‘मर्दानी’ फ्रेंचाइजी में रानी मुखर्जी का दमदार कॉप अवतार लगातार ह्यूमन-ट्रैफिकिंग पर बेस्ड एंगेजिंग कहानियां लेकर आता रहा है. शिवानी शिवाजी रॉय के रोल में रानी की परफॉर्मेंस हमेशा दमदार रही हैं. और ‘मर्दानी 3’ का ट्रेलर कह रहा रहा कि रानी और इस फ्रेंचाइजी की नई कहानी और भी दमदार होने जा रहे हैं. काम से कम फर्स्ट हाफ तक तो ये कहा जा सकता है कि ‘मर्दानी 3’ अपने प्रॉमिस पर खरी उतर रही है.
धाकड़ रानी मुखर्जी और घिनौने विलेन
शिवानी शिवाजी रॉय के सामने इस बार एक एम्बेसेडर की बेटी का किडनैपिंग केस है. एम्बेसेडर के साथ उसके केयरटेकर की बेटी भी उठा ली गई है. इन्वेस्टिगेशन बढ़ती है तो पता चलता है कि किडनैपर्स एक ट्रैफिकिंग रिंग से जुड़े हैं. ये रिंग अम्मा (मल्लिका प्रसाद) चलाती है. उसकी ये ट्रैफिकिंग रिंग भिखारी-माफिया से जुड़ी है.
‘मर्दानी’ फ्रेंचाइजी की परंपरा आगे बढ़ाते हुए नई कहानी ने भी अम्मा को ऐसे विलेन के रोल में उतारा है जिसकी एंट्री से ही आपके रोंगटे खड़े हो सकते हैं. अम्मा भयानक, निर्मम, घिनौनी और सनकी महिला है. वो हाल-फिलहालबड़े पर्दे पर नजर आए सबसे खतरनाक विलेन्स में से एक है.
अम्मा इतनी खतरनाक है कि शिवानी के घर तक घुस आती है. किडनैपर्स ने दोनों बच्चियों को अलग कर दिया है. एम्बेसेडर की बेटी तक तो शिवानी पहुंचने ही वाली है. बड़े लोग इन्वॉल्व हैं, सरकारी मशीनरी से भी पूरी मदद है. लेकिन क्या एम्बेसेडर के गरीब केयरटेकर की बेटी को खोजने पर भी यर मशीनरी अपने रिसोर्स खर्च कर सकती है?
केस बच्चियों को खोजने का था, अम्मा तो संयोग से इस मामले में आ फंसी थी. क्या अम्मा के काले कारनामों का भंडाफोड़ करने और उसे रोकने में भी ये मशीनरी आगे आएगी? फर्स्ट हाफ बहुत दमदार है. रानी फुल फॉर्म में हैं. कहानी गंभीर है और इसे सुलझते हुए देखने के लिए आप तुरंत इन्वेस्ट हो जाते हैं. अब देखना है कि ‘मर्दानी 3’ का सेकंड हाफ क्या लेकर आता है.
सेकंड हाफ में थोड़ी ढीली पड़ी फिल्म
फर्स्ट हाफ में ‘मर्दानी 3’ ने सॉलिड बिल्ड-अप बनाया था. इंटरवल के ठीक पहले आपको पता लगता है कि अम्मा फिल्म की अकेली विलेन नहीं है. दूसरा विलेन कौन है ये आप फिल्म में ही जानें तो बेहतर रहेगा. सेकंड हाफ अपनी नौकरी भी दांव पर लगा चुकी शिवानी का है. लेकिन यहां ‘मर्दानी 3’ की कहानी कुछ एक्सट्रा करने की कोशिश में नजर आई. अचानक से फिल्म बहुत सारे आईडिया ट्राई करने लगती है.
भिखारी-माफिया और ट्रैफिकिंग में ड्रग ट्रायल्स का एंगल भी आ जाता है. शिवानी का मिशन थोड़ा इंटरनेशनल होने लगता है. पिछली दो फिल्मों तक शिवानी सिस्टम के अंदर रहकर, कई बार सिस्टम से ही लड़ते हुए, ह्यूमन एलिमेंट्स को ऊपर रखते हुए क्राइम खत्म करने वाली कॉप थी. उसका फोकस केस सॉल्व करने पर नहीं, मोरल विक्ट्री पर था. इस बार मामला एक लेवल और ऊपर चला गया है.
शिवानी सिस्टम से बागी हो चुके विजिलांटे वाले रोल में आ जाती है. कहानी के दूसरे विलेन का स्टोरी आर्क थोड़ा ज्यादा अनबिलिवेबल हो जाता है. शिवानी और ये दूसरा विलेन स्मार्टनेस का कॉम्पिटिशन करने लगते हैं. फ़िल्म दर्शक को बांधने से ज्यादा, कहानी की स्मार्टनेस फ्लॉन्ट करने पर फोकस करने लगती है. फिक्शनल कहानी देखने के लिए दर्शक के तौर पर आपको फिल्म के प्लॉट, किरदारों की कहानी पर विश्वास दिखाना पड़ता है. लेकिन ‘मर्दानी 3’ का सेकंड हाफ आपको सारे लॉजिक किनारे फेंक देने को बोलता है, जो थोड़ा ज्यादा है.
फिल्म अपने लीड किरदार को हीरो साबित करने के लिए कहानी की गंभीरता को ताक पर रख देती है. ये वही समस्या है जो कॉप यूनिवर्स की फिल्मों में उतरने लगी थी. ‘मर्दानी’ फ्रेंचाइजी में अभी तक ये दिक्कत नहीं थी, मगर इस बार ये हुआ है. ऐसी चीजें मेकर्स के उस एम्बिशन का भी नतीजा होती हैं कि जब वो फ्रेंचाइजी को नेक्स्ट लेवल पर ले जाना चाहते हैं.
सेकंड हाफ में ये चीजें दर्शक का ध्यान हटाने लगती हैं. बीच-बीच में फिल्म कन्फ्यूज नजर आने लगती हैं. अम्मा का शानदार विलेन किरदार, अंडरयूज्ड रह जाता है. तब सिर्फ शिवानी का हीरोइज्म ही फिल्म पर टिके रहने की वजह बनता है. और रानी मुखर्जी की परफॉर्मेंस आपको बांधे तो रखती ही है.
कुल मिलाकर ‘मर्दानी 3’ एक दमदार सेटअप, सॉलिड कहानी और मेन एक्टर्स की तगड़ी परफॉरमेंस से सजी फिल्म है. बस सेटअप का ओवरएम्बिशस ट्रीटमेंट, जरूरत से ज्यादा फिल्मीपन थोड़ा सा ध्यान बंटाता है. फिर भी रानी मुखर्जी के लिए ‘मर्दानी 3’ देखी जानी चाहिए.