पलिया कलां, जिसे चुनाव आयोग पलिया के नाम से भी संदर्भित करता है, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले का एक तहसील स्तरीय कस्बा और पलिया कलां तहसील का मुख्यालय है. यह नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास तराई क्षेत्र में स्थित है और दुधवा नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है. यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और कृषि आधारित उद्योगों पर टिकी है, जबकि एक प्रमुख चीनी मिल इसकी औद्योगिक पहचान को भी मजबूत बनाती है. यह कस्बा आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार और सेवा केंद्र भी है.
1961 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित पलिया एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और खीरी लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के दौरान इसकी सीमाओं का पुनर्गठन किया गया. अब इसमें पलिया कलां तहसील का पूरा क्षेत्र, कुकड़ा का कानूनगो सर्किल और गोला गोकर्णनाथ तहसील का वन क्षेत्र शामिल है, जिससे इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण बनता है. पलिया सीट की एक खास बात यहां की अनुसूचित जनजाति की उल्लेखनीय आबादी है, जो वर्ष 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद उत्तर प्रदेश में असामान्य मानी जाती है.
पलिया का चुनावी इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. यहां पहली बार 1962 में मतदान हुआ, लेकिन अगले दो चुनावों में यह सीट चुनावी नक्शे से गायब रही. 1974 के चुनाव से पहले इसे फिर से बहाल किया गया. अब तक यहां 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. कई दशकों तक यह सीट एक दल से दूसरे दल के बीच बदलती रही. इसके बाद बहुजन समाज पार्टी ने लगातार तीन चुनाव जीते और फिर भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दो बार जीत दर्ज की. कांग्रेस पार्टी ने यह सीट चार बार जीती है, जबकि बसपा और भाजपा को तीन-तीन बार जीत मिली है. जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार जीत हासिल की है.
2012 में बसपा ने लगातार तीसरी बार यह सीट जीती और हरविंदर कुमार साहनी उसके उम्मीदवार थे. उन्होंने कड़े मुकाबले में समाजवादी पार्टी के कृष्ण गोपाल पटेल को 5,919 वोटों से हराया. साहनी ने 2016 में बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. इसके बाद 2017 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के सैफ अली नकवी को 69,228 वोटों से हराया. 2022 में साहनी ने भाजपा के लिए सीट बरकरार रखी. उन्हें 118,864 वोट मिले, जबकि उनके समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी प्रितिंदर सिंह कक्कू को 80,735 वोट प्राप्त हुए. 2022 में भाजपा की जीत का अंतर घटकर 38,129 वोट रह गया, हालांकि जीत फिर भी आरामदायक रही.
लोकसभा चुनावों में पलिया विधानसभा क्षेत्र के मतदान रुझान भी भाजपा के उभार को दिखाते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बसपा पर 6,029 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा तीसरे स्थान से सीधे पहले स्थान पर पहुंच गई और बसपा पर 15,909 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में समाजवादी पार्टी के मुकाबले भाजपा की बढ़त बढ़कर 51,396 वोट हो गई. हालांकि पांच साल बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में यह अंतर काफी कम हो गया. भाजपा के खीरी लोकसभा उम्मीदवार अजय कुमार मिश्र टेनी ने समाजवादी पार्टी के उत्कर्ष वर्मा पर पलिया विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ 6,843 वोटों की बढ़त बनाई.
2024 का चुनाव अक्टूबर 2021 की लखीमपुर खीरी हिंसा की पृष्ठभूमि में भी हुआ. इस घटना में आठ लोगों की मौत हुई थी, जिनमें चार प्रदर्शनकारी किसान भी शामिल थे, जिन्हें कथित रूप से एक वाहन ने कुचल दिया था. इस वाहन को कथित तौर पर तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्र चला रहे थे. किसानों की हत्या से जुड़े मामले में आशीष मिश्र को बाद में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया, हालांकि यह मामला आगे भी न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहा.
