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क्या क्लाइमेट चेंज पर हुआ समझौता वक्त की बर्बादी है, क्यों पेरिस पैक्ट से अमेरिका हुआ बाहर?

पर्यावरण को बचाने के लिए बने पेरिस एग्रीमेंट को 10 साल पूरे हो चुके. हाल में अमेरिका इस संधि से बाहर आ चुका, वहीं कई और देश समझौते की नीयत पर ही सवाल उठा रहे हैं. यहां तक कि क्लाइमेट चेंज को ही एक संदिग्ध चीज बताया जा रहा है, जिसके नाम पर पैसे पानी की तरह बहाए जा चुके.

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अमेरिका दुनिया का पहला देश है, जो पेरिस क्लाइमेट समझौते से बाहर हो चुका. (Photo- AP)
अमेरिका दुनिया का पहला देश है, जो पेरिस क्लाइमेट समझौते से बाहर हो चुका. (Photo- AP)

लगातार कहा जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग इस कदर बढ़ चुकी कि जल्द ही ध्रुवों से बर्फ पिघलने लगेगी और समंदर का स्तर इतना बढ़ जाएगा कि कयामत आ जाएगी. डूम्स डे को लेकर भविष्यवाणियों में क्लाइमेट चेंज सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है. जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए कई संधियां बनीं, लेकिन अब इन संधियों पर ही सवाल उठ रहे हैं, खासकर पेरिस पैक्ट पर. 

क्या है पेरिस पैक्ट और क्यों बना

पेरिस समझौता एक वैश्विक जलवायु समझौता है, जिसे साल 2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में बनाया गया. इसका मकसद ग्लोबल वॉर्मिंग को खतरनाक स्तर तक पहुंचने से रोकना था. समझौते के तहत देशों ने वादा किया कि वे धरती के औसत तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने की कोशिश करेंगे और बेहतर स्थिति में इसे 1.5 डिग्री तक सीमित रखेंगे. इसके लिए कार्बन उत्सर्जन कम करना, साफ ऊर्जा को बढ़ावा देना और विकासशील देशों की मदद करना शामिल है. 

समझौता होने के बाद से 190 से ज्यादा देश यानी लगभग तमाम दुनिया इसका हिस्सा बन गई. अमेरिका और रूस भी इनमें शामिल थे. हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही समझौते से बाहर होने का फैसला लिया. इस साल की शुरुआत से यूएस इस पैक्ट का सदस्य नहीं. फिलहाल कोई और देश पूरी तरह से समझौते से बाहर नहीं हुआ, लेकिन कई और नेता पैक्ट को गैरजरूरी बताते हुए इससे निकलने की बात कर रहे हैं, जैसे अर्जेंटिना.

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क्या है जलवायु परिवर्तन और कितना रियल

क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन, धरती के मौसम और तापमान में लंबे समय तक होने वाले बदलाव को कहते हैं. यह कुदरती वजहों से भी हो सकता है, लेकिन फिलहाल इसका सबसे बड़ा कारण इंसानी गतिविधियां हैं, जैसे गाड़ियों और इंडस्ट्रीज से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी ग्रीनहाउस गैसें. इसके असर से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, तूफान और बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं, और खेती पर भी असर पड़ रहा है. इसका एक्सट्रीम असर दुनिया में तबाही ला सकता है. 

global warming (Photo- Pixabay)
साल 1980 से लेकर अब तक औसत ग्लोबल तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका. (Photo- Pixabay)

फिर क्यों अमेरिका जैसा ताकतवर देश इससे अलग हो गया

पेरिस समझौते में तय हुआ था कि हर देश ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करेगा. इसके लिए कोयले से चलने वाले कारखाने बंद करने होंगे. अमेरिका का कहना है कि वो तो अपने कारखाने बंद करवा रहा है लेकिन चीन या बाकी देशों में सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है. वे सस्ती दरों पर काम कर रहे हैं और ज्यादा प्रोडक्शन कर पा रहे हैं. अमेरिका नाराज था कि वो तो समझौते का पालन कर रहा है लेकिन बाकी लोग  अपनी जिम्मेदारी ढंग से नहीं निभा रहे. यही दलील देते हुए वो पीछे हट गया. 

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ट्रंप समेत कई लीडर्स का ये भी कहना है कि क्लाइमेट चेंज असल में कुछ है ही नहीं, बल्कि एक झूठ है, जिसे कुछ लोगों ने शह दी. इसे हॉक्स बताने के पीछे कई वजहें रहीं. 

- सबसे पहला कारण आर्थिक और राजनीतिक हित है. दुनिया भर में बहुत सारी इंडस्ट्रीज, जैसे कोयला, तेल, गैस और बड़े उद्योगों पर इसका सीधा असर होता है. अगर क्लाइमेट चेंज को गंभीर माना गया और सख्त नियम लागू हुए, तो इन उद्योगों की कमाई पर असर पड़ सकता है. इसलिए कभी-कभी ऐसी लॉबी इसे झूठ के तौर पर पेश करती है.

- क्लाइमेट चेंज को समझने के लिए मौसम, कार्बन इमिशन और सैटेलाइट इमेज जैसे कई आंकड़ों की जरूरत होती है. यह जानकारी आम लोगों को मुश्किल और कभी-कभी उलझन वाली लगती है. कुछ लोग इसे इसलिए इसे समझ नहीं पाते. 

- कई बार इसे लेकर भ्रम भी रचा जाता है. सोशल मीडिया के जरिए ऐसे पोस्ट फैल जाते हैं, जहां मौसम में फोर्स्ड बदलाव को झूठ बताया जाए. कई बार ये पोस्ट किसी खास एजेंडा पर काम करते हैं, लेकिन लोग इनपर भरोसा कर लेते हैं. 

- राजनीतिक रूप से अलग-अलग हित सोचना भी बड़ी वजह है. कुछ देशों में राजनीतिक पार्टियां और मीडिया क्लाइमेट चेंज को अपने एजेंडा के हिसाब से पेश करते हैं. इससे आम लोगों में यह सोच फैलती है कि क्लाइमेट चेंज असली नहीं. 

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climate change (Photo- Pixabay)
इंसानी काम ग्लोबल क्लाइमेट चेंज को तेजी से उकसा रहे हैं. (Photo- Pixabay)

क्या क्लाइमेट चेंज कुदरती भी हो सकता है 

हां, कुछ हद तक यह कुदरती हो सकता है लेकिन आज जो बड़े बदलाव दिख रहे हैं, वो एकाएक हुए हैं, न कि क्रमिक बदलाव से आए हैं. सूरज की रोशनी और सोलर साइकिल में बदलाव, वॉल्केनिक इरप्शन और धरती का घूमना लंबे समय में असर डालता है. वहीं गाड़ियों और कारखानों से निकलने वाला धुआं, जंगलों की कटाई और पशुपालन से निकलने वाली मीथेन गैस तेजी से असर डाल रही है. इससे बीती एक सदी में तापमान बेहद तेजी से बढ़ चुका. 

फिर पेरिस समझौता क्यों कमजोर पड़ रहा

- कई देशों ने जो कार्बन कम करने का वादा किया था, वो पूरा नहीं कर पाए. 

- समझौता सिर्फ बातचीत पर टिका है, कोई रियल कार्रवाई नहीं. ऐसे में गोल पोस्ट आगे सरकते जा रहे हैं. 

- कुछ देशों की सरकारें इसे सिर्फ राजनीतिक मुद्दा मानती हैं और काम को टाल देती हैं.

- विकासशील देशों के पास संसाधनों की कमी है, इसलिए वो ज्यादा काम नहीं कर पा रहे.

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