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‘दबंग’ से लौटा फिल्मों में ‘हिन्दी भाषी क्षेत्र’ का दौर

देश में उत्तरी भारत की ठेठ बोली, हाव भाव, अदा और जुनून को दर्शाने वाली आखिरी फिल्म 1961 की ‘गंगा जमुना’ थी. इसके बाद उत्तरी भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्र की ज़मीन में जुडा सिनेमा ‘त्रिवेणी’ संगम में सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो गया. लेकिन वर्ष 2010 में रिलीज हुई ‘दबंग’ से हिन्दी क्षेत्र का सिनेमा फिर से मुख्यधारा में लौट आया.

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देश में उत्तरी भारत की ठेठ बोली, हाव भाव, अदा और जुनून को दर्शाने वाली आखिरी फिल्म 1961 की ‘गंगा जमुना’ थी. इसके बाद उत्तरी भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्र की ज़मीन में जुडा सिनेमा ‘त्रिवेणी’ संगम में सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो गया. लेकिन वर्ष 2010 में रिलीज हुई .

फिल्म समीक्षक, पटकथा लेखक और इतिहासकार अमरेश मिश्र के मुताबिक लखनऊ निवासी लेखक वजाहत मिर्जा की ‘गंगा जमुना’ फिल्म के बाद ने फिर से हिन्दी सिनेमा में हिन्दी क्षेत्र को अहमियत दी और इसकी भारी सफलता के पीछे भी यह एक अहम कारण है. हिन्दी क्षेत्र की अदा, हाव भाव, मुहावरे, जुनून से लबरेज इस फिल्म को महानगरीय दर्शक वर्ग का भी जोरदार समर्थन मिला.’

मिश्र ने कहा, ‘आजादी के बाद भी हिन्दी क्षेत्र से पट्टेदारी व्यवस्था समाप्त नहीं हो पाई और इस क्षेत्र में भाई चारा और जुड़ाव का पहलू कायम रहा. यही वह जमीन थी जिसने 1857 के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन, महात्मा गांधी और बाद में जयप्रकाश नारायण के जनांदोलन को फलने फूलने की उर्वर जमीन तैयार की थी जिसके कारण इन आंदोलनों में व्यापक जन भागीदारी रही और उसे एक मुकाम हासिल हुआ.’

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मिश्र ने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में जिस तरह समाज में उपभोक्तावाद को संरक्षण मिला वहीं लोगों में पहचान का संकट बढ़ता गया. अलग अलग प्रदेशों की अलग अलग अदा, रहने, चलने और बोलने के तरीकों पर खतरा मंडराने लगा और निगमित क्षेत्र की ओर से आम लोगों से एक खास एकनिष्ठा, एकरूपता वाले व्यवहार की अपेक्षा की जाने लगी. उन्होंने कहा कि इस सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि में वर्ष 1961 के बाद फिल्म के पटकथा लेखकों में वजाहत मिर्जा, कमाल अमरोही, शम्स लखनवी, ख्वाजा अहमद अब्बास, सलीम और जावेद जैसे विशेष राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली शख्सियतों का जलवा रहा. इनकी कहानियों में आम आदमी के संघर्ष, उसकी उलझनों और जीत को दर्शाया जाता था लेकिन इसमें सीधे तौर पर हिन्दी क्षेत्र विशेष का नाम नहीं होता था.

मिश्र ने कहा, ‘इनकी फिल्मों में सीधे सीधे हिन्दी क्षेत्र विशेष को नहीं दर्शाया गया बल्कि इनमें इस क्षेत्र विशेष की रवानगी का तड़का भर होता था.’ उन्होंने कहा कि वर्ष 1991 में देश में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर की फिल्मों में हिन्दी क्षेत्र नदारद होता चला गया और ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे’, ‘कल हो न हो’ सरीखी फिल्में बननी शुरु हुई. उन्होंने कहा कि इन फिल्मों की कहानियों में कोई अनिवासी भारतीय का भारत के गांव की लड़की से प्रेम होता था और पूरी कहानी का ताना बाना उसके इर्द गिर्द बुना जाता था. ‘एक तरह से इस दौर की फिल्मों को पंजाबी हिन्दी सिनेमा कहा जा सकता है.’

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मिश्र ने कहा, ‘वैश्वीकरण के दौर में प्रवासी भारतीय दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर फिल्में बनने लगीं जिसके पीछे सोच यह थी कि वहां से आय का अच्छा स्रोत प्राप्त होगा. लेकिन फिल्म दबंग ने निर्माताओं को यह अहसास कराया कि स्थानीय दर्शक वर्ग को उनकी पसंद की फिल्में दी जायें तो यह कहीं ज्यादा बड़ी आय का साधन बन सकती है.’ उन्होंने कहा, ‘‘ के बाद ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘पान सिंह तोमर’ सहित तमाम हिन्दी फिल्मों में हिन्दी क्षेत्र के द्वन्द्व, राजनीति, भाषा आदि का पुरजोर इस्तेमाल किया गया है. अभी निर्माणाधीन फिल्म ‘बुलेट राजा’ में भी उत्तर प्रदेश के चरित्र को नायक बनाया गया है जो उभरते व्यापारी वर्ग और नौकरशाहों और राजनेताओं के गठजोड़ से टक्कर लेता है.

उल्लेखनीय है कि फिल्म गंगा जमुना के लेखक वजाहत मिर्जा लखनऊ के रहने वाले थे जबकि दबंग फिल्म की मूल अवधारणा विकसित करने वाले लेखक प्रदीप शुक्ला भी लखनऊ के ही हैं जिन्हें दबंग-2 में लेखक का ‘क्रेडिट’ भी दिया गया है. यह हिन्दी सिनेमा की पुनर्विकसित होती तस्वीर हमारे सामने पेश करता है.

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