पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काली नदी के किनारे बसा कासगंज, एक ऐतिहासिक बाजार वाला शहर और जिला मुख्यालय है. यह उपजाऊ दोआब क्षेत्र में एक अहम जगह पर स्थित है, जो अपनी समृद्ध कृषि परंपराओं के लिए जाना जाता है. प्राचीन ब्रज सांस्कृतिक क्षेत्र और मध्ययुगीन बस्तियों (जो मुगल और ब्रिटिश काल में विकसित हुईं) से जुड़ी जड़ों वाला यह शहर लंबे समय से व्यापार और खेती का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. आज, यह कासगंज जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है और एटा लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. एक सामान्य, अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र होने और यहां के ज्यादातर मतदाता ग्रामीण होने के कारण, कासगंज राजनीतिक रूप से लोधी समुदाय के मजबूत प्रभाव और बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति की आबादी के लिए जाना जाता है.
1951 के परिसीमन आयोग के आदेश से बने कासगंज ने 1952 से उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में वोट दिया है. 2008 के परिसीमन के बाद, इस निर्वाचन क्षेत्र में अब कासगंज और सोरों म्युनिसिपल बोर्ड, बिलराम नगर पंचायत और नमेनी, बिलराम और सोरों कानूनगो सर्कल के तहत आने वाले कई गांव शामिल हैं. तीन शहरी स्थानीय निकायों की मौजूदगी के बावजूद, इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
कासगंज में पारंपरिक रूप से कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनसंघ (जो बाद में BJP बनी) के बीच कड़ा मुकाबला रहा है. कुल मिलाकर जनसंघ की दो जीतों के साथ BJP ने सात चुनाव में सफलता हासिल की हैं, जबकि कांग्रेस ने छह बार जीत हासिल की है. समाजवादी पार्टी ने दो बार यह सीट जीती है, जबकि जनता पार्टी, जनता दल और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने एक-एक बार जीत हासिल की है. कांग्रेस ने यहां आखिरी बार 1985 में जीत हासिल की थी. तब से, इस निर्वाचन क्षेत्र पर ज्यादातर BJP का दबदबा रहा है. 1989 और 2022 के बीच हुए नौ विधानसभा चुनावों में से पांच में BJP जीती है.
समाजवादी पार्टी ने 2012 में BJP की बढ़त को कुछ समय के लिए रोका था, जब मनपाल सिंह ने तत्कालीन BSP विधायक हसरत उल्लाह शेरवानी को 10,179 वोटों से हराया था. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के BJP छोड़कर अपनी पार्टी 'जन क्रांति पार्टी' बनाने के कारण BJP छठे स्थान पर खिसक गई थी, लेकिन 2017 में जन क्रांति पार्टी के BJP में विलय के बाद उसने जबरदस्त वापसी की. इसके उम्मीदवार देवेंद्र सिंह लोधी ने हसरत उल्लाह शेरवानी को 52,030 वोटों के बड़े अंतर से हराया. शेरवानी तब तक समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुके थे. लोधी ने 2022 में एक और शानदार जीत के साथ यह सीट अपने पास बनाए रखी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मनपाल सिंह को 46,265 वोटों से हराया. उन्हें 123,410 वोट मिले, जबकि मनपाल सिंह को 77,145 वोट मिले.
बीजेपी ने लोकसभा चुनावों के दौरान भी कासगंज विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाए रखी है. 2009 में, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, जो बीजेपी छोड़ने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे थे, ने बीएसपी पर 18,070 वोटों की बढ़त बनाई, जबकि बीजेपी तीसरे स्थान पर रही. 2014 में स्थिति पूरी तरह बदल गई, जब बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर 42,758 वोटों की बढ़त हासिल की. समाजवादी पार्टी पर उनकी बढ़त 2019 में बढ़कर 45,493 वोट हो गई, लेकिन 2024 के संसदीय चुनाव में यह घटकर 23,440 वोट रह गई. बीजेपी उम्मीदवार राजवीर सिंह को 113,678 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार देवेश शाक्य को 90,238 वोट मिले.
कासगंज में पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2012 में 320,619 से बढ़कर 2017 में 345,711, 2019 में 355,456, 2022 में 364,023 और 2024 में 370,390 हो गई. मतदान का प्रतिशत भी अच्छा रहा है- 2012 में 59.56 प्रतिशत, 2017 में 63.68 प्रतिशत, 2019 में 62.79 प्रतिशत, 2022 में 64.76 प्रतिशत और 2024 के लोकसभा चुनाव में 60.93 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया. कासगंज हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, जहां लोधी समुदाय का सबसे बड़ा राजनीतिक समूह है और वे कुल मतदाताओं का एक-चौथाई से ज्यादा हिस्सा हैं. यहां अनुसूचित जातियों की आबादी 17.77 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी 10.70 प्रतिशत है. यादव (अनुमानित 8 से 12 प्रतिशत) और वैश्य (लगभग 8 से 10 प्रतिशत) अन्य प्रभावशाली समुदाय हैं. ब्राह्मणों और ठाकुरों की भी यहां अच्छी-खासी मौजूदगी है. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां के लगभग 70 से 80 प्रतिशत मतदाता गांवों में रहते हैं, जबकि कासगंज शहर, सोरों और बिलराम इसे शहरी स्वरूप देते हैं.
