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Ghaziabad politics: बसपा का गढ़ रहा है जिला गाजियाबाद, बीजेपी लहर ने बदल दिए समीकरण

UP election Ghaziabad politics: गाजियाबाद में दलित और मुस्लिमों के गठजोड़ से बसपा को मजबूती मिलती रही है. हालांकि, 2017 में जब बीेजेपी की लहर चली तो न सिर्फ बसपा का किला ढह गया बल्कि कांग्रेस और सपा का गठजोड़ भी जिले में कोई असर नहीं दिखा सका.

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गाजियाबाद (प्रतीकात्मक फोटो-PTI)
गाजियाबाद (प्रतीकात्मक फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गाजियाबाद जिले में विधानसभा की 5 सीटें
  • 2017 में सभी सीटों पर जीती थी बीजेपी
  • गाजियाबाद लोकसभा सीट पर तीन बार से बीजेपी

गाजियाबाद, यूपी का वो जिला है जो अलग-अलग चीजों के लिए पहचान रखता है. इसे यूपी का औद्योगिक जिला भी कहा जाता है. बॉलीवुड में गाजियाबाद को लेकर फिल्में भी बनी हैं. इस जिले के जन्म से पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का भी कनेक्शन है.

14 नवंबर 1976 को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने नेहरू के जन्मदिवस के मौके पर गाजियाबाद को जिला बनाने का फैसला किया था. 2021 में गाजियाबाद देश की सुर्खियों का केंद्र रहा है क्योंकि यहां करीब एक साल तक दिल्ली बॉर्डर पर बड़ी तादाद में किसानों का आंदोलन चला है. कोरोना की लहर के दौरान गाजियाबाद से कई डरावनी तस्वीरें भी देखने को मिलीं.

पहले गाजियाबाद एक तहसील थी जो मेरठ जिले का हिस्सा थी. जिला बनने के बाद अगस्त 1994 में गाजियाबाद को नगर निगम का दर्जा दिया गया. इस शहर का नाम गाजी-उद-दीन के नाम पर पड़ा है. बताया जाता है कि 1740 में इस जगह की स्थापना हुई थी. 

गाजियाबाद जिले में 5 विधानसभा सीटें

जिले की आबादी 50 लाख से ज्यादा है. यहां की करीब 70 फीसदी आबादी हिंदू है जबकि करीब 25 फीसदी मुस्लिम आबादी है. दलित और मुस्लिम गाजियाबाद में काफी निर्णायक रहा है. जिले में ब्राह्मण, वैश्य, गुर्जर, ठाकुर, पंजाबी और यादव वोटर भी हैं.  गाजियाबाद में 5 विधानसभा सीटें हैं- मुरादनगर, लोनी, साहिबाबाद, मोदीनगर और गाजियाबाद. गाजियाबाद में हिंदू वोटरों की तादाद ज्यादा है, जबकि मुरादनगर में मुस्लिम वोटर भी निर्णायक भूमिका में है. 

गाजियाबाद की सियासत में बहुजन समाज पार्टी का खासा दबदबा रहा है. यहां मुस्लिम और दलितों के गठजोड़ से बसपा प्रत्याशी जीतते रहे हैं. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से सियासी समीकरण बदल गए हैं. हालांकि, लोकसभा सीट की बात की जाए तो एकछत्र राज बीजेपी का ही रहा है. 2009 में यहां से बीजेपी के टिकट पर राजनाथ सिंह जीते थे और उसके बाद 2014 व 2019 के आम लोकसभा चुनाव में लगातार दो बार वीके सिंह ने परचम लहराया.

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हालांकि, विधानसभा का समीकरण 2017 में ही बीजेपी के पक्ष में आया. सभी पांच सीटों पर बीजेपी ने क्लीन स्वीप कर दिया. लोनी को छोड़कर बाकी चारों सीटों पर बीजेपी के विजेता प्रत्याशी और दूसरे नंबर के प्रत्याशी के बीच 30 फीसदी से ज्यादा वोटों का अंतर रहा. यानी बीजेपी की लहर चली.  सिर्फ लोनी सीट पर जीत का अंतर 15 फीसदी के आसपास रहा. यहां से जीते विधायक नंदकिशोर गुर्जर लगातार विवादों का केंद्र भी रहे हैं. वो कभी इलाके की मीट शॉप बंद कराते हुए नजर आते हैं तो कभी पुलिस से ही भिड़ जाते हैं. देश के तमाम संवेदनशील मसलों पर उनके ऐसे बयान आते हैं जो विवाद का केंद्र बन जाते हैं. 

2017 के चुनाव में मुरादनगर सीट से अजीत पाल त्यागी, मोदीनगर सीट से मंजू शिवाच, लोनी सीट से नंदकिशोर गुर्जर, साहिबाबाद सीट से सुनील शर्मा और गाजियाबाद सदर सीट पर अतुल गर्ग जीते थे. बता दें कि गाजियाबाद का मेयर पद भी बीजेपी के पास ही जाता रहा है.

2012 में चला था बसपा का सिक्का

समाजवादी पार्टी ने 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्णबहुमत से जीतकर सरकार बनाई थी. लेकिन गाजियाबाद में उसके लिए फीका ही रहा था. बहुजन समाज पार्टी ने पांच में से चार सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि एक सीट (मोदीनगर) पर राष्ट्रीय लोकदल जीती थी. बसपा को इस चुनाव में यहां 32 फीसदी से ज्यादा वोट मिला था, जबकि दूसरे नंबर पर बीजेपी रही थी और उसे करीब 20 फीसदी वोट मिला था. सपा के हिस्से में 20 फीसदी से भी कम वोट आया था और उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी. 

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2017 के चुनाव में गाजियाबाद जिले में सपा को कांग्रेस से भी कम वोट मिला था. हालांकि, दोनों पार्टिया गठबंधन में लड़ी थीं. लेकिन उनका एक भी प्रत्याशी नहीं जीत पाया था. 

बीते कुछ सालों में गाजियाबाद में कई मॉल और मल्टीप्लेक्स खुले हैं. साथ ही हाइराइज सोसायटी भी यहां बनी हैं. बीते कुछ सालों में यहां सड़कों को चौड़ा किया जाने के साथ हाईवे दिल्ली मेरठ एक्सप्रेस वे (डीएमई )का निर्माण और एन एच 9 सुधार और चौड़ाकरण किया गया है. गाजियाबाद दिल्ली मेट्रो नेटवर्क से जुड़ा हुआ है. साथ ही दिल्ली-मेरठ रेपिड मेट्रो से जल्द जुड़ने वाला है, अभी इसका निर्माण कार्य चल रहा है.

 

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