टीवी और फिल्म इंडस्ट्री की मशहूर प्रोड्यूसर एकता कपूर ने अपनी जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा किस्सा शेयर किया है, जिसने सबका ध्यान खींच लिया है. एकता ने बताया कि जब वह छोटी थीं और माथे पर तिलक लगाती थीं या गले में धागा पहनती थीं, तो लोग उन्हें अजीब नजरों से देखते थे. कुछ लोग तो उन्हें ‘तांत्रिक’ तक कह देते थे.
अब एकता ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की है और इंडस्ट्री में हिंदू धर्म और पौराणिक कहानियों को लेकर होने वाले भेदभाव पर सवाल उठाए हैं.
‘तिलक लगाना और धागा पहनना अजीब कैसे?’
रणवीर अलाहबादिया से बातचीत के दौरान एकता कपूर ने कहा कि वह पहले से ही अपने धर्म और आस्था को खुलकर जाहिर करती रही हैं. लेकिन ऐसा करना हमेशा आसान नहीं था. उन्होंने याद किया कि जब वह कम उम्र में तिलक लगाकर निकलती थीं, तो कुछ लोग उन्हें देखकर सवाल करते थे कि वह इस तरह अजीब क्यों दिख रही हैं.
एकता ने बताया कि उन्हें तिलक और धागा पहनने के लिए भी ताने सुनने पड़े. लोगों का इस तरह जज करना उन्हें हैरान करता था. उनका सवाल था कि आखिर अपने धर्म से जुड़े प्रतीक पहनना किसी को अजीब क्यों लगना चाहिए?
एकता की बातों से साफ था कि उन्हें अपनी आस्था को लेकर कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई, लेकिन दूसरों की सोच और प्रतिक्रियाओं ने उन्हें कई बार हैरान जरूर किया.
‘लोग कहते थे तुम तांत्रिक हो’
एकता ने बातचीत में यह भी बताया कि कुछ लोग उनके तिलक लगाने और धागा पहनने को लेकर उन्हें ‘तांत्रिक’ कहने लगे थे. उनके मुताबिक, उस दौर में धर्म से जुड़े प्रतीकों को खुले तौर पर अपनाने पर भी लोगों की निगाहें और सवाल झेलने पड़ते थे.
एकता ने इस अनुभव को हिंदूफोबिया से जुड़ी अपनी चिंता के संदर्भ में रखा. उनका कहना था कि भारतीय लोककथाओं, संस्कृति और पौराणिक कहानियों को भी उसी सहजता से स्वीकार किया जाना चाहिए, जिस तरह दुनिया की दूसरी फैंटेसी और एनिमेशन कहानियों को किया जाता है.
‘विदेशी फैंटेसी से दिक्कत नहीं, फिर अपनी पौराणिक कहानियों से क्यों?’
एकता कपूर ने भारतीय लोककथाओं और पौराणिक कथाओं पर भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि फिल्मों में एनिमेशन और फैंटेसी को लेकर लोग सहज रहते हैं, लेकिन जब बात भारतीय लोककथाओं और मिथकों की आती है, तो कुछ लोगों की सोच बदल जाती है.
एकता के मुताबिक, भारतीय संस्कृति और पौराणिक कहानियों को भी खुलकर सामने लाने और स्वीकार करने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि अब पहले के मुकाबले इन विषयों को लेकर स्वीकार्यता बढ़ रही है.
उनकी यह बात ऐसे समय में आई है, जब भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्मों और कहानियों को लेकर लगातार चर्चा होती रहती है. एकता का मानना है कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी कहानियों को सामने लाने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए.
मंदिर से सीधे क्लब पहुंचीं एकता, लोगों के रिएक्शन ने किया हैरान
बातचीत में एकता कपूर ने एक और दिलचस्प किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि एक बार वह मंदिर से सीधे क्लब पहुंची थीं. वहां किसी ने उनसे हैरानी से पूछा कि क्या वह मंदिर होकर आई हैं?
एकता ने जवाब दिया कि हां, वह मंदिर गई थीं और इसमें हैरानी की क्या बात है. इस किस्से के जरिए उन्होंने बताया कि किसी का धार्मिक होना और साथ ही अपनी पसंद के मुताबिक दूसरी जगहों पर जाना, दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं.
रणवीर ने भी उनकी बात पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह अपने समय से आगे की सोच रखती थीं. इस पर एकता ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह शायद अपने दौर की ‘Gen Z’ थीं.
आस्था जाहिर करने में कैसी झिझक?
एकता कपूर की इस बातचीत ने धर्म, पहचान और समाज की सोच को लेकर एक नई चर्चा छेड़ दी है. उनका कहना है कि माथे पर तिलक लगाना, धागा पहनना या अपनी धार्मिक आस्था को जाहिर करना किसी के लिए मजाक का विषय नहीं होना चाहिए.
एकता की कहानी उनके निजी अनुभवों पर आधारित है, लेकिन इसके जरिए उन्होंने एक बड़ा सवाल उठाया है- क्या किसी व्यक्ति को अपनी आस्था और सांस्कृतिक पहचान खुलकर अपनाने के लिए दूसरों के ताने सुनने पड़ने चाहिए?