28 फरवरी को इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर एयरस्ट्राइक कर दी थी. इस हमले को 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' नाम दिया गया. इसके बाद जो हुआ उसका असर पूरी दुनिया पर इस समय पड़ रहा है. हालांकि एक तरफ जहां मिडल ईस्ट धमाकों की गूंज से दहल रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसी ईरान की एक और पहचान है जो उतनी ही खूबसूरत है जितनी कि यह जंग बेहद बदसूरत. वह पहचान है- ईरानी सिनेमा.
जब भी कभी ईरान की कला, संस्कृति की बात होगी, तो दुनिया के सबसे महान फिल्मकारों में शुमार मोहसिन मखमलबफ का जिक्र हमेशा किया जाएगा. उनकी कहानी भी फिल्मी है, लेकिन क्रांतिकारी टाइप. 15 साल की उम्र में जो लड़का ईरान में तानाशाही सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकलता है, वो 22 की उम्र में सिनेमा को अपना हथियार बनाने की ठान लेता है.
मोहसिन मखमल बफ का सिनेमा
ईरान की राजधानी में तेहरान में 29 मई 1957 को एक बच्चा जन्म लेता है. जिसका नाम मोहसिन मखमलबफ हैं. जन्म के बाद ही उसे उसकी मां छोड़ देती है, जिसके बाद कट्टर धार्मिक विचारों वाली दादी उसे पालती है. जहां उसे बचपन में बताया जाता है कि म्यूजिक और सिनेमा नरक की दो सीढ़ियां है. वो दादी की बात मान भी लेता है. अब मोहसिन 15 साल का हो चुका है. वो एक संगठन में शामिल होता है, जिसका मकसद ईरान की तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता का विरोध करना होता है.
17 की उम्र में उसने पुलिस वालों पर हमला किया, जिसके बाद उसे जेल हुई और भयंकर यातनाएं दी गई. इन सबके बीच उसने पढ़ाई शुरू की. नॉवेल लिखा. इसके बाद करीब साढ़े 4 साल बाद उसे जेल से बरी कर दिया गया. तब तक मोहसिन 22 साल का हो चुका था. इन चार साल में किताबों और जेल ने मोहसिन को ये सीख दे दी कि 'ईरान में पॉलिटिकल नहीं बल्कि कल्चरल प्रॉब्लम' है. अब वो इसे बदलने की ठान लेता है. सिनेमा को अपना हथियार बनाकर.
जेल से बाहर निकलकर मोहसिन फिल्में लिखाना शुरू करते हैं और कैमरे को अपना हथियार बनाते हैं. बिना फिल्म मेकिंग कोर्स और ट्रेनिंग के तीन फिल्में बनती हैं. इसके बाद वो रूकते है और फिर किताबें पढ़ना शुरू कर देते हैं. करीब 400 किताबें पढ़ने के बाद उन्होंने 200 रूल्स बनाए. जिन्हें वो 'अल्फा' सिनेमा कहते हैं.
मोहसिन ने अपने फिल्मी करियर को चार हिस्सों में बांटा
- पहला दौर 1982 से 1985 तक का होता है. जिसे एन्टी एस्टेब्लिशमेंट फिल्मों के लिए जाना जाता है. इसमें तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ हुए आंदोलन पर फिल्में बनाई गई.
- दूसरा दौर 1987 से 1989 के बीच रहा, जिसे सामाजिक फिल्ममेकर के तौर पर जाना गया. जिसमें मोहसिन ने 'द सायकलिस्ट' जैसी फिल्म बनाई. जिसका हीरो अफगान शरणार्थी है.
- तीसरा दौर 1991 से 1996 के बीच का रहा, जिसे मानव मन में तांकझांक के लिए जाना गया. इस दौर में मोहसिन लाइफ और इंसान के बीच हो रही जद्दोजहद को समझने की कोशिश करते हैं.
- चौथा दौर पोएटिक ब्रिलियन्स का आता है, जिसे मोहसिन इस समय जी रहे हैं. अब उनका सिनेमा वक्त के साथ-साथ काफी संवेदनशील और मैच्योर हो गया है.