कासगंज का इतिहास प्राचीन ब्रज क्षेत्र से जुड़ा है और यह ऐतिहासिक शूरसेन महाजनपद का हिस्सा था. साहित्यिक परंपराएं इस पूरे क्षेत्र को यदुवंशी सभ्यता और कृष्ण-कथाओं से जोड़ती हैं, जिनका पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान पर आज भी गहरा प्रभाव है. मध्यकाल में, यह बस्ती एक व्यापारिक केंद्र के रूप में उभरी. इसका संबंध फर्रुखाबाद दरबार से जुड़े एक रईस, याकूत खान से रहा है. माना जाता है कि उन्हीं के नाम पर पहले इसका नाम 'याकूतगंज' पड़ा, जो बाद में धीरे-धीरे बदलकर 'कासगंज' हो गया. 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के अधीन आने से पहले, यह शहर मुगल, रोहिला और मराठा शासकों के प्रभाव में रहा.
अंग्रेजों के समय में, कासगंज एक अहम तहसील मुख्यालय और व्यापारिक केंद्र के तौर पर विकसित हुआ. रेलवे के आने से इसकी स्थिति और मज़बूत हुई. यह आज के कासगंज, एटा और आस-पास के जिलों के उपजाऊ कृषि क्षेत्र के लिए एक व्यापारिक केंद्र बन गया. 2008 में, मायावती की अगुवाई वाली BSP सरकार ने एटा जिले से अलग करके 'कांशीराम नगर' नाम का एक नया जिला बनाया, जिसका नाम BSP के संस्थापक कांशी राम के नाम पर रखा गया था. चार साल बाद, समाजवादी पार्टी की सरकार ने इसका पुराना नाम 'कासगंज' बहाल कर दिया.
काली नदी के किनारे उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में बसा यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है. यहां गेहूं, धान, आलू, गन्ना और सरसों मुख्य फसलें हैं, जबकि कासगंज शहर आस-पास के ग्रामीण इलाकों से आने वाली कृषि उपज के लिए मुख्य थोक बाजार का काम करता है. जिले में राइस मिल, कोल्ड स्टोरेज, एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट और छोटे मैन्युफैक्चरिंग उद्योग भी हैं. हालांकि यहां औद्योगिक विकास बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, लेकिन सरकारी दफ्तरों, शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य सुविधाओं, बैंकिंग और खुदरा व्यापार के बढ़ने से स्थानीय सेवा अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है.
कासगंज सड़क और रेल दोनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. कासगंज रेलवे जंक्शन जिले को आगरा, मथुरा, बरेली, कानपुर और उत्तर भारत के कई अन्य शहरों से जोड़ता है. नेशनल हाईवे 509 और स्टेट हाईवे का नेटवर्क इस निर्वाचन क्षेत्र को आस-पास के जिलों से जोड़ता है. कासगंज, एटा से लगभग 40 किमी, अलीगढ़ से लगभग 60 किमी, मथुरा से लगभग 107 किमी, आगरा से लगभग 114 किमी, नई दिल्ली से लगभग 200 किमी और लखनऊ से लगभग 315 किमी दूर है.
कासगंज, समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाले इलाके में BJP के लिए एक भरोसेमंद निर्वाचन क्षेत्र के तौर पर उभरा है. आस-पास के ज्यादातर यादव-बहुल इलाकों के उलट, यहां यादव आबादी कम है और लोधी मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है. यह समीकरण लगातार BJP के पक्ष में रहा है. पार्टी ने 2017 के बाद से दोनों विधानसभा चुनाव जीते हैं और 2014 के बाद से तीनों लोकसभा चुनावों में बढ़त बनाई है, जो यह दिखाता है कि यह कोई अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि लंबे समय तक रहने वाली चुनावी बढ़त है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि BJP निश्चिंत हो सकती है. 2019 में लोकसभा चुनाव में मिली 45,493 वोटों की बढ़त का 2024 में घटकर 23,440 वोट रह जाना यह बताता है कि विपक्ष ने अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया है. समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम वोट बैंक से आगे बढ़कर समर्थन का दायरा बढ़ाए और अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) तथा अनुसूचित जातियों (SC) के वोटरों को किसी भरोसेमंद स्थानीय उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट करे. जब तक पार्टी ऐसा करने में सफल नहीं होती, तब तक कासगंज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मजबूत चुनावी क्षेत्रों में से एक बने रहने की संभावना है. मौजूदा हालात को देखते हुए, बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में साफ बढ़त के साथ उतरेगी. हालांकि, संसदीय चुनाव में जीत के अंतर का कम होना यह याद दिलाता है कि पार्टी वोटरों को हल्के में नहीं ले सकती.
(अजय झा)
Man Pal Singh
SP
Mohd. Arif
BSP
Kuldeep Kumar
INC
Nota
NOTA
Narendra Kumar
IND
Prem Singh
IND
Avdhesh
INJSP
Manpal
AAAP
Rubi
BMUP
Prabhoo Dayal Rajpoot
ASPKR
Indrapal
RSUPRP
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