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केशव के 60 फीसदी वोट का टारेगट, गणित, समझें आखिर क्या BJP का जातीय समीकरण

डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य ने पिछले दिनों आजतक के यूपी पंचायत कार्यक्रम में कहा था कि यूपी में 100 में से 60 फीसदी वोट हमारा है. बाकी 40 फीसदी में बंटवारा है और बंटवारे में भी हमारा है. यहां बंटवारे का आशय सपा और बसपा के बीच है. यादव सपा का परंपरागत वोट माना जाता है तो जाटव बसपा का कोर वोटबैंक है, जिस पर बीजेपी की नजर है.

केशव प्रसाद मौर्य, सीएम योगी आदित्यनाथ, दिनेश शर्मा केशव प्रसाद मौर्य, सीएम योगी आदित्यनाथ, दिनेश शर्मा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बीजेपी यूपी में 60 फीसदी वोटों का लक्ष्य रखा
  • विपक्ष के 40 फीसदी वोटों पर भी बीजेपी नजर
  • जाटव और यादव वोट को साधने में जुटी बीजेपी

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा औपचारिक बिगुल भले ही नहीं बजा हो, लेकिन सभी सियासी दलों ने खुद को चुनावी मोड में सेट कर लिया है. सूबे की सभी पार्टियां 2022 के चुनावी जंग फतह करने के लिए जातीय के बिसात पर अपने सियासी समीकरण सेट करने में जुटे हैं. बीजेपी यूपी की सत्ता पर काबिज रहने के लिए 60 फीसदी वोटों को हासिल करने का टारगेट को लेकर चल रही है. ऐसे में आखिर बीजेपी के 60 फीसदी वोट में यूपी की कौन-कौन सी जातीय को बीजेपी अपना मानकर चल रही है.   

केशव मौर्य ने कहा 60 हमारा और 40 में बंटवारा

बीजेपी नेता व यूपी के डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य ने पिछले दिनों आजतक के यूपी पंचायत कार्यक्रम में कहा था कि यूपी में 100 में से 60 फीसदी वोट हमारा है. बाकी 40 फीसदी में बंटवारा है और बंटवारे में भी हमारा है. 40 फीसदी वोटो से क्या मतलब है? इस पर उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव यह ना समझें कि यादव उनका बंधुवा मजदूर है और मायावती ना समझें कि जाटव उनको ही वोट देगा. यदवंशी और रैदासवंशी भी हमारे (बीजेपी) साथ हैं. 

केशव मोर्य ने भले ही बीजेपी के 60 फीसदी वोट समीकरण के फॉर्मूला को सार्वजनिक न किया हो, लेकिन उन्होंने विपक्ष के 40 फीसदी वोट को जरूर इशारों-इशारों में बता दिया है. माना जा रहा है कि विपक्ष के वोट में उनका इशारा 18 फीसदी मुस्लिम, 10 फीसदी यादव और 12 फीसदी जाटव पर है. इसके अलावा बाकी 18 फीसदी सवर्ण, गैर-जाटव दलित 10 फीसदी और बाकी 32 फीसदी गैर-यादव ओबीसी को अपना वोटबैंक मानकर बीजेपी चल रही है.

40 फीसदी में सपा और बसपा के बीच बंटवारा

डिप्टी सीएम ने कहा कि विपक्ष के 40 फीसदी में बंटवारा है और बंटवारे में भी हमारा है.  यहां बंटवारे का आशय सपा और बसपा के बीच है. यादव सपा का परंपरागत वोट माना जाता है तो जाटव बसपा का कोर वोटबैंक है. इसके अलावा 18 फीसदी मुस्लिम वोटर सपा और बसपा के बीच बंटता रहा है. यह बात इसीलिए भी प्रमाणित हो रही है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में 50 फीसदी वोट मिले थे जबकि एनडीए को 51 को फीसदी. ऐसे में अगर वो यादव और जाटव समुदाय का कुछ हिस्सा जोड़ने में सफल रहते हैं तो 60 फीसदी का टारगेट आसानी से हासिल हो सकता है. 

बीजेपी की नजर यादव और जाटव पर भी है

वहीं, दूसरी तरफ देखें तो 2017 के चुनाव में सपा को 22 फीसदी और बसपा को 18 फीसदी वोट मिले थे, जिन्हें मिलाकर 40 फीसदी हो रहा है और इस इसमें से भी वोट मिलने की उम्मीद बीजेपी लगा रखी है. हालांकि, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में सीएसडीएस की रिपोर्ट के मानें तो यादव समुदाय का करीब 27 फीसदी के आसपास वोट बीजेपी को मिला है. 