पलिया के मतदाताओं की संख्या समय के साथ लगातार बढ़ी है. 2012 में यहां 317,617 पंजीकृत मतदाता थे. यह संख्या 2017 में बढ़कर 340,784, 2019 में 349,946, 2022 में 360,750 और 2024 में 368,029 हो गई. मतदान प्रतिशत भी लगातार अच्छा रहा है और कई अन्य क्षेत्रों के विपरीत यहां विधानसभा चुनावों में मतदान हमेशा लोकसभा चुनावों से अधिक नहीं रहा. 2012 में मतदान 64.03 प्रतिशत था, जो 2017 में बढ़कर 68.03 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 65.86 प्रतिशत रहा और 2022 के विधानसभा चुनाव में लगभग समान 65.72 प्रतिशत दर्ज किया गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान थोड़ा घटकर 63.01 प्रतिशत रह गया.
पलिया हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भी उल्लेखनीय संख्या है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का 15.60 प्रतिशत हैं. अनुसूचित जाति के मतदाता इनसे अधिक हैं और उनकी हिस्सेदारी 26.85 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 8.06 प्रतिशत है. बाकी मतदाताओं में विभिन्न ओबीसी समुदायों के साथ राजपूत, ब्राह्मण और सिख समुदाय भी शामिल हैं. यह सीट मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 91.85 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और केवल 8.15 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
पलिया कलां का विकास लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्र में एक बस्ती के रूप में हुआ. यह इलाका घने जंगलों और उपजाऊ जलोढ़ मैदानों के लिए जाना जाता है. 20वीं सदी में रेलवे नेटवर्क के विस्तार और कृषि बस्तियों की स्थापना के साथ कस्बे का महत्व बढ़ा. आजादी के बाद पाकिस्तान से विस्थापित बड़ी संख्या में सिख परिवारों को इस क्षेत्र के कई हिस्सों में बसाया गया और उन्होंने खेती को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया. नेपाल की नजदीकी और बाद में दुधवा नेशनल पार्क के विकास ने पर्यटन और सीमा पार व्यापार को भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना दिया.
दुधवा नेशनल पार्क पलिया क्षेत्र का सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल है. यह पलिया कलां से लगभग 13 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है. यह बाघों, बारहसिंगा और देश में एक सींग वाले गैंडे की महत्वपूर्ण आबादी के लिए जाना जाता है. पार्क के जंगल, घास के मैदान और आर्द्रभूमि देश और विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. दुधवा घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए पलिया कलां में ठहरने, परिवहन, होटल, भोजन, गाइड और अन्य सेवाओं की व्यवस्था उपलब्ध है, जिससे पर्यटन स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनता है.
कृषि आज भी पलिया विधानसभा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है. उपजाऊ तराई की मिट्टी और पानी की अच्छी उपलब्धता के कारण यहां गन्ना, धान, गेहूं और अन्य फसलों की खेती होती है. गन्ना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पलिया कलां में चीनी मिल मौजूद है, जो आसपास के ग्रामीण इलाकों में पैदा होने वाले गन्ने के लिए बड़ा औद्योगिक केंद्र है. कस्बे में कृषि व्यापार, परिवहन, खाद्य प्रसंस्करण, खुदरा कारोबार और सेवा क्षेत्र से जुड़े कई व्यवसाय भी हैं. खेती, चीनी उद्योग और पर्यटन का यह मिश्रण पलिया को लखीमपुर खीरी के कई अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में व्यापक आर्थिक आधार देता है.
पलिया के आसपास का भूभाग मुख्य रूप से समतल तराई के मैदानों से बना है. यहां जंगल, घास के मैदान, आर्द्रभूमि और खेती की जमीन का मिश्रण देखने को मिलता है. इस क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है और नदियों, छोटी धाराओं तथा जल निकासी चैनलों का नेटवर्क मौजूद है. दुधवा और आसपास के संरक्षित क्षेत्रों के जंगल स्थानीय पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जबकि वन क्षेत्रों के बाहर अधिकांश ग्रामीण इलाकों में खेती की जमीन फैली हुई है.
पलिया कलां सड़क मार्ग से लखीमपुर खीरी, मैलानी, पूरनपुर, शाहजहांपुर और क्षेत्र के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. यह कस्बा दुधवा और नेपाल सीमा की ओर जाने वाले सड़क नेटवर्क पर स्थित है और यहां से आसपास के कई शहरों और कस्बों के लिए बस सेवाएं उपलब्ध हैं.