मोहसिन की फिल्मों का असर
मोहसिन के डायरेक्शन में बनी डॉक्यूमेंट्री 'द अफगान अल्फाबेट' साल 2002 में रिलीज हुई थी. इस सिनेमा का असर इतना हुआ कि इसने अफगानिस्तान के शरणार्थी बच्चों की शिक्षा को लेकर एक बड़ा सामाजिक और कानूनी बदलाव भी पैदा कर दिया. यह डॉक्यूमेंट्री ईरान और अफगानिस्तान बॉर्डर स्थित सिस्तान-बलूचिस्तान एरिये में रहने वाले अफगान शरणार्थी बच्चों की लाइफ पर बनी थी.
जिसमें दिखाया गया कि तालिबान शासन गिरने के बाद ईरान में रह रहे अफगान शरणार्थी बच्चें स्कूल नहीं जा पा रहे थे. युद्ध और कट्टरपंथ का असर बच्चों पर काफी गहरा हुआ था. छोटी-छोटी बच्चियां बुर्का उतारने से डरने लगी थी. डॉक्यूमेंट्री के टाइटल 'अल्फाबेट' इसी बात का प्रतीक था कि बच्चों को बुनियादी शिक्षा-अक्षर का ज्ञान तक नहीं मिल रहा था. जो उनके भविष्य के लिए काफी जरूरी था.
इस फिल्म का असर इतना गहरा हुआ कि ईरान के कानून में बड़ा बदलाव हुआ. ईरान की सरकार और संसद में बहस शुरू हुई और नतीजा से निकला कि ईरान में रह रहे 7,00,000 से अधिक अफगान शरणार्थी बच्चों को ईरानी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति मिली. इसके अलावा फिल्म ने UN और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान भी खींचा. अंतत: मोहसिन मखमलबफ ने ये साबित किया कि सिनेमा सिर्फ एंटरटेन का नहीं बल्कि समाज में बदलाव का भी हथियार है. मोहसिन इस डॉक्यूमेंट्री को अपना बेस्ट काम मानते हैं.
ईरान में बैन फिल्म, गद्दारी का भी थप्पा
इसके अलावा मोहसिन की डॉक्यूमेंट्री 'द गार्डनर', 'द साइलेंस' 'गाब्बेह' जैसी फिल्में ईरान में बैन हुई है. ये तीनों ही धार्मिक मान्यताओं पर सवालिया निशान लगाने वाली फिल्में हैं. मखमलबफ डॉक्यूमेंट्री 'द गार्डनर' के दौरान अपने बेटे के साथ इजरायल की यात्रा भी करते हैं ताकि बहाई धर्म के बारे में जान सकें, जिसकी शुरुआत ईरान में हुई थी लेकिन ईरान में इस धर्म को मानने वालों को काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है. डॉक्यूमेंट्री में बाप-बेटे के बीच धर्म और दुनिया में शांति स्थापित करने की बहस भी दिखाई गई.
जानकारी के मुताबिक साल 1979 में ईरानी क्रांति के बाद मखमलबफ ऐसे पहले ईरानी कलाकार थे, जिन्होंने खुलकर इजरायल की यात्रा की. जिस वजह से ईरानी सराकर ने उन्हें गद्दार यहां तक की 'इजरायली एजेंट' तक घोषित कर दिया. इस यात्रा का असर इतना हुआ कि ईरान के सिनेमा म्यूजियम से उनकी फिल्मों के अवॉर्ड्स और यादों को भी हटा दिया गया.
जबकि दूसरी ओर मानवाधिकार का झंडा उठाने वालों लोगों ने उन्हें शांति दूत कहा. क्योंकि इजरायल यात्रा के दौरान उन्होंने कहा था, 'ईरान और इजरायल के लोगों के बीच नफरत नहीं होनी चाहिए.' इसके अलावा डॉक्यूमेंट्री 'द गार्डनर' में उन्होंने इजरायल के सुंदर बाग को दिखाते हुए, इजरायल से ये भी अपील की थी कि वे ईरान पर हमला न करें, इससे स्थिति और बिगड़ेगी.'