दरअसल, बीजेपी ने यूपी में तीन यादव समुदाय को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने में कामयाब रही है. योगी कैबिनेट में गिरीश यादव मंत्री हैं. केशव ही नहीं बल्कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने भी आजतक के पंचायत कार्यक्रम में कहा कि बीजेपी बहुत जल्द ही यादव समुदाय को लेकर एक बड़ी रैली करने जा रही है, जिसमें यादव समाज के बड़े नेता बीजेपी में शामिल होंगे. इससे जाहिर होता है कि बीजेपी की नजर अखिलेश यादव के कोर वोटबैंक में भी सेंधमारी करने की है, 

वहीं, जाटव समुदाय से आने वाले कांता कर्दम को बीजेपी ने यूपी में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया और अशोक जाटव को योगी कैबिनेट में मंत्री के रूप में जगह दे रखी है. इसके अलावा यूपी अनुसूचित जाति आयोग की कमान भी डॉ. रामबाबू हरित को सौंपी गई है, जो जाटव समुदाय से आते हैं. इससे जाहिर होता है कि बीजेपी की नजर यूपी में गैर-जाटव दलित के साथ-साथ जाटव वोटबैंक पर भी है.  

यूपी में 22 फीसदी दलित दो हिस्सों में बंटा हुआ है

यूपी में 22 फीसदी दलित मतदाता है, जिसमें 12 फीसदी जाटव और 10 फीसदी गैर-जाटव दलित हैं. 2017 में भाजपा को 85 दलित आरक्षित सीटों में से 69 सीटों पर जीत मिली थी और 39 फीसदी वोट मिले थे, जबकि सपा को इनमें से सात सीटें मिली थीं. बसपा को सिर्फ दो सीटें हीं मिल पाई थी. 

मोदी सरकार ने यूपी के गैर-जाटव दलित समुदाय के तीन मंत्रियों को कैबिनेट में जगह दी है. कौशल किशोर (जाति से पासी), एसपी बघेल (गडेरिया-धनगर) और भानु प्रताप वर्मा (कोरी)- को शामिल किया है, जिसके जरिए 2022 के चुनाव में दलित वोटों का साधने की बीजेपी रणनीति है. इसके अलावा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यूपी के दौरे पर साफ तौर पर पार्टी नेताओं को दलित बस्तियों में जाने और उनकी समस्याओं को हल करने का आदेश दिया है. इससे जाहिर होता है कि बीजेपी दलित वोटबैंक को लेकर गंभीरता के काम करना शुरू कर दिया. 

यूपी का जातीय समीकरण 

बता दें कि यूपी के जातिगत समीकरणों पर नजर डालें तो इस राज्य में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग है. प्रदेश में सवर्ण जातियां 18 फीसदी हैं, जिसमें ब्राह्मण 10 फीसदी हैं. वहीं, पिछड़े वर्ग की संख्या 40 फीसदी है, जिसमें यादव,10 कुर्मी, सैथवार आठ फीसदी, मल्लाह पांच फीसदी, लोध तीन फीसदी जाट तीन, विश्वकर्मा दो फीसदी, गुर्जर दो फीसदी और अन्य पिछड़ी जातियों की तादाद 7 फीसदी है. इसके अलावा प्रदेश में अनुसूचित जाति 22 फीसदी हैं और मुस्लिम आबादी 18 फीसदी है.

बीजेपी का 60 फीसदी वोट टारगेट

बीजेपी यादव को छोड़कर बाकी पिछड़ी जातीय को अपना वोटबैंक मानकर चल रही है. 2014 के चुनाव से ही बीजेपी ने यूपी में ओबीसी वोटों को साधने के लिए गैर-यादव ओबीसी को फार्मूला बनाया था, जिसे अमित शाह ने और बाद में केशव मोर्य ने 2017 में जमीन पर उतारा था. इसी का नतीजा है कि बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी से मौर्य समाज से आने वाले केशव मोर्या को डिप्टी सीएम बना रखा है और प्रदेश अध्यक्ष की कमान कुर्मी समुदाय से आने वाले स्वतंत्रदेव सिंह के हाथ में है. 

यूपी में सवर्ण वोट बीजेपी का कोर वोटबैंक माना जाता है. 18 फीसदी सवर्ण समुदाय से देखे तो मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ को सौंप रखी है, जो क्षत्रीय समुदाय से आते हैं और उनकी यूपी में भागेदारी 6 फीसदी के करीब है. ऐसे ही ब्राह्मण समुदाय से आने वाले दिनेश शर्मा को डिप्टीसीएम बना रखा है. इस तरह से बीजेपी सवर्ण समुदाय के साथ-साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव को अपना वोटबैंक मानकर चल रही है. इसके अलावा सपा के यादव और बसपा के जाटव पर भी उसकी नजर है. 

 

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