पलिया कलां में मैलानी से नानपारा मीटर गेज सेक्शन पर रेलवे स्टेशन है. यह स्टेशन दुधवा क्षेत्र तक रेल संपर्क उपलब्ध कराता है और दुधवा नेशनल पार्क जाने वाले पर्यटकों के लिए भी उपयोगी है. दुधवा रेलवे स्टेशन पलिया कलां से लगभग 13 किलोमीटर दूर है और पार्क के मुख्य क्षेत्र के सबसे नजदीकी स्टेशनों में शामिल है. मैलानी जंक्शन लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर है और यहां से बड़े रेल नेटवर्क से संपर्क मिलता है. शाहजहांपुर और बरेली नजदीकी प्रमुख रेलवे केंद्र हैं, जहां से देश के कई हिस्सों के लिए बेहतर रेल संपर्क उपलब्ध है.
पलिया कलां गौरिफंटा से लगभग 40 किलोमीटर दूर है, जो इस क्षेत्र का प्रमुख भारत-नेपाल सीमा पार केंद्र है. नेपाल का धनगढी शहर भी सड़क मार्ग से लगभग 40 से 41 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. गौरिफंटा से धनगढी तक सड़क अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करती है और धनगढी भारतीय सीमा शुल्क केंद्र से केवल लगभग 3 किलोमीटर दूर है. इस सीमा पार केंद्र से चावल, पेट्रोलियम उत्पाद, फल और सब्जियों सहित कई वस्तुओं का व्यापार होता है. धनगढ़ी पश्चिमी नेपाल का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र भी है.
पलिया कलां नेपाल के धनगढ़ी से लगभग 40 किलोमीटर, गोला गोकर्णनाथ से 40 किलोमीटर, पूरनपुर से 43 किलोमीटर और लखीमपुर खीरी से करीब 57 किलोमीटर दूर है. पीलीभीत लगभग 90 किलोमीटर दूर है, जबकि शाहजहांपुर लगभग 100 किलोमीटर और बरेली सड़क मार्ग से करीब 140 किलोमीटर की दूरी पर है. उत्तराखंड सीमा के पार खटीमा लगभग 90 किलोमीटर दूर है और नैनीताल की दूरी लगभग 230 किलोमीटर है. लखनऊ करीब 200 किलोमीटर और नई दिल्ली सड़क मार्ग से लगभग 360 किलोमीटर दूर है.
2014 से पलिया में भाजपा का रिकॉर्ड प्रमुख चुनावों में जीत या बढ़त हासिल करने का रहा है. इस तरह पार्टी ने लगातार पांच प्रमुख चुनावों में पहला स्थान हासिल किया है. भाजपा को उम्मीद होगी कि अजय कुमार मिश्र टेनी के खिलाफ किसानों के बीच रही नाराजगी अब पुरानी बात बन चुकी होगी. पार्टी ने टेनी और उनके बेटे से जुड़े विवाद के बावजूद मजबूती दिखाई और 2022 का विधानसभा चुनाव जीता, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाए रखी.
यह बहस का विषय बना हुआ है कि समाजवादी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन का कारण मतदाताओं के बीच उसकी बढ़ती स्वीकार्यता थी या फिर इसका मुख्य कारण टेनी और उनके बेटे से जुड़े विवाद के कारण बनी नकारात्मक भावना थी.
इन चुनौतियों के बावजूद भाजपा पलिया में अपने प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त बनाए हुए है. विधानसभा चुनावों में लगातार दो जीत और लोकसभा चुनावों में लगातार तीन बार बढ़त ने पार्टी की स्थिति मजबूत की है. अगर समाजवादी पार्टी भाजपा को गंभीर चुनौती देना चाहती है, तो उसे एक मजबूत उम्मीदवार उतारने, बेहतर संगठन तैयार करने और मुस्लिम, अनुसूचित जाति तथा अन्य मतदाता समूहों के बीच समर्थन को मजबूत करने की जरूरत होगी.
2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा मजबूत दावेदार के रूप में उतर रही है, लेकिन पलिया सीट विपक्ष की पहुंच से पूरी तरह बाहर नहीं है.
(अजय झा)
Pritinder Singh Kakku
SP
Dr. Jakir Husain
BSP
Rishal Ahamad
INC
Nota
NOTA
Arti Rai
CPI(ML)(L)
Lalit Kumar Verma
AAAP
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