इसौली पूर्वी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के बल्दीराय ब्लॉक में स्थित एक छोटा कृषि प्रधान गांव और ग्राम पंचायत है. यह जिला मुख्यालय से लगभग 15 किमी उत्तर और लखनऊ से करीब 137 किमी दूर स्थित है. यह ग्रामीण स्थानीय स्वशासन व्यवस्था के अंतर्गत आता है, जहां निर्वाचित ग्राम प्रधान पंचायत का नेतृत्व करता है.
इसौली विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1957 के चुनावों से पहले हुई थी. यह एक सामान्य, अनारक्षित सीट है और सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें सदर तहसील के पिपर गांव, कुड़वार और हसनपुर कानूनगो सर्किल तथा मुसाफिरखाना तहसील का इसौली कानूनगो सर्किल शामिल है, जिससे यह सीट पूरी तरह ग्रामीण स्वरूप वाली है.
इसौली में अपनी स्थापना के बाद से 18 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2009 का उपचुनाव भी शामिल है. शुरुआती दशकों में कांग्रेस का दबदबा रहा, जबकि हाल के समय में समाजवादी पार्टी सबसे मजबूत दल के रूप में उभरी है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ने इस सीट पर पांच-पांच बार जीत हासिल की है. बहुजन समाज पार्टी और भाजपा ने दो-दो बार यह सीट जीती है. बसपा की जीत में 2009 का उपचुनाव शामिल है, जबकि भाजपा की संख्या में 1957 के शुरुआती चुनाव में भारतीय जनसंघ की जीत भी शामिल है. भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, जनता दल और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने एक-एक बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया है.
समाजवादी पार्टी ने 2002 के बाद से यहां लगातार पांच नियमित विधानसभा चुनाव जीते हैं. हालांकि, उसके दो बार के विजेता चंद्र भद्र सिंह ने 2009 में बसपा में शामिल होने के बाद विधानसभा से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण उपचुनाव हुआ और उन्होंने बसपा के टिकट पर वह चुनाव जीत लिया.
समाजवादी पार्टी ने 2012 में अबरार अहमद के जरिए सीट वापस हासिल की. उन्होंने पीस पार्टी ऑफ इंडिया के यश भद्र सिंह को 13,941 वोटों से हराया. बसपा और भाजपा क्रमशः चौथे और पांचवें स्थान पर रहे. अबरार अहमद ने 2017 में भी सीट बरकरार रखी और भाजपा के ओम प्रकाश पांडे को 4,241 वोटों के अपेक्षाकृत कम अंतर से हराया. 2022 में समाजवादी पार्टी ने अपने मौजूदा विधायक की जगह मोहम्मद ताहिर खान को उम्मीदवार बनाया. यह फैसला लगभग उलटा पड़ गया, जब ताहिर खान को 69,629 वोट मिले, जबकि पांडे को 69,360 वोट मिले. इस तरह ताहिर खान केवल 269 वोटों के बेहद मामूली अंतर से जीत सके.
लोकसभा चुनावों में इसौली विधानसभा खंड के मतदान रुझान अलग तस्वीर पेश करते हैं, जहां पिछले चार संसदीय चुनावों में चार अलग-अलग दल सबसे आगे रहे. 2009 में कांग्रेस ने बसपा पर 24,964 वोटों की बढ़त बनाई. 2014 में भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर 21,728 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में बसपा ने भाजपा को 5,551 वोटों से पीछे छोड़ा. 2024 में समाजवादी पार्टी पहली बार इस खंड में सबसे आगे रही, जब उसके सुल्तानपुर उम्मीदवार रामभुआल निषाद को 95,817 वोट मिले, जबकि उस समय की मौजूदा भाजपा सांसद मेनका गांधी को 76,886 वोट मिले. इस तरह सपा को 18,931 वोटों की बढ़त मिली.
पंजीकृत मतदाताओं की संख्या वर्षों के दौरान लगातार बढ़ी है. 2012 में यह संख्या 304,352 थी, जो 2017 में बढ़कर 339,883 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 345,960 हो गई. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या 359,307 थी और 2024 में 358,057 रही. 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 315,878 मतदाता हैं. यह पुनरीक्षण से पहले की संख्या से 39,487 कम है और इसमें करीब 11 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.
मतदान प्रतिशत लगातार बना रहा है, हालांकि यह मध्यम स्तर का है और लोकसभा चुनावों के दौरान इसमें थोड़ी कमी देखने को मिलती है. 2012 में मतदान 56.18 प्रतिशत रहा और 2017 में 56.35 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 54.59 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह फिर बढ़कर 56.59 प्रतिशत हुआ और 2024 में घटकर 54.23 प्रतिशत रह गया.
इसौली एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी भी पर्याप्त संख्या में है और इसका अनुमान 25.30 प्रतिशत लगाया जाता है. अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 16.80 प्रतिशत है. अन्य समुदायों में यादव महत्वपूर्ण और प्रभावशाली समूह हैं, जिनकी संख्या लगभग 9 से 12 प्रतिशत आंकी जाती है. अन्य पिछड़े समुदायों में कुर्मी शामिल हैं, जबकि पारंपरिक सवर्ण जातियों में ब्राह्मण, राजपूत, जिनमें स्थानीय भाले सुल्तान उपजाति भी शामिल है, और कायस्थ भी मौजूद हैं. यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण है और इसकी मतदाता सूची में कोई शहरी मतदाता नहीं है.
इसौली का इतिहास प्रारंभिक मध्यकाल तक जाता है, जब गांव और इसके आसपास का क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के भर बहुल क्षेत्र का हिस्सा था. स्थानीय परंपरा के अनुसार, दिल्ली सल्तनत के दौर में अलाउद्दीन खिलजी ने इसौली के भर शासक को पराजित करने के लिए बैस राजपूत योद्धाओं को भेजा था. जीत के बाद राजपूतों को भाले सुल्तान की उपाधि दी गई, जो आज भी पश्चिमी सुल्तानपुर में एक राजपूत उपजाति के नाम के रूप में मौजूद है. जिस मध्यकालीन किले को उन्होंने पराजित किया था, उसके अवशेष इसौली किले के रूप में आज भी मौजूद हैं. इसके परिसर में एक पुरानी मस्जिद भी है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारक के रूप में सूचीबद्ध करता है. मुगल और बाद में अवध के नवाबों के शासन के दौरान यह क्षेत्र परगना-जमींदारी व्यवस्था का हिस्सा बन गया. ब्रिटिश काल में भी इसका कृषि प्रधान स्वरूप बना रहा, जो आज तक कायम है.
यह विधानसभा क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ गंगा के मैदान में स्थित है. यहां का भूभाग मुख्य रूप से समतल और जलोढ़ है, जो गहन कृषि के लिए अनुकूल है. स्थानीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है. धान, गेहूं, दलहन, आलू, सरसों और गन्ना यहां की प्रमुख फसलें हैं. छोटे स्तर पर डेयरी और पशुपालन भी किसानों की आय में योगदान देते हैं. बुनियादी ढांचा अभी भी सामान्य स्तर का है. यह क्षेत्र पक्की जिला सड़कों के जरिए सुल्तानपुर और मुसाफिरखाना से जुड़ा है. सुल्तानपुर जंक्शन सबसे नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जो लखनऊ-वाराणसी रेल मार्ग पर स्थित है और लगभग 15 से 20 किमी दूर है. मुख्य मार्गों पर निजी और सार्वजनिक बसें चलती हैं, हालांकि अंतिम छोर तक पहुंच के लिए साझा ऑटो और दोपहिया वाहनों पर काफी निर्भरता है. आसपास के प्रमुख शहरों में सुल्तानपुर लगभग 15 किमी, मुसाफिरखाना लगभग 20 से 25 किमी, अमेठी लगभग 40 से 45 किमी, लखनऊ 137 किमी, अयोध्या लगभग 70 से 80 किमी, प्रयागराज लगभग 100 से 110 किमी और वाराणसी लगभग 140 से 150 किमी दूर हैं.
इसौली विधानसभा खंड के लोकसभा चुनाव परिणामों से राजनीतिक बदलाव का संकेत मिलता है, जो पिछले दो विधानसभा चुनावों में भी दिखाई दिया है. हालांकि समाजवादी पार्टी ने पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीते हैं, लेकिन 2017 में भाजपा और सपा के बीच 2.22 प्रतिशत अंक का अंतर था, जो 2022 में घटकर केवल 0.13 प्रतिशत अंक यानी 269 वोट रह गया. कभी प्रभावशाली रही कांग्रेस अब हाशिये पर पहुंच गई है. 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक मुस्लिम और यादव आधार को मजबूत करने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा अपने हिंदू समर्थन को बढ़ाने और किसी भी सत्ता विरोधी रुझान का लाभ उठाने का प्रयास करेगी. विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में हुई कमी ने चुनाव को लेकर एक नया पहलू जोड़ा है. ऐसे में एक और करीबी मुकाबले की स्थिति बन रही है, जिसमें मुकाबला बेहद कम अंतर तक जा सकता है.
(अजय झा)
Om Prakash Pandey
BJP
Yash Bhadra Singh
BSP
Mahjahar
AIMIM
Brijmohan
INC
Nota
NOTA
Firoz Khan
IND
Ashok Kumar
ADPT
Firadaus Bano
AAAP
Nutan Pandey
IND
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है. जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि बिना किसी फॉर्म 8 के आवेदन के ही 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम में बदलाव कर दिए गए. चुनाव आयोग ने इस मामले को केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की गई है.
उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
बिजनौर की सियासत में गन्ने की मिठास के साथ जातीय समीकरणों का भी अपना गणित है. आठ विधानसभा सीटों वाले इस जिले में BJP-सपा की लड़ाई, दलित-मुस्लिम वोट और 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट पर चंद्रशेखर आजाद की जीत ने सियासी तस्वीर को खास बना दिया. आइए जानते हैं इस जिले की और क्या खासियत है.
बदायूं की पूर्व सांसद संघमित्रा मौर्य को 2024 में BJP ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद उनकी नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहीं. पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने के बाद बिल्सी से चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हुईं. अब संघमित्रा ने आज तक से बातचीत में BJP छोड़ने की चर्चा खारिज की है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने अपना रुख साफ किया है. इटावा के सैफई में मतदान के बाद उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस दोनों को पता है कि कितनी सीटों पर बंटवारा होना है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए दोनों दलों को रास्ता निकालना होगा. हालांकि, अखिलेश ने सीटों की संख्या का खुलासा नहीं किया.
पीलीभीत में वोटर लिस्ट की जांच के दौरान 10 हजार से ज्यादा ऐसी एंट्री मिलीं, जो जरूरी आवेदन के बिना की गई थीं. अब पूरे उत्तर प्रदेश में इसी तरह की गड़बड़ियों की जांच के आदेश दिए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे और जेल में बंद पार्टी नेता आजम खान से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों और एल्युमनी ने इस पूरे घटनाक्रम और असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इटावा में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर सवालों का जवाब दिया. इस दौरान सपा नेता राजकुमार भाटी पर कार्रवाई और आजम खान से जुड़े मुद्दों पर भी उनसे सवाल पूछे गए.