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दबंग 2 नहीं, 56 साल पहले शुरू हुई थी 'फुलौरी बिना चटनी' की कहानी! धमाल 4 में हुआ रीक्रिएट

'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' गाना आज फिर 'धमाल 4' में सुनाई देगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सुपरहिट ट्रैक की शुरुआत 56 साल पहले भोजपुरी लोकगीत के रूप में हुई थी?

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'फुलौरी बिना चटनी' का असली हीरो कौन? (Photo: ITG)
'फुलौरी बिना चटनी' का असली हीरो कौन? (Photo: ITG)

आज अगर आप 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' सुनते हैं तो शायद सबसे पहले सलमान खान की फिल्म 'दबंग 2' या फिर सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले भोजपुरी वर्जन याद आते होंगे. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने की जड़ें करीब 56 साल पुरानी हैं और इसका सफर बिहार-यूपी के भोजपुरी लोकगीतों से शुरू होकर कैरेबियन देशों और फिर बॉलीवुड तक पहुंचा है.

कहां से आया 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी'?

'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' मूल रूप से एक पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत है. फिलौरी या फुलौरी एक तरह का पकौड़े जैसा स्नैक होता है, जिसे आमतौर पर चटनी के साथ खाया जाता है. इसी वजह से गाने की लाइन 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' का मतलब है कि एक चीज दूसरी के बिना अधूरी है.

ये गीत उन भोजपुरी लोकगीतों में शामिल था, जिन्हें 19वीं सदी में भारत से त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में गए गिरमिटिया मजदूर अपने साथ ले गए थे. वहां ये गीत पीढ़ियों तक जिंदा रहा.

सुंदर पोपो ने बनाया इंटरनेशनल हिट

इस गाने को सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय जाता है 'सुंदर पोपो' को, जिन्हें 'किंग ऑफ चटनी म्यूजिक' भी कहा जाता है. उन्होंने 1969 में अपने मशहूर एल्बम 'नाना एंड नानी' के दौर में भोजपुरी लोकधुनों को कैरेबियन बीट्स और अंग्रेजी बोलों के साथ मिलाकर नया अंदाज दिया. बाद में 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' उनका सबसे चर्चित गीत बन गया.

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असल में यही वो गाना था जिसने 'चटनी म्यूजिक' नाम की पूरी म्यूजिक शैली को पॉपुलर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. इसमें भोजपुरी, हिंदुस्तानी और कैरेबियन संगीत का अनोखा मिश्रण था.

बाबला-कंचन ने भारत में किया सुपरहिट, भोजपुरी ने भी भुनाया

1982-83 के आसपास मशहूर जोड़ी बाबला और कंचन ने सुंदर पोपो के वर्जन को रीक्रिएट किया. भारत में ये वर्जन जबरदस्त हिट हुआ और पहली बार बड़े पैमाने पर लोगों ने इस गाने को सुना. आज भी बहुत से लोग इसी वर्जन को ओरिजिनल समझते हैं.

समय के साथ इस गाने के कई भोजपुरी वर्जन बने. लोकगायिका कल्पना पटवार ने भी 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' को नए अंदाज में गाया. इसके अलावा कई भोजपुरी एल्बमों और स्टेज परफॉर्मेंस में ये गाना लगातार इस्तेमाल होता रहा. भोजपुरी संगीत में ये गाना लगभग एक फोक एंथम जैसा दर्जा रखता है.

बॉलीवुड में कब-कब सुनाई दिया?

इस धुन का असर बॉलीवुड पर भी खूब पड़ा, हिंदी सिनेमा के हर दौर में इसका बराबर इस्तेमाल हुआ.

- 1994 में फिल्म 'घर की इज्जत' के एक गाने में इसकी धुन सुनाई दी.
- 2012 में दबंग 2 में ममता शर्मा और वाजिद अली ने इसे नए अंदाज में पेश किया. यही वर्जन नई पीढ़ी के बीच सबसे ज्यादा हिट हुआ.

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अगर इतिहास की बात करें तो सुंदर पोपो का वर्जन सबसे अहम माना जाता है क्योंकि उसी ने इस लोकगीत को दुनिया भर में पहचान दिलाई. लेकिन भारत में पॉपुलैरिटी के हिसाब से बाबला-कंचन और फिर 'दबंग 2' वाला वर्जन सबसे ज्यादा सुना गया.

अब 'धमाल 4' में फिर होगा धमाका

अब 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' को एक बार फिर बड़े पर्दे पर रीक्रिएट किया गया है और ये गाना धमाल 4 फिल्म में सुनाई देगा. हाल ही में रिलीज हुए ट्रैक 'चटनी' में रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी और अजंलि देशपांडे नाचते-गाते दिखाई दे रहे हैं. 

यानि 56 साल पहले भोजपुरी लोकधुन और कैरेबियन संगीत के मेल से शुरू हुआ ये सफर अब भी जारी है. शायद यही वजह है कि पीढ़ियां बदल गईं, म्यूजिक ट्रेंड बदल गए, लेकिन 'फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी' का जादू आज भी बरकरार है.

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