हरगांव उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित एक ब्लॉक स्तर का कस्बा है. यह जनगणना कस्बे के रूप में दर्ज है और हरगांव विकासखंड के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है. इस कस्बे की जड़ें प्राचीन काल तक जाती हैं और इसका इतिहास महाभारत से भी पहले के समय तक बताया जाता है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसकी स्थापना अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र ने की थी. आधुनिक समय में इसका विकास एक पुरानी चीनी मिल के आसपास हुआ और आज भी यह आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए एक व्यावसायिक केंद्र के रूप में काम करता है.
1967 के परिसीमन आदेश के तहत हरगांव को विधानसभा क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया था. यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और धौरहरा लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन में इसकी सीमाओं का पुनर्गठन किया गया. अब इसमें हरगांव नगर पंचायत का पूरा क्षेत्र शामिल है, जिसमें पांच वार्ड हैं. इसके अलावा हरगांव कानूनगो सर्किल और सीतापुर सदर, खैराबाद तथा मर्संडा कानूनगो सर्किल के कुछ हिस्से भी इस विधानसभा क्षेत्र में आते हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप लगभग पूरी तरह ग्रामीण है.
हरगांव अपने गठन के बाद से 15 विधानसभा चुनावों में मतदान कर चुका है. यहां मतदाताओं ने अलग-अलग दलों को मौका दिया है और कोई भी पार्टी इसे अपना मजबूत गढ़ नहीं मान सकती. भाजपा ने यह सीट छह बार जीती है. इसमें 1967 के पहले चुनाव में उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की एक जीत शामिल है. इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने चार बार और बहुजन समाज पार्टी ने तीन बार यह सीट जीती. 1977 में जनता पार्टी और 1996 में समाजवादी पार्टी ने भी एक-एक बार यह सीट हासिल की.
2012 में बसपा के रामहेत भारती ने हरगांव सीट बरकरार रखी. उन्होंने पिछले दो चुनावों में भी यह सीट जीती थी. 2012 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के आर. पी. चौधरी को 12,149 वोटों से हराया. इससे पहले भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा था और उसे केवल 2.69 प्रतिशत वोट मिलने के कारण जमानत भी गंवानी पड़ी थी. इसके बाद 2017 में भाजपा ने शानदार वापसी की. भाजपा के उम्मीदवार सुरेश राही ने बसपा के मौजूदा विधायक रामहेत भारती को 44,995 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट अपने नाम कर ली. खास बात यह रही कि 2012 की तुलना में भाजपा के वोट शेयर में 43.24 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई.
2022 में भाजपा की जीत का अंतर थोड़ा कम हुआ, लेकिन उसने सीट बरकरार रखी. सुरेश राही को 116,691 वोट मिले, जबकि रामहेत भारती को 78,531 वोट मिले. रामहेत भारती बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे. 2022 में भाजपा की जीत का अंतर 38,160 वोट रहा.
हरगांव विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनाव के मतदान रुझान बताते हैं कि यहां के मतदाताओं ने अलग-अलग दलों को समर्थन दिया है. 2009 में कांग्रेस पार्टी ने बसपा पर 38,261 वोटों की बढ़त बनाई थी. समाजवादी पार्टी और भाजपा क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर रही थीं. पांच साल बाद तस्वीर बदल गई. 2014 में भाजपा ने बसपा पर 16,270 वोटों की बढ़त बना ली. 2019 में भाजपा की बसपा पर बढ़त बढ़कर 41,139 वोट हो गई. 2024 में समाजवादी पार्टी ने मामूली बढ़त बनाई. धौरहरा लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आनंद भदौरिया को 90,862 वोट मिले, जबकि भाजपा की उम्मीदवार रेखा वर्मा को 88,932 वोट मिले. दोनों दलों के बीच अंतर केवल 1,930 वोट या 0.90 प्रतिशत अंक रहा.
हरगांव में पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 276,435 से बढ़कर 2017 में 310,182, 2019 में 318,214, 2022 में 326,875 और 2024 में 327,449 हो गई. मतदान प्रतिशत ऊंचा रहा है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव देखने को मिला. 2012 में मतदान 69.67 प्रतिशत रहा और 2017 में बढ़कर 71.34 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 66.27 प्रतिशत रह गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह बढ़कर 68.07 प्रतिशत हुआ. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 65.50 प्रतिशत रह गया.
हरगांव अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और इसका सामाजिक स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है. अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 37.31 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम मतदाता 16.50 प्रतिशत हैं. बाकी मतदाताओं में विभिन्न ओबीसी समुदाय शामिल हैं, जिनमें खास तौर पर कुर्मी और यादव शामिल हैं. इसके अलावा ब्राह्मण और अन्य सवर्ण तथा पिछड़े समुदाय भी यहां मौजूद हैं. विधानसभा क्षेत्र लगभग पूरी तरह ग्रामीण है. यहां 95.67 प्रतिशत मतदाता गांवों में रहते हैं, जबकि 4.33 प्रतिशत मतदाता हरगांव कस्बे के शहरी हिस्सों में रहते हैं.
स्थानीय परंपरा के अनुसार, हरगांव की स्थापना अयोध्या के प्रसिद्ध राजा हरिश्चंद्र ने की थी. राजा हरिश्चंद्र को भगवान राम का दूर का पूर्वज माना जाता है और उन्हें सत्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है. यहां एक प्राचीन तालाब है, जिसे सूरज कुंड कहा जाता है और इसे इसी मान्यता से जोड़ा जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेला भी आयोजित किया जाता है.
आधुनिक समय में हरगांव की पहचान काफी हद तक अवध शुगर मिल्स से जुड़ी रही है. यह मिल अब के. के. बिरला समूह का हिस्सा है और इसकी स्थापना 1933 में हुई थी. मिल और इससे जुड़ी संस्थाओं ने हरगांव को आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक छोटे औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करने में भूमिका निभाई.
कृषि और चीनी उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. आसपास के ग्रामीण इलाकों में गन्ना एक महत्वपूर्ण फसल है और यही मिल के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है. औद्योगिक परिसर में चीनी उत्पादन के अलावा डिस्टिलरी, को-जनरेशन और बायो-कम्पोस्ट से जुड़ी सुविधाएं भी विकसित हुई हैं. मिल के अलावा कृषि, छोटा व्यापार और आसपास की ग्रामीण आबादी को सेवाएं देने वाले काम भी रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार हैं.
हरगांव सड़क मार्ग से सीतापुर और जिले के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से के लिए सीतापुर सबसे नजदीकी प्रमुख शहरी और रेलवे केंद्र है. व्यापक क्षेत्र सीतापुर जिले की नदी प्रणाली का हिस्सा है. सरायन और कठना यहां की महत्वपूर्ण नदियों में शामिल हैं, जबकि गोमती नदी भी जिले के अन्य हिस्सों से होकर बहती है.
हरगांव सीतापुर से करीब 25 किलोमीटर, लखनऊ से लगभग 115 किलोमीटर, लखीमपुर से करीब 75 किलोमीटर, हरदोई से लगभग 70 किलोमीटर और अयोध्या से करीब 145 किलोमीटर दूर है. इसकी सड़क कनेक्टिविटी कस्बे और आसपास के गांवों को मध्य उत्तर प्रदेश के बड़े बाजारों और प्रशासनिक केंद्रों तक पहुंच उपलब्ध कराती है.
हरगांव में भाजपा की राजनीतिक यात्रा उतार-चढ़ाव भरी रही है. आंकड़ों के अनुसार पिछले सात प्रमुख चुनावों में भाजपा के खाते में दो जीत और दो बढ़त रही हैं. इसके मुकाबले बसपा, कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी के खाते में एक-एक जीत या बढ़त रही है. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बढ़त हासिल होती दिखाई दे सकती है. हालांकि यह भी तथ्य है कि समाजवादी पार्टी ने यह सीट केवल एक बार जीती है और वह भी करीब तीन दशक पहले 1996 में.
इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा. उस चुनाव में पार्टी ने भाजपा पर मामूली बढ़त बनाई थी. इस परिणाम ने साफ संकेत दिया कि हरगांव में भाजपा को अजेय नहीं माना जा सकता. समाजवादी पार्टी 2024 में मिले मतदाताओं के समर्थन को 2027 के विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने की कोशिश करेगी. वहीं भाजपा के लिए यह परिणाम एक चेतावनी की तरह है कि उसे मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने और अपनी स्थिति मजबूत करने की जरूरत होगी. ऐसे में 2027 में हरगांव में एक दिलचस्प और करीबी मुकाबले की जमीन तैयार होती दिखाई दे रही है.
(अजय झा)
Ramhet Bharti
SP
Ranu Chaudhary
BSP
Mamta Bharti
INC
Arjun Lal
CPI(ML)(L)
Nota
NOTA
Saurabh Kishore
ASPKR
Suman
IND
Rampal
LKBNDHP
Khushiram Chaudhary
ASP
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है. जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि बिना किसी फॉर्म 8 के आवेदन के ही 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम में बदलाव कर दिए गए. चुनाव आयोग ने इस मामले को केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की गई है.
उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
बिजनौर की सियासत में गन्ने की मिठास के साथ जातीय समीकरणों का भी अपना गणित है. आठ विधानसभा सीटों वाले इस जिले में BJP-सपा की लड़ाई, दलित-मुस्लिम वोट और 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट पर चंद्रशेखर आजाद की जीत ने सियासी तस्वीर को खास बना दिया. आइए जानते हैं इस जिले की और क्या खासियत है.
बदायूं की पूर्व सांसद संघमित्रा मौर्य को 2024 में BJP ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद उनकी नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहीं. पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने के बाद बिल्सी से चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हुईं. अब संघमित्रा ने आज तक से बातचीत में BJP छोड़ने की चर्चा खारिज की है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने अपना रुख साफ किया है. इटावा के सैफई में मतदान के बाद उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस दोनों को पता है कि कितनी सीटों पर बंटवारा होना है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए दोनों दलों को रास्ता निकालना होगा. हालांकि, अखिलेश ने सीटों की संख्या का खुलासा नहीं किया.
पीलीभीत में वोटर लिस्ट की जांच के दौरान 10 हजार से ज्यादा ऐसी एंट्री मिलीं, जो जरूरी आवेदन के बिना की गई थीं. अब पूरे उत्तर प्रदेश में इसी तरह की गड़बड़ियों की जांच के आदेश दिए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे और जेल में बंद पार्टी नेता आजम खान से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों और एल्युमनी ने इस पूरे घटनाक्रम और असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इटावा में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर सवालों का जवाब दिया. इस दौरान सपा नेता राजकुमार भाटी पर कार्रवाई और आजम खान से जुड़े मुद्दों पर भी उनसे सवाल पूछे गए.