जैसे ही मैंने कोलकाता से बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र की ओर अपना सफर शुरू किया, 2021 की यादें मेरे मन में ताज़ा हो गईं. मुझे आज भी डोमकल में हुए भयानक बम धमाकों की आवाज और रानीनगर में जान बचाने के लिए मची अफरा-तफरी याद है. हालांकि, इस साल चुनाव आयोग के 'जीरो टॉलरेंस' के रुख और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की भारी मौजूदगी ने उम्मीद की एक किरण जगाई कि शायद चुनाव के ज़रिए गोलियों की आवाज बंद हो जाए.
मेरा दिन बरहामपुर में सुबह 5:30 बजे शुरू हुआ. जब मैं सुबह 6:00 बजे एक स्थानीय स्कूल-से-बने मतदान केंद्र पर पहुंचा तो मैं दंग रह गया. आधिकारिक शुरुआत से एक घंटा पहले भी, मतदाताओं की लंबी कतारें गेट के बाहर तक फैली हुई थीं जो इस क्षेत्र की लोकतांत्रिक भावना का एक मौन, दृढ़ प्रमाण था.
नवदा में 90 मिनट का हाई-वोल्टेज ड्रामा
जैसे ही मैं अम्ताला पहुंचा, मेरा फोन घनघना उठा. यह वही सहकर्मी था, उसकी सुबह 8:00 बजे तक अपने पहले कुछ 'लाइव' रिपोर्टिंग सत्र समाप्त करने के बाद, ध्यान रेजिनगर की ओर मुड़ गया. उस समय के सबसे चर्चित व्यक्ति निस्संदेह हुमायूं कबीर थे, जो एक अनुभवी और जोशीले नेता हैं और अब अपनी आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) का नेतृत्व कर रहे हैं. नवदा और रेजिनगर के अपने गढ़ों से चुनाव लड़ते हुए, कबीर मुर्शिदाबाद की राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बने हुए हैं. इन इलाकों के अस्थिर इतिहास को जानते हुए, मैंने कबीर को फोन करके उनकी गतिविधियों का पता लगाया.
उन्होंने मुझसे कहा, 'रेजनगर से मेरे पीछे आओ, मैं नवदा जा रहा हूं.' लेकिन जब तक मैं वहां पहुंचा, उनका काफिला जा चुका था. नवदा के विशाल, धूल भरे इलाके में, एक उम्मीदवार को ढूंढना भूत का पीछा करने जैसा है. मैंने अपने एक पत्रकार मित्र के व्हाट्सएप लाइव लोकेशन पर भरोसा किया और बेलडांगा से होते हुए काफिले का पीछा किया.
आवाज में तनाव था 'कहा हो आप, जल्दी आइए! हुमायूं को घेर लिया गया है!'
मैं दस मिनट के अंदर घटनास्थल पर पहुंचा और वहां लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. मैंने उत्तेजित स्थानीय लोगों की पहली पंक्ति को चीरते हुए आगे बढ़ा, तभी मुझे खाकी वर्दी और छलावरण वाली बंगाल पुलिस, आरएएफ और सीएपीएफ की संयुक्त घेराबंदी दिखाई दी, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त एसपी माजिद खान आईपीएस कर रहे थे. घेराबंदी के उस पार मैंने कबीर को सड़क के बीचोंबीच एक प्लास्टिक की कुर्सी पर अपने समर्थकों से घिरे हुए, अडिग बैठे देखा.
मौसम उमस और दुश्मनी से भरा हुआ था. दोनों पक्षों के प्रदर्शनकारी ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे. जब मैंने कबीर से पूछा कि वह धरना क्यों दे रहे हैं तो उनका जवाब संक्षिप्त था, 'जब तक पुलिस मेरे साथ दुर्व्यवहार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती, मैं यहां से नहीं हटूंगा.'
हम 90 मिनट तक चिलचिलाती गर्मी में खड़े रहे. पानी का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था और तापमान हर डिग्री बढ़ने के साथ-साथ राजनीतिक माहौल भी गर्म होता जा रहा था.
संकरी गलियों में हमला
जब कबीर ने आखिरकार आगे बढ़ने का फैसला किया तो स्थिति तनावपूर्ण से खतरनाक हो गई. मेरी कार टीएमसी प्रदर्शनकारियों के एक समूह के पीछे फंस गई, जिससे काफिले का पीछा करना असंभव हो गया. मुझे अपनी गाड़ी वहीं छोड़नी पड़ी और अपने साथियों अनिर्बन और सब्यसाची की कार में जगह ढूंढनी पड़ी. अपने वीडियो पत्रकार तापस बैरी के साथ, हम काफिले के पीछे-पीछे चलने लगे.
हम अभी 100 मीटर भी नहीं चले थे कि हमला शुरू हो गया. कथित टीएमसी समर्थक, बांस की लाठियों से लैस होकर, किनारे से निकल आए. पत्थरों की बौछार काफिले पर हुई. कांच के टूटने की आवाज गली में गूंज उठी, कबीर की आगे चल रही एक कार का सामने का शीशा चकनाचूर हो गया.
क्या बदली मुर्शिदाबाद की चुनावी तस्वीर?
मैं धड़कते दिल के साथ कार से बाहर कूद गया. मुर्शिदाबाद में पत्थरबाजी अक्सर 'मुरी-मोशला' (तटस्थ बम) की आवाज से पहले की घटना होती है. मैंने स्थिति बिगड़ने के डर से छुपने की जगह ढूंढी, लेकिन केंद्रीय बलों ने बड़ी कुशलता से कार्रवाई की. उन्होंने भीड़ पर धावा बोला, प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया और वाहनों के भागने के लिए रास्ता बनाया.
एक अलग तरह का चुनाव?
दिन के बाकी समय में कबीर ने कैसिपोर और रेजिनगर के अन्य हिस्सों का दौरा किया, लेकिन भारी सुरक्षा व्यवस्था ने आगे की किसी भी अप्रिय घटना को रोके रखा.
नवदा में हुई झड़प जिले के 'खून-खराबे' भरे इतिहास की एक भयावह याद दिलाती है, लेकिन पिछले सालों की तुलना में हिंसा का स्तर कुछ हद तक नियंत्रित प्रतीत हुआ. ये एक ऐसे दिन की अपवाद घटना थी जब सुरक्षा-व्यवस्था काफी कड़ी थी, ठीक वैसे ही जैसे आसनसोल से खबरें आ रही थीं, जहां भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल की कार पर भी पथराव किया गया, जिससे कार की पिछली खिड़की टूट गई.
सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने टाला बड़ा संकट
शाम होते-होते मुर्शिदाबाद ने राहत की सांस ली. चूंकि पत्थरबाजी और घेराव जैसी घटनाएं हुईं, लेकिन केंद्रीय बलों की क्लीनिकल प्रिसिजन (सटीक कार्रवाई) ने इन्हें बड़े दंगों में बदलने से रोक दिया. भागीरथी नदी के किनारे डूबते सूरज के साथ ये साफ था कि कड़े उपायों ने इस बार शायद कई जानों को बचा लिया. प्रशासन की मुस्तैदी ने तनावपूर्ण दिन को बिना किसी बड़ी जनहानि के समाप्त करने में सफलता हासिल की.