कालपी उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का एक ऐतिहासिक नगर और नगर पालिका परिषद है, जो यमुना नदी के दाहिने किनारे पर कानपुर से लगभग 78 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है. यह कालपी तहसील का मुख्यालय है और लंबे समय से नदी किनारे व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय प्रशासन के केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण रहा है. प्राचीन काल तक पहुंचने वाली परंपराओं के साथ कालपी पर बाद में कई मध्यकालीन शक्तियों का शासन रहा और 1857 के विद्रोह में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा. इसके ऐतिहासिक स्वरूप की झलक आज भी यहां के स्मारकों और पुराने बसे इलाकों में दिखाई देती है. यह नगर आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लिए स्थानीय प्रशासनिक और बाजार केंद्र बना हुआ है.
कालपी के नाम पर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जो 1957 के चुनावों से अस्तित्व में है. यह जालौन लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें पूरी कालपी तहसील शामिल है, जिसमें कालपी नगर पालिका परिषद भी आती है, साथ ही कुठौंद और कदौरा विकासखंडों के माध्यम से प्रशासित ग्रामीण क्षेत्र भी इसमें शामिल हैं. इस वजह से इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
कालपी में अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. 1957 में यह दो विधायक वाला क्षेत्र था, जब एक निर्दलीय और एक प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार निर्वाचित हुए थे. एकल विधायक सीट बनने के बाद हुए 16 चुनावों में कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा ने इस सीट पर चार-चार बार जीत दर्ज की है. भाजपा की संख्या में उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की 1967 और 1974 की दो जीत भी शामिल हैं. जनता पार्टी, जनता पार्टी (सेक्युलर), जनता दल और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार यह सीट जीती है.
1991, 1993 और 1996 में लगातार तीन बार बसपा की जीत को छोड़ दें तो कालपी मुख्य रूप से बदलते राजनीतिक रुझान वाला क्षेत्र रहा है. हाल के वर्षों में भी यह पैटर्न जारी रहा है और पिछले तीन विधानसभा चुनावों में तीन अलग-अलग दलों ने यहां जीत दर्ज की है.
2012 में कांग्रेस उम्मीदवार उमा कांति ने बसपा के संजय सिंह को 6,650 वोटों से हराया था. 2017 में भाजपा ने चौथे स्थान पर रहने के बाद वापसी करते हुए यह सीट जीती. उस चुनाव में नरेंद्र पाल सिंह ने बसपा उम्मीदवार छोटे सिंह को 51,484 वोटों से हराया. 2022 में सीटों के बंटवारे की व्यवस्था के तहत भाजपा ने कालपी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ा, क्योंकि यह सीट उसके क्षेत्रीय सहयोगी निषाद पार्टी के हिस्से में गई थी. समाजवादी पार्टी ने यह चुनाव मामूली अंतर से जीता. विनोद चतुर्वेदी को 69,782 वोट मिले, जबकि निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह को 66,966 वोट मिले. इस तरह जीत का अंतर 2,816 वोट रहा.
लोकसभा चुनावों के दौरान मतदान के रुझान भी बदलती राजनीतिक पसंद की ओर संकेत करते हैं. 2009 में कालपी विधानसभा खंड में समाजवादी पार्टी ने बसपा पर सिर्फ आठ वोटों की बढ़त बनाई थी. इसके बाद 2014 में भाजपा तीसरे स्थान से आगे बढ़ी और बसपा पर 54,618 वोटों की बढ़त बनाई. 2019 में भी भाजपा ने अपनी बढ़त कायम रखी, हालांकि उसका अंतर घटकर 16,522 वोट रह गया. 2024 में समाजवादी पार्टी आगे निकल गई. उसके जालौन लोकसभा उम्मीदवार नारायण दास अहिरवार को कालपी खंड में 107,057 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार भानु प्रताप सिंह वर्मा को 88,887 वोट मिले. इस तरह कालपी खंड में समाजवादी पार्टी को 18,170 वोटों की बढ़त मिली.
कालपी में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 354,615 से बढ़कर 2017 में 377,554 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 383,738 हो गई. 2022 में यह संख्या 395,717 और 2024 में 400,606 रही. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 362,495 मतदाता दर्ज हुए. यह 2024 के आंकड़े से 38,111 कम है, यानी 9.56 प्रतिशत की कमी हुई है.
कालपी में विधानसभा चुनावों के दौरान मतदान प्रतिशत आमतौर पर अधिक रहा है, लेकिन लोकसभा चुनावों में इसमें गिरावट देखने को मिली है. 2012 में मतदान प्रतिशत 62.76 रहा और 2017 में यह 60.77 प्रतिशत था. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 57.86 रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 60.05 हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 55.25 प्रतिशत रह गया.
कालपी एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. अनुमान के अनुसार इसकी आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 9.40 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 26.75 प्रतिशत है. सामाजिक संरचना में ठाकुर, ब्राह्मण, पाल, कुशवाहा, लोधी और यादव जैसी ओबीसी समुदायों की मौजूदगी है. इसके अलावा जाटव और अन्य अनुसूचित जाति समूह भी महत्वपूर्ण हैं. चुनावी विश्लेषणों में इस्तेमाल किए जाने वाले अनुमानों के अनुसार ठाकुर करीब 10.82 प्रतिशत, पाल 8.43 प्रतिशत, ब्राह्मण 7.73 प्रतिशत, जाटव 16.85 प्रतिशत और मुस्लिम करीब 8.58 प्रतिशत हैं. कालपी में निषाद समुदाय की भी महत्वपूर्ण मौजूदगी है. यह नदी किनारे रहने वाला समुदाय पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने और नाव चलाने से जुड़ा रहा है, खासकर यमुना के किनारे बसे गांवों में.
कालपी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र है. अनुमान के अनुसार इसकी करीब 87.46 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और 12.54 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है, जिसमें कालपी नगर भी शामिल है. कृषि, पशुपालन और स्थानीय व्यापार यहां की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. कालपी अपने हस्तनिर्मित कागज उद्योग के लिए भी जाना जाता है. इसका ऐतिहासिक संबंध स्वदेशी आंदोलन से रहा है और इसमें कपास के चिथड़ों, जूट, केले के रेशे और कृषि अपशिष्ट को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इस शिल्प को उत्तर प्रदेश के लिए भौगोलिक संकेतक प्राप्त है.
कालपी इस क्षेत्र के सबसे पुराने नगरों में से एक है और पारंपरिक रूप से इसे कल्पप्रिय नगरी के नाम से जाना जाता है. प्राचीन विवरण इसे राजा वासुदेव से जोड़ते हैं, हालांकि इन परंपराओं में इतिहास और किंवदंती दोनों का मिश्रण है. यमुना के किनारे इसकी स्थिति ने इसे व्यापार और सैन्य नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण बनाया. कालपी पर दिल्ली सल्तनत, क्षेत्रीय हिंदू शासकों और बुंदेलों का शासन रहा, जिसके बाद 1803 में यह ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया. बाद में यह बुंदेलखंड एजेंसी का हिस्सा बना और 1818 से 1824 तक इसके मुख्यालय के रूप में कार्य किया.
1857-58 के विद्रोह के इतिहास में कालपी को महत्वपूर्ण स्थान मिला. मई 1858 में ह्यू रोज के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना ने नगर के पास झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अन्य विद्रोही नेताओं से जुड़ी भारतीय सेनाओं को पराजित किया. इसके बाद ब्रिटिशों ने पुराने किलेबंदी ढांचे को नष्ट कर दिया. कालपी में बचे ऐतिहासिक स्मारकों में चौरासी गुंबद और लंका मीनार शामिल हैं.
कालपी सड़क और रेल दोनों माध्यमों से जुड़ा हुआ है. कालपी का अपना रेलवे स्टेशन झांसी-कानपुर रेल मार्ग पर है, जबकि उरई रेलवे स्टेशन करीब 33 किलोमीटर और कानपुर सेंट्रल लगभग 70 किलोमीटर रेल दूरी पर है. सड़क मार्ग से कानपुर करीब 80 किलोमीटर और उरई करीब 35 किलोमीटर दूर है. मध्य प्रदेश का ग्वालियर करीब 250 किलोमीटर, लखनऊ करीब 160 किलोमीटर और झांसी करीब 140 किलोमीटर दूर है. प्रयागराज करीब 220 किलोमीटर, वाराणसी करीब 350 किलोमीटर और अयोध्या करीब 350 से 370 किलोमीटर सड़क दूरी पर है.
कालपी में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला है. 2009 के बाद हुए सात प्रमुख चुनावों में दोनों दलों में से प्रत्येक ने तीन चुनावों में जीत या बढ़त दर्ज की है. हालांकि, संतुलन समाजवादी पार्टी की ओर थोड़ा झुका है, क्योंकि उसने 2022 का विधानसभा चुनाव जीता और 2024 के लोकसभा चुनाव में कालपी खंड में भाजपा पर बढ़त बनाई. दोनों में से किसी भी चुनाव में अंतर इतना बड़ा नहीं था कि यह कहा जा सके कि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की इस विधानसभा क्षेत्र में पकड़ समाप्त हो गई है.
बसपा भी एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है. 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे 64,683 वोट मिले थे, जो निषाद पार्टी से केवल 5,099 कम थे. यह संख्या 2024 के पिछले विधानसभा स्तर के समर्थन में समाजवादी पार्टी को मिले वोटों से भी अधिक थी. राजनीतिक निष्ठाओं के बदलते इतिहास के कारण कालपी में किसी एक चुनाव को निर्णायक संकेत के रूप में देखना कठिन है. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण ने मतदाता संख्या के आकार में भी बदलाव किया है, हालांकि इसका राजनीतिक प्रभाव आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा.
भाजपा के पास आत्मविश्वास बनाए रखने के कारण हैं, खासकर यदि वह 2027 में खुद इस सीट पर चुनाव लड़ती है. वहीं समाजवादी पार्टी के पास मौजूदा विधायक के रूप में लाभ और कालपी खंड में 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त का मनोवैज्ञानिक लाभ है. बसपा की लगातार मौजूदगी दोनों दलों के लिए चुनावी गणित को और जटिल बनाती है. तीन दलों के अंतिम चुनावी गणित को प्रभावित करने में सक्षम होने के कारण 2027 में कालपी में एक और करीबी मुकाबले की स्थिति बनी हुई है.
(अजय झा)
Chhote Singh
NINSHAD
Shyam Pal Urf Chunna Pal
BSP
Umakanti
INC
Ainul Hasan Mansoori
IND
Jishan
JANADIP
Nota
NOTA
Shyam Kishor
IND
Sundar
IND
Anjana Devi
IND
Veerendra Singh Parihar
RSTJNMN
Arun Kumar
DESP
Rajiv Kumar
CPI(ML)(L)
Rohit Tripathi
RAPI
Rais Ahmad
RVLP
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या में भागवत कथा में हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने जनसभा में दावा किया कि बीजेपी को अयोध्या से कैंडिडेट नहीं मिल रहा है. सत्तारूढ़ दल को खुली चुनौती देते हुए अखिलेश ने कहा कि मुख्यमंत्री खुद अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाएं.
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान गुरुवार को लखनऊ में अपने पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की छठी पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे थे. यहां उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर अपनी पार्टी की तैयारी का खाका बताया है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर भक्ति का रंग देखने को मिल रहा है. इस बार समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अयोध्या के दौरे पर हैं. दरअसल, अयोध्या सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार तेज नारायण उर्फ पवन पांडे ने रसूलाबाद में एक श्रीमद भागवत कथा का भव्य आयोजन किया है. अखिलेश यादव इसी कथा के समापन समारोह में शामिल होने के लिए अयोध्या पहुंचे हैं. हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे अधिक चर्चा है कि अखिलेश यादव अयोध्या तो जा रहे हैं, लेकिन वे राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला के दर्शन करने नहीं जाएंगे.
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव आज अयोध्या पहुंचेंगे. वह पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के आवास पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शामिल होंगे. हालांकि वे राम मंदिर दर्शन के लिए नहीं जाएंगे.
यूपी की सियासत में चिराग पासवान की पार्टी ने 403 सीटों पर तैयारी शुरू कर दी है. गठबंधन को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन चिराग के ताजा बयान से इतना जरूर साफ है कि पार्टी ने अपने विकल्प खुले रखे हैं.
लखनऊ के जीपीओ स्थित पटेल पार्क में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने परोक्ष रूप से समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा था. इसी भाषण का वीडियो क्लिप शेयर करते हुए अखिलेश यादव ने पलटवार किया है.
एआईएमआईएम के मध्य उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शेख ताहिर सिद्दीकी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 80-20 वाले बयान पर पलटवार किया है. उनका कहना है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ऐसी बात शोभा नहीं देती और मुख्यमंत्री 100 फीसदी जनता के हैं. योगी ने 80 फीसदी को एनडीए और 20 फीसदी को पीडीए से जोड़ा था.
रुहेलखंड की सियासत में 12 साल पहले मेनका और वरुण गांधी की सीटें बदलकर जिस धर्मेंद्र कश्यप को बीजेपी ने आगे बढ़ाया था, अब उनके बागी होने से पार्टी के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है. राज्यसभा टिकट न मिलने से नाराज कश्यप के सपा में जाने की चर्चाओं से रुहेलखंड बेल्ट में बीजेपी की 'सोशल इंजीनियरिंग' बिगड़ सकती है.
कानपुर के लोकप्रिय कॉमेडियन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अन्नू अवस्थी सीसामऊ सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की उम्मीद में हैं. उन्होंने पिछले 25 सालों में क्षेत्र में कोई बड़ा विकास न होने का दावा करते हुए सोलंकी परिवार के राजनीतिक एकाधिकार पर कड़ा हमला बोला है. बचपन में संघ की शाखा से जुड़ाव और अपनी हाईस्कूल तक की पढ़ाई का सच सामने लाते हुए aajtak.in से बातचीत में अनोखे चुनावी संकल्प भी जनता के सामने रखे हैं.
यूपी में राज्यसभा चुनाव के बाद बीजेपी के भीतर असंतोष गहराता दिख रहा है. पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने के संकेतों और पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर के परिवार की खुलकर जताई नाराजगी ने बीजेपी के पासी और कश्यप वोटबैंक समीकरण पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है.