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'बंदर' रिव्यू: बॉबी देओल ने दी करियर की बेस्ट परफॉरमेंस, मगर अनुराग पर नहीं लागू होती ये बात

अनुराग कश्यप का डायरेक्शन और बॉबी देओल की एक्टिंग, हिंदी सिनेमा की दो बिल्कुल अलग दुनिया का यह मिलन एक ऐसा डार्क और असहज करने वाला सिनेमा लेकर आया है, जिसे देख पाना हर किसी के बस की बात नहीं है. हालांकि, बॉबी और बाकी एक्टर्स की जानदार परफॉरमेंस इसे मजबूत बनाती है.

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'बंदर' फिल्म रिव्यू (Photo: ITGD)
'बंदर' फिल्म रिव्यू (Photo: ITGD)
फिल्म:बंदर
2.5/5
  • कलाकार : बॉबी देओल, सपना पब्बी, जितेंद्र जोशी, सबा आजाद, सान्या मल्होत्रा
  • निर्देशक :अनुराग कश्यप

अनुराग कश्यप और बॉबी देओल हिंदी सिनेमा की दो बिल्कुल अलग दुनिया से आते हैं. दोनों का साथ आना ही फिल्म बंदर को दिलचस्प बनाने वाली सबसे बड़ी वजह है. लेकिन इन दोनों संसारों का टकराव एक ऐसी फिल्म लेकर आया है जिसे देख पाना और बर्दाश्त करना हर किसी के लिए आसान नहीं है. ऐसा कहानी की वजह से नहीं, बल्कि कहानी कहने के बेहद डार्क और रियलिस्टिक तरीके की वजह से है. अनुराग कश्यप अमूमन अपनी फिल्मों में नैतिकता के काले और सफेद रंगों के बीच पसरे ग्रे इलाके को उघाड़ते पाए जाते हैं, मगर बंदर में वो किताबी नैतिकता से अलग हटकर उस 'ग्रे' को उघाड़ रहे हैं, जो हमारे समाज में लोगों के बर्भाव की शक्ल में पसरा रहता है.

क्या खेल दिखा रहा है ये 'बंदर'?
बॉबी देओल फिल्म में अल्टिमेट स्टारडम पाने से चूके हुए एक बुझते सितारे, समर सक्सेना के रोल में हैं. स्टारडम ढलने के साथ ही समर की जिंदगी से ये फीलिंग भी गायब हो चुकी है कि कोई उसे वाकई चाहता है. इसी सच्चे जुड़ाव की तलाश में वो डेटिंग ऐप्स की गलियों से गुजरता है. फिल्म की शुरुआत में आप समर को उसकी नई गर्लफ्रेंड खुशी (सबा आजाद) के साथ देखते हैं, मगर तभी दरवाजे पर हुई पुलिस की एक दस्तक समर की पूरी लाइफ बदल देती है. डेटिंग ऐप से ही मिली उसकी एक्स-गर्लफ्रेंड गायत्री (सपना पब्बी) ने उसपर रेप का गंभीर आरोप लगाया है. जैसा कि फिल्म में एक किरदार ने कहा भी है— 'ये आरोप अपने आप में एक जजमेंट है.' ये आरोप वो डुगडुगी है जो समर को दुनिया क पिंजरे में कैद बंदर बना देता है. 

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ये आरोप ही आरोपी की पूरी जिंदगी तय कर देता है, समाज को जांच और कोर्ट के फैसले की जरूरत ही नहीं महसूस होती. अनुराग कश्यप भी यहां समर के केस की कानूनी जांच और कोर्ट की अंतहीन सुनवाई वगैरह के ड्रामे में नहीं जाते. वो रेप के एक आरोप से एक संभ्रांत आदमी की जिंदगी, उसकी सामाजिक पहचान और साइकोलॉजी पर पड़ने वाले असर को दिखाने में ज्यादा इंटरेस्टेड हैं.

फिल्म के ट्रेलर ने ही ये फैक्ट साफ कर दिया था कि गायत्री और समर के बीच जो कुछ भी हुआ, वो आपसी सहमति से हुआ था. फिल्म आगे दिखाती है कि जब गायत्री के बर्ताव में एक अजीब सा ऑब्सेशन (जुनून) आने लगता है, तो समर उससे दूर भागने लगता है. बंदर इसी प्लॉट के साथ आपको उस कड़वे जोन में ले जाती है जहां महज एक शिकायत के बाद समर की पूरी लाइफ उधड़ती हुई नजर आती.

समर के केस की जांच कर रहा पुलिस ऑफिसर (बेहतरीन जितेंद्र जोशी) थाने में ही दस लोगों के सामने उसकी बेहद पर्सनल चैट्स को जोर-जोर से पढ़ रहा है. वहीं, जेल में एंटर करते ही समर को पूरी तरह नंगा किए जाने का सीन, जेल का वीभत्स माहौल, गंदगी, घिनौनी हरकतें करते खूंखार अपराधी और वहां खुद को जिंदा रखने की समर की लड़ाई दर्शकों को बुरी तरह असहज करती है. इस हिस्से में बहुत सारे मौकों पर अनुराग कश्यप आपके सामने बेहद घिनौने बाथरूमों की लाइव तस्वीरें रख देते हैं.

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यहां दिखाया गया इंसान का मल, असल में समाज के मल की तस्वीर बनता है. दर्शक की आंखों के सामने यह गंद रखकर अनुराग आपको चमचमाती लग्जरी दुनिया से आए समर की टूटती साइकोलॉजी में सीधे घसीटना चाहते हैं. मगर इन सीन्स में एक बड़ा रिस्क भी है, इनका घिनौनापन कई बार आम दर्शक को इतना विचलित कर देता है कि वो फिल्म को बीच में से ही छोड़कर उठ जाता है (ऐसा थिएटर में मेरे ठीक आगे बैठे एक व्यक्ति के साथ हुआ भी). जेल की अपनी एक अलग ही क्रूर अर्थव्यवस्था है. वहां सबसे भयानक अपराधी भी रेप के आरोप में आए कैदियों को सबसे गंदा और नीच मानते हैं.

उन अपराधियों में अपने खुद के गुनाहों को लेकर भले ही कोई पछतावा न हो, लेकिन वो रेप के आरोपी को जेल के अंदर ही खत्म कर देना चाहते हैं. वहां आपका एक मैसेज व्हाट्सएप के जरिए बाहर भेजने के लिए दस हजार रुपये की रिश्वत चाहिए, और उस मैसेज का जवाब पाने के लिए दस हजार अलग से लगेंगे. एक जोड़ी चप्पल तक के लिए वहां खूनी मारामारी है. समर जैसे बड़े सेलेब्रिटी के लिए यह जेल नर्क से भी बदतर साबित होती है, और यह सब हो रहा है सिर्फ गायत्री के एक आरोप से.

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बंदर में अनुराग केस की बारीकियों या कोर्ट ट्रायल तक न जाकर सीधे दर्शकों को समर के बारे में फैसला लेने को कहते हैं. हालांकि, फिल्म शुरुआत से ही गायत्री को पूरी तरह गलत और विलेन बताकर ही आगे बढ़ती है. समर के बर्ताव पर गायत्री का पक्ष या उसका वर्जन न दिखाना फिल्म के नैरेटिव को थोड़ा कमजोर जरूर करता है. उसका ऑब्सेशन या समर से उसकी असल शिकायत अगर मेकर्स एक डायलॉग में भी साफ कर देते, तो यह फिल्म और मजबूत होती.

यह एक कमी फिल्म को रेप चार्ज की गंभीरता और उसके मिसयूज की व्यापक बहस से हटाकर सिर्फ 'समर मेहरा की व्यक्तिगत पीड़ा' में समेट देती है. अनुराग कश्यप एक आरोप भर से हंसते-खेलते आदमी को जिंदा निगल जाने वाले सरकारी और सामाजिक सिस्टम को दिखाने में तो पूरी तरह कामयाब होते हैं, लेकिन उस आरोप के दोनों पक्षों को एक बार भी कायदे से एड्रेस न करना, उस आदमी पर बीत रहे कहर की कहानी को थोड़ा अधूरा छोड़ देता है.

बॉबी देओल की करियर बेस्ट परफॉरमेंस
हालांकि, स्क्रिप्ट की ये बारीक कमियां बंदर अपनी जानदार और बेमिसाल एक्टिंग परफॉर्मेंस के दम पर पूरी तरह पाट लेती है. यह फिल्म बिना किसी शक बॉबी देओल के पूरे करियर की बेस्ट एक्टिंग परफॉर्मेंस है. समर की उधड़ती मानसिक स्थिति और उसका शरीर पर हो रहे फिजिकल असर, दोनों को पर्दे पर जीने में बॉबी ने कमाल का काम किया है. टॉयलेट से बाहर आते एक कॉकरोच को अपनी चप्पल से बेरहमी से मारते बॉबी देओल को अनुराग ने इमेजिन भी कैसे किया, यह सोचना भी हैरान करता है. मगर इस एक सीन में बॉबी आपका दिमाग झिंझोड़ कर रख देते हैं.

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पूरी फिल्म में उनके सॉलिड एक्टिंग क्राफ्ट के ऐसे कई सैंपल्स बिखरे हुए हैं. दूसरी तरफ, रहस्यमयी, अतरंगी तौर-तरीकों और ऑब्सेशन से भरी गायत्री के रोल में सपना पब्बी बेहद परफेक्ट लगी हैं. उनकी रहस्यमयी स्माइल ही उनके किरदार का सबसे बड़ा हथियार है और इसे उन्होंने बड़ी सफाई से स्क्रीन पर इस्तेमाल किया है. समर की परेशान बहन के रोल में सान्या मल्होत्रा एक बार फिर अपनी छोटी सी भूमिका में इंप्रेस करती हैं, और क्रूर पुलिस ऑफिसर के रोल में जितेंद्र जोशी ने हमेशा की तरह जबरदस्त काम किया है.

बंदर भले ही बॉबी देओल के करियर की सबसे शानदार परफॉर्मेंस हो, मगर इसे अनुराग कश्यप की सबसे सॉलिड या कल्ट फिल्मों में नहीं गिना जा सकता. कुछ-कुछ जगहों पर यह उनकी पुरानी फिल्म नो स्मोकिंग जैसी कमाल होने ही लगती है कि तभी यह कहानी थोड़ी कन्फ्यूज और बिखरी हुई सी लगने लगती है. लेकिन, अगर आप में अनुराग कश्यप का टिपिकल डार्क-सीरियस और कड़वा सिनेमा बिना पलकें झपकाए पचाने की हिम्मत है, तो 'बंदर' थिएटर्स में एक बार जरूर देखी जा सकती है.

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