नहीं थी. आम लोगों की सुरक्षा, सीमाओं की निगरानी और विदेशी गतिविधियों पर नजर रखने वाला कोई मजबूत तंत्र मौजूद नहीं था.
इसी सत्ता के खालीपन और अराजकता के माहौल में तालिबान उभरा. उसने धीरे-धीरे देश के बड़े हिस्से पर कब्जा किया. तालिबान का शासन अंतरराष्ट्रीय नियमों से कटा हुआ था और उसने विदेशी आतंकी संगठनों को शरण देना शुरू किया. इसी दौरान अल कायदा को अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकाने मिले.

अफगानिस्तान की पहाड़ी और भौगोलिक स्थिति ने अल कायदा के लिए काम और आसान कर दिया. वहां उसने खुले तौर पर ट्रेनिंग कैंप बनाए, लड़ाकों को तैयार किया, विदेशों से फंड इकट्ठा किया और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपना नेटवर्क खड़ा करने लगा. कमजोर होस्ट देश और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की कमी की वजह से उस पर कोई भारी रोक नहीं लग पाई.
अगर उस समय अफगानिस्तान में मजबूत सरकार, स्थिर प्रशासन और सख्त सुरक्षा व्यवस्था होती, तो किसी आतंकी संगठन का इतने बड़े पैमाने पर पनपना मुश्किल होता. लेकिन अस्थिरता ने अल कायदा को समय, जगह और आजादी दी. इसी माहौल में उसने 9/11 जैसे बड़े हमलों की योजना बनाई, जिसने सबको दहलाकर रख दिया. आतंकी अटैक के बाद इनपर काबू तो पाया गया, लेकिन बड़ा नुकसान हो चुका था.
अफ्रीका में ऐसे फला-फूला बोको हराम
नाइजीरिया का उत्तर-पूर्वी इलाका लंबे समय से गरीबी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा था. स्कूल कम थे, नौकरी के मौके नहीं थे और सरकारी सेवाएं लोगों तक नहीं पहुंचती थीं. पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी कमजोर थी, जिससे आम लोग खुद को असुरक्षित महसूस करते थे.
ऐसे माहौल में लोगों के भीतर गुस्सा और हताशा बढ़ती गई. खासकर युवा खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे. बोको हराम ने इसी नाराजगी को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. उसने सरकार को दुश्मन बताया और यह प्रचार किया कि मौजूदा व्यवस्था लोगों के लिए कुछ नहीं कर रही.
बोको हराम ने गांवों और स्कूलों पर हमले शुरू किए ताकि डर का माहौल बनाया जा सके. स्कूलों को निशाना बनाकर उसने शिक्षा को ही खतरे के रूप में पेश किया. कई जगह बच्चों और युवाओं को जबरन या लालच देकर संगठन में शामिल किया गया. कमजोर प्रशासन की वजह से सरकार इन इलाकों में समय पर सख्त कार्रवाई नहीं कर पाई.
धीरे धीरे बोको हराम ने अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाया और नाइजीरिया की सीमाओं से बाहर निकल गया. इसका असर चाड, नाइजर और कैमरून जैसे पड़ोसी देशों तक फैल गया. इससे पूरा इलाका लंबे समय तक अस्थिर रहा.

अब क्या हो रहा है
अस्थिरता के बीच कुछ पुराने आतंकी संगठनों के फिर सक्रिय होने के संकेत दिख रहे हैं.
इनमें ISIS (इस्लामिक स्टेट) का नाम बार-बार आ रहा है. यह वही समूह है जिसने साल 2010 के दशक में इराक और सीरिया में अपना जाल फैलाया था. युवाओं का ब्रेनवॉश होने लगा और दुनिया के कई देशों से पढ़े-लिखे लोग मकसद के नाम पर आतंक का हिस्सा बनने लगे. साल 2016 से अगले सालभर में अमेरिका और मित्र देशों ने इराक और सीरिया से इसे लगभग खत्म कर दिया. हालांकि यह चरमपंथी विचारधारा थी, जो बचे-खुचे लोगों के साथ दूसरे देशों तक फैल गई.
अब इराकी इंटेलिजेंस खुद बोल रहा है कि उनके यहां और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के लड़ाके लगातार बढ़ रहे हैं. वॉशिंगटन पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में ऐसे ही एक सूत्र ने कहा कि आतंकियों की संख्या पिछले एक साल में दो हजार से बढ़कर दस हजार तक पहुंच गई. खुफिया सूत्रों ने चेतावनी दी है कि सिविल वॉर और पावर वैक्यूम के चलते आतंकी अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं और बड़ा खतरा ला सकते हैं.
मिडिल ईस्ट ही नहीं, इस्लामिक स्टेट की अफ़गानिस्तान शाखा ISIS–खोरासान भी पैर जमा रही है. इसने साल की शुरुआत में ही काबुल में एक आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली. इससे साफ होता है कि यह पुराना संगठन बिखरने के बजाय नई हिंसक रणनीतियां आजमा रहा है.
इसके अलावा पाकिस्तान बेस्ड समूह टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) भी सक्रियता बढ़ा रहा है और उसने अपनी ताकत बढ़ाने के लिये कथित तौर पर एयर फोर्स विंग जैसी योजनाओं का ऐलान किया है, जिससे तनाव और बढ़ने की आशंका है. असल में टीटीपी ड्रोन के जरिए जासूसी और सीमित हमलों की क्षमता विकसित करना चाहता है. यह एक तरह से आतंकवाद में तकनीक का नया इस्तेमाल